Bhopal Heritage: 185 साल पुराना भोपाल का लाल परेड ग्राउंड, रियासत की शान से लेकर आजादी की गूंज तक सबकुछ देखा! 

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Bhopal lal Parade Ground History: भोपाल का लाल परेड मैदान मध्य प्रदेश की ऐतिहासिक धरोहरों में शुमार है. करीब 185 साल पुराना यह मैदान कभी भोपाल रियासत की परेड, सैन्य अभ्यास और शाही आयोजनों का गवाह रहा है.

भोपाल. मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल अपने ऐतिहासिक इमारत और धरोहर के लिए शुरू से जानी जाती रही है. यहां कई ऐसे महल और धरोहर हैं, जो इतिहास के नजरिए से बेहद खास हैं. शहर की ऐतिहासिक धरोहरों में शुमार, तकरीबन 185 साल पुराना लाल परेड मैदान वो जिंदा दस्तावेज है, जिसमें रियासत की शान, आजादी की गूंज और लोकतंत्र की धड़कनें दर्ज हैं. यह मैदान कभी भोपाल रियासत की पलटनों की परेड का गवाह बना, तो कभी आजाद भारत की लोकतांत्रिक परंपराओं का. यही वजह है कि इसे भोपाल का जीवंत इतिहास कहा जाता है.

स्थानीय लोगों का कहना है कि सन 1837 से 1844 के बीच नवाब जहांगीर मोहम्मद खान ने जहांगीराबाद को शहर के उपनगर के रूप में बसाया था. वहीं लाल परेड मैदान के निर्माण की बात कर तो इसे सन 1840 में अंग्रेजी सैनिकों के अभ्यास के लिए बनाया गया था. वहीं नाम की बात करें तो लाल परेड मैदान की लाल मिट्टी और पलटनों की लाल वर्दी को मिलाकर इसका नाम ‘लाल परेड ग्राउंड’ रखा गया. शुरूआत में इसे सैन्य अभ्यास का स्थल माना जाता था. मगर धीरे-धीरे यह भोपाल रियासत के अनुशासन और शान का पैगाम बन गया.

इंडो-पाक मुशायरे का आयोजन
तत्कालीन विदेशी मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के समय इंडो-पाक मुशायरे का आयोजन भी यहां किया गया था. वहीं भोपाल रियासत काल में यहां नाटक, कव्वाली, चार-बैत और मुशायरे होते रहे हैं. भारत की आजादी के बाद यही मैदान लोकतंत्र के पहले कदमों का गवाह बना, जहां 1 नवंबर 1956 को प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल ने जनता को संबोधित किया था. वहीं पहले राज्यपाल डॉ. पट्टाभि सीतारामैया ने परेड की सलामी ली थी.

सजा-ए-कसास भी यही हुई
कहा जाता है कि सन 1930 के दशक में लाल परेड मैदान में इस्लामी कानून के तहत ‘कसास’ भी हुआ था. उस समय आखिरी बार यहां एक महिला के अपमान और ईश निंदा को लेकर सजा-ए-कसास दी गई थी. हालांकि इसका कोई आधिकारिक दस्तावेज नहीं मिलता, लेकिन भोपाल की गलियों में ऐसे किस्से अब भी सुनाई पड़ते हैं. भोपाल रियासत काल में ये मैदान करीब 25 एकड़ से अधिक दायरे में फैला था. मगर समय के साथ परिवर्तन होता गया और इसके दायरे में आने वाली जमीन सिकुड़ती चली गई.

आज होते तरह-तरह के कार्यक्रम
बता दें, आज मोती लाल नेहरू स्टेडियम, बैंड स्कूल, एसएएफ ऑफिस, जिम्नेशियम हॉल, आम बगीचा, हॉर्स राइडिंग ग्राउंड, पुलिस शहीद स्थल और पार्किंग स्थान जिस जमीन पर बने हैं. वह भी पहले लाल परेड मैदान के अंतर्गत ही आती थी. लाल परेड मैदान में अब सैन्य उपकरणों की प्रदर्शनी, राज्य उत्सव, राष्ट्रीय वन मेला, पुलिस और सेना की भर्ती परीक्षाएं और स्कूली बच्चों के सांस्कृतिक कार्यक्रम समेत कई बड़े धार्मिक आयोजन भी होते रहते हैं.

Dallu Slathia

Dallu Slathia is a seasoned digital journalist with over 6 years of experience, currently leading editorial efforts across Madhya Pradesh and Chhattisgarh. She specializes in crafting compelling stories across …और पढ़ें

Dallu Slathia is a seasoned digital journalist with over 6 years of experience, currently leading editorial efforts across Madhya Pradesh and Chhattisgarh. She specializes in crafting compelling stories across … और पढ़ें

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भोपाल का लाल परेड मैदान, इंडो-पाक मुशायरे से लेकर राज्य उत्सव तक की धड़कन

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