आनंद महिंद्रा भी हुए चेन्नई के ‘जादू’ के कायल! कचरे के पहाड़ को बना दिया ‘सोन’

नई दिल्‍ली. चेन्नई के पेरुंगुडी से आई खबर ने पूरे भारत को यह यकीन दिला दिया है कि कचरा भी ‘सोना’ बन सकता है. पिछले पांच दशकों से 96 एकड़ में फैला यह डंपयार्ड शहर के माथे पर एक कलंक की तरह था, जहां कचरे के पहाड़ आसमान छू रहे थे. लेकिन, अब ऐसा नहीं है. ब्लू प्लैनेट एनवायरनमेंटल सॉल्यूशंस नामक एक कंपनी ने 50 साल पुराने लैंडफिल को एक आधुनिक संसाधन केंद्र में बदल दिया है. यहां से लगभग 17 लाख घन मीटर कचरा साफ किया जा चुका है. इतना कचरा जो 20 फुटबॉल मैदानों को पूरी तरह भरने के लिए काफी है. महिंद्रा एंड महिंद्रा समूह के मालिक आनंद महिंद्रा भी इस सफलता के कायल हैं. उन्‍होंने चेन्‍नई के इस लैंडफिल की कहानी एक्‍स पर शेयर किया है.

आनंद महिंद्रा ने लिखा, “चेन्नई ने हाल ही में @BluePlanet_Env की बायो-माइनिंग तकनीक का इस्‍तेमाल करके पेरुंगुडी डंपयार्ड को साफ किया है. अगर 50 वर्षों के कचरे को दोबारा उपयोगी बनाया जा सकता है, तो भारत की वेस्‍ट प्रॉब्‍लम के लिए उम्मीद भी है और ऐसी कई और ग्रोथ स्‍टोरीज के लिए भी पर्याप्त गुंजाइश है…”

कौन है ब्लू प्लैनेट एनवायरनमेंटल सॉल्यूशंस

ब्लू प्लैनेट एनवायरनमेंटल सॉल्यूशंस अब वेस्‍ट प्रबंधन में एक नामी चेहरा बन चुकी है. कंपनी की शुरुआत साल 2017 में सिंगापुर में हुई थी. आज यह एशिया की सबसे तेजी से बढ़ती कंपनियों में शामिल है. इसका मुख्य उद्देश्य एक ऐसी दुनिया बनाना है जहाँ कचरा फेंकने के लिए बड़े-बड़े कूड़ेदानों (लैंडफिल) की जरूरत ही न पड़े. इसे तकनीक की भाषा में ‘सर्कुलर इकोनॉमी’ कहते हैं, यानी पुरानी चीजों को फेंकने के बजाय उन्हें नया रूप देकर दोबारा बाजार में लाना.

ब्लू प्लैनेट को मधुजीत चिमनी, भारद्वाज चिवुकुला और प्रशांत सिंह ने खड़ा किया है. चिमनी कंपनी के चेयरमैन हैं. भारद्वाज चिवुकुला कंपनी के संस्थापकों में से एक हैं. प्रशांत सिंह सह-संस्थापक और सीईओ हैं. प्रशांत सिंह को कचरा प्रबंधन (Waste Management) का बड़ा लीडर माना जाता है और उन्हीं की देखरेख में कंपनी पूरे एशिया में अपना नाम बना रही है.

क्‍या करती है कंपनी?

ब्लू प्लैनेट का काम केवल कचरा उठाना नहीं, बल्कि उसे पूरी तरह बदलकर उपयोगी बनाना है. कंपनी हर तरह के कचरे जैसे घर का बचा हुआ खाना, खेतों का कचरा, प्लास्टिक या बिजली का सामान (ई-वेस्ट) आदि को ठिकाने लगाने की तकनीक जानती है. कंपनी प्लास्टिक कचरे से ईंधन (फ्यूल) बनाती है और गीले कचरे से ऊर्जा पैदा करती है. यह सालों पुराने कचरे के पहाड़ों (लैंडफिल) को साफ कर उस जमीन को फिर से इस्तेमाल के लायक बनाती है.

सिर्फ 8-9 सालों में इस कंपनी ने भारत ही नहीं, बल्कि मलेशिया, सिंगापुर, न्यूजीलैंड और ब्रिटेन (UK) तक अपना काम फैला लिया है. भारत की ‘रुद्रा’ और ‘महिंद्रा वेस्ट टू एनर्जी’ जैसी कई कंपनियों को ब्लू प्लैनेट ने खरीद लिया है ताकि कचरा प्रबंधन की ताकत बढ़ सके. दुनिया की बड़ी कंपनियों (जैसे नोमुरा और नीव फंड) ने ब्लू प्लैनेट में करोड़ों रुपये लगाए हैं. इस पैसे का इस्तेमाल भारत और एशिया के अन्य देशों में आधुनिक कचरा प्लांट लगाने के लिए किया जा रहा है.

पेरुंगुडी लैंडफिल को ऐसे किया साफ

पेरुंगुडी प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी खूबसूरती इसकी ‘जीरो वेस्ट’ रणनीति है. यहां कचरा केवल हटाया नहीं गया, बल्कि उसे नया जीवन दिया गया है. पेरुंगुडी के मलबे से निकले स्टील को पिघलाकर नए बर्तन और हार्डवेयर बनाए गए, जबकि 3,000 टन कांच को चमचमाती नई बोतलों में तब्दील कर दिया गया. पत्थरों को कंक्रीट स्लैब का रूप मिला, जिससे निर्माण कार्य आसान हुआ. लेकिन असली जादू प्लास्टिक के साथ हुआ. इसे शानदार आउटडोर फर्नीचर, पैलेट्स और औद्योगिक रैक्स में बदल दिया गया है. ताज्जुब की बात यह है कि इस रिसाइकिल प्लास्टिक को भविष्य में भी 7 से 8 बार दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है.

हर दिन 9,000 टन कचरे की खुदाई और छंटाई

इस पूरी क्रांति के पीछे ब्लू प्लैनेट की अत्याधुनिक बायो-माइनिंग तकनीक है. उनकी टीम हर दिन 9,000 टन कचरे की खुदाई और छंटाई करती है. गुणवत्ता और पर्यावरण का ध्यान रखने के लिए हर बैच को 52 कड़े सुरक्षा परीक्षणों से गुजरना पड़ता है ताकि इस प्रक्रिया से शून्य प्रदूषण हो. चेन्नई की यह सफलता कोई इकलौती घटना नहीं है. ब्लू प्लैनेट अब तक 9 राज्यों में 700 एकड़ जमीन को कचरे के चंगुल से मुक्त करा चुका है और 1.4 करोड़ टन कचरे का निपटान कर चुका है.

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