एंटीऑक्सीडेंट और एंटीबैक्टीरियल का खजाना
केले के छिलके में गैलोकैटेचिन, कैटेचिन, क्वेरसेटिन, टैनिन, फ्लावोनोइड, सैपोनिन और एंटीऑक्सीडेंट्स की भरपूर मात्रा होती है. इन तत्वों की सबसे बड़ी खूबी है कि वे ‘फ्री-रेडिकल्स’ को खत्म करने में मदद करते हैं. जैसे-जैसे ये फ्री रेडिकल्स शरीर में जमा होते हैं, वैसे-वैसे कोशिकाओं की सेहत बिगड़ने लगती है, जिससे कैंसर, हृदय रोग और दूसरी बीमारियों का खतरा बढ़ता है. केले के छिलके का सेवन या उसका पेस्ट बनाकर इस्तेमाल शरीर की कोशिकाओं को बचाता है और बीमारियों से लड़ने की ताकत देता है. इससे पेट के संक्रमण, कमजोर प्रतिरोधक क्षमता और फेफड़ों व त्वचा की समस्याओं से लड़ने में सहायता मिलती है. इतना ही नहीं, इसमें मौजूद नैचुरल एंटीमाइक्रोबियल तत्व असरदार तरीके से ई. कोलाई, साल्मोनेला और स्टैफाइलोकोक्स जैसे खतरनाक बैक्टीरिया को खत्म कर देता है.
स्किन, दांत और पाचन तंत्र के लिए फायदेमंद
इंफर्टिलिटी,डिप्रेशन और खानपान में उपयोग
केले के छिलके में मौजूद ट्रिप्टोफैन और विटामिन बी 6, दिमाग की सेहत के लिए भी अच्छे माने जाते हैं. ये दोनों तत्व दिमाग को सुकून देते हैं, डिप्रेशन या मूड को बेहतर करने में मदद करते हैं. जापान के वैज्ञानिक सोमेया की स्टडी बताती है कि केले के छिलके के एंटीऑक्सीडेंट तत्व शरीर को भीतर से साफ करते हैं और इसके फ्लावोनोइड्स, टैनिन, सैपोनिन कैंसर जैसे गंभीर रोगों के जोखिम को कम करने की क्षमता रखते हैं. इंडोनेशिया की रिसर्च में पाया गया कि अगर छिलके का पाउडर, अर्क या उसका रंग किसी भी खाने या वस्त्र में उपयोग किया जाए, तो वह बैक्टीरिया और फंगस का असर धीरे-धीरे खत्म कर देता है. कपड़ों को रंगने में भी छिलके का प्राकृतिक कलर बैक्टीरियल इन्फेक्शन से सुरक्षा देता है.
दवा बनने की संभावना
इस रिसर्च के आधार भविष्य में केले के पाउडर बनाकर उसे दवा के रुप में विकसित किया जा सकता है. ऐसे में अब केला खाना ही नहीं, बल्कि उसके छिलके को भी सहेज कर रखना फायदेमंद साबित हो सकता है. इनपुट-आईएएनएस