2021 की बात है. न्यूयॉर्क की गगनचुंबी इमारतों के बीच एक ऐसी डील होने जा रही थी, जिसकी गूंज पूरी दुनिया के बिजनेस गलियारों में सुनाई देने वाली थी. एक तरफ थी 28 साल की एक युवा लड़की चार्ली जेविस (Charlie Javice) थी, जिसकी आंखों में गजब का आत्मविश्वास था. दूसरी तरफ थे जेपी मॉर्गन चेस (JPMorgan Chase) जैसे दुनिया के सबसे बड़े बैंक के मंझे हुए अधिकारी. मेज पर 175 मिलियन डॉलर यानी करीब 1400 करोड़ रुपये की डील पड़ी थी. चार्ली ने दावा किया था कि उसने एक ऐसा स्टार्टअप बनाया है जो करोड़ों छात्रों की जिंदगी बदल रहा है. बैंक के बड़े-बड़े दिग्गजों को लगा कि उन्हें सोने की खान मिल गई है, लेकिन किसी को अंदाजा नहीं था कि इस सबके पीछे झूठ का एक ऐसा मकड़जाल बुना गया है, जिसे देखकर पूरी दुनिया दंग रह जाएगी. यह कहानी उस शातिर दिमाग लड़की की है, जिसने दुनिया के सबसे बड़े बैंक की आंखों में धूल झोंक दी.
चार्ली जेविस कोई साधारण लड़की नहीं थी. उसका पालन-पोषण न्यूयॉर्क के एक अमीर इलाके में हुआ था. उसके पिता एक हेज फंड में काम करते थे, इसलिए पैसा और रसूख उसे विरासत में मिले थे. उसने दुनिया के सबसे बेहतरीन बिजनेस स्कूलों में से एक, व्हार्टन स्कूल से पढ़ाई की थी. चार्ली बचपन से ही यह जानती थी कि उसे कुछ बड़ा करना है. उसमें बातों को घुमाने और लोगों को अपनी बातों पर यकीन दिलाने का अद्भुत हुनर था. कॉलेज खत्म करने के बाद उसने स्टार्टअप की दुनिया में कदम रखा. उसका इरादा था छात्रों की मदद करना, खासकर उन छात्रों की जो कॉलेज की भारी-भरकम फीस और सरकारी मदद (FAFSA) के उलझाव भरे रास्तों में फंस जाते थे. इसी सोच के साथ उसने फ्रैंक (Frank) नाम के एक स्टार्टअप की शुरुआत की.
फोर्ब्स की ’30 अंडर 30′ लिस्ट में आया नाम
शुरुआत में सब कुछ ठीक लग रहा था. चार्ली का कहना था कि सरकारी मदद पाना बहुत मुश्किल काम है और उसका स्टार्टअप इस प्रक्रिया को चुटकियों में आसान बना देता है. उसने खुद को एक ऐसी मसीहा के तौर पर पेश किया, जो गरीबों और मध्यम वर्ग के छात्रों के लिए लड़ रही थी. मीडिया ने उसे सिर आंखों पर बैठाया. फोर्ब्स जैसी बड़ी मैगजीन ने उसे अपनी ’30 अंडर 30′ लिस्ट में शामिल किया. हर कोई चार्ली जेविस का नाम जप रहा था. लेकिन इस चमक-दमक के पीछे कुछ ऐसा पक रहा था, जो बड़ी मुश्किल खड़ी करने वाला था. हकीकत यह थी कि उसका बिजनेस मॉडल उतना अच्छा काम नहीं कर रहा था, जितना उसने दावा किया था. उसके पास उतने छात्र नहीं आ रहे थे जितने उसे एक बड़ा स्टार्टअप बनने के लिए चाहिए थे.
42 लाख यूजर वाला स्टार्टअप!
कहानी का टर्निंग पॉइंट तब आया जब चार्ली को लगा कि अगर उसे बहुत बड़ी रकम चाहिए, तो उसे अपने आंकड़ों में खेल करना होगा. 2021 के आसपास जेपी मॉर्गन बैंक नए जमाने के ग्राहकों, खासकर युवाओं को अपने साथ जोड़ना चाहता था. चार्ली को यह मौका भांपते देर नहीं लगी. उसने बैंक के सामने प्रस्ताव रखा कि वह अपना स्टार्टअप उन्हें बेचना चाहती है. बैंक ने पूछा कि आपके पास कितने यूजर्स हैं? चार्ली ने बिना पलक झपकाए जवाब दिया- 42 लाख से भी ज्यादा. यह एक बहुत बड़ा आंकड़ा था. बैंक को लगा कि अगर वे फ्रैंक को खरीद लेते हैं, तो उन्हें बैठे-बैठे 42 लाख युवा ग्राहक मिल जाएंगे, जो आने वाले समय में बैंक से लोन लेंगे, क्रेडिट कार्ड लेंगे और बैंक का मुनाफा बढ़ाएंगे.
बैंक ने कहा- सबूत दिखाओ तो…
यहीं से शुरू हुआ धोखे का असली खेल. बड़े बैंक यूं ही कुछ नहीं करते, वे निवेश देने से पहले सबूत मांगते हैं. जेपी मॉर्गन ने भी सबूत मांगे. उन्होंने कहा कि हमें उन 42 लाख छात्रों की लिस्ट चाहिए. अब चार्ली के पास केवल 3 लाख के आसपास असली ग्राहक थे. बाकी के करीब 39 लाख ग्राहक कहां से आते? तब चार्ली ने गेम में एक और पहलू जोड़ दिया. उसने एक डेटा साइंस के प्रोफेसर से संपर्क किया. उसने प्रोफेसर से कहा कि उसे एक ऐसी लिस्ट चाहिए, जिसमें छात्रों के नाम, पते, ईमेल और उनकी जन्मतिथि हो. उसने प्रोफेसर को बहुत सारा पैसा देने का वादा किया. प्रोफेसर ने डेटा का एक बड़ा जखीरा तैयार किया. यह डेटा पूरी तरह से फर्जी था, यानी कंप्यूटर प्रोग्राम के जरिए नकली नाम और ईमेल बनाए गए थे.
चार्ली ने उन फर्जी आंकड़ों को बैंक के अधिकारियों के सामने पेश कर दिया. बैंक की टीम ने डेटा को ऊपर-ऊपर से देखा, और उन्हें सब कुछ असली लगा. उन्होंने सोचा कि इतनी कम उम्र की लड़की और व्हार्टन जैसी जगह से पढ़ी हुई, इतना बड़ा झूठ कैसे बोल सकती है? जेपी मॉर्गन जैसी संस्था, जिसके पास दुनिया के सबसे बेहतरीन वकील और जांचकर्ता हैं, वह भी चार्ली के आत्मविश्वास के सामने हार गई. बैंक ने 175 मिलियन डॉलर में फ्रैंक को खरीद लिया और चार्ली जेविस को बैंक में ही एक बड़ा पद दे दिया गया. उसे करोड़ों रुपये का बोनस भी मिला. वह रातों-रात दुनिया की सबसे सफल महिलाओं की लिस्ट में शामिल हो गई.
फर्जी निकले 90 फीसदी अकाउंट
लेकिन कहते हैं न कि झूठ के पांव नहीं होते. सौदा होने के कुछ महीने बाद, जेपी मॉर्गन की मार्केटिंग टीम ने उन 42 लाख छात्रों को ईमेल भेजने शुरू किए. उन्हें उम्मीद थी कि लाखों लोग बैंक की सुविधाओं का फायदा उठाएंगे. लेकिन जो नतीजा निकला, उसने बैंक के होश उड़ा दिए. बैंक ने करीब 4 लाख छात्रों को ईमेल भेजे, लेकिन उनमें से केवल 1 परसेंट लोगों ने ही उसे खोला. बाकी के ईमेल कभी कहीं पहुंचे ही नहीं, क्योंकि 90 प्रतिशत अकाउंट फेक थे. बैंक को शक हुआ कि कुछ तो गड़बड़ है. उन्होंने गहराई से जांच शुरू की और सारा कच्चा चिट्ठा सामने आ गया.
अदालत में आमने-सामने आए बैंक और चार्ली जेविस
जांच में पता चला कि चार्ली ने बैंक को जो डेटा दिया था, वह पूरी तरह से मनगढ़ंत था. जिन छात्रों के नाम उस लिस्ट में थे, उनका असल में कोई वजूद ही नहीं था. जेपी मॉर्गन ने तुरंत चार्ली को नौकरी से निकाल दिया और उसके खिलाफ अदालत में मुकदमा ठोक दिया. बैंक का कहना था कि चार्ली ने उन्हें अंधेरे में रखकर यह सौदा किया और उनके करोड़ों रुपये डूब गए. दूसरी तरफ, चार्ली भी पीछे नहीं हटी. उसने बैंक पर उल्टा आरोप लगा दिया कि बैंक उसके खिलाफ झूठे सबूत बना रहा है ताकि उसे बोनस न देना पड़े. यह मामला पूरी दुनिया की सुर्खियों में आ गया.
चार्ली जेविस का यह मामला केवल एक बैंक के साथ धोखाधड़ी नहीं था, बल्कि इसने पूरी स्टार्टअप दुनिया की पोल खोल दी. लोग पूछने लगे कि ‘फेक इट टिल यू मेक इट’ (जब तक सफल न हो जाओ, तब तक दिखावा करो) वाली सोच आखिर कहां तक सही है? चार्ली ने अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए उस भरोसे को तोड़ दिया जो निवेशकों और जनता के बीच होना चाहिए. आज चार्ली जेविस कानूनी लड़ाइयों में फंसी हुई है. उसके खिलाफ धोखाधड़ी और जालसाजी के कई मामले चल रहे हैं. अगर वह दोषी पाई जाती है, तो उसे कई सालों तक जेल की सजा हो सकती है.
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