एक हादसा और 6 बिंदुओं से शुरू हुई नई क्रांति, जानें लुई ब्रेल की कहानी

कभी-कभी इतिहास की सबसे बड़ी क्रांतियां किसी भयानक दुर्घटना की कोख से जन्म लेती हैं. एक ऐसा हादसा, जो देखने में अंत लगता है, आगे चलकर अनगिनत लोगों के जीवन में नई शुरुआत बन जाता है. कुछ ऐसी ही है लुई ब्रेल की कहानी. पेरिस के पास बसे एक छोटे से गांव में घटित एक घटना ने न सिर्फ एक मासूम की दुनिया बदल दी, बल्कि आने वाले समय में दृष्टिहीनता को देखने का नजरिया भी हमेशा के लिए बदल दिया.

साल 1812 में पेरिस के कूपवरे के एक छोटे से गांव में तीन साल का नन्हा लुई अपने पिता की लेदर वर्कशॉप में खेल रहा था. पिता के हाथ में जो सुआ चमड़े को भेदकर सुंदर साज बनाता था, एक झटके में सुआ फिसला और लुई की दाहिनी आंख में जा लगा. संक्रमण इतना गहरा हुआ कि उसने ‘सिम्पैथेटिक ऑप्थाल्मिया’ का रूप ले लिया और देखते ही देखते पांच साल की उम्र तक लुई की दुनिया में पूरी तरह अंधेरा छा गया, लेकिन किसे पता था कि यह ‘अंधेरा’ ही दुनिया के दृष्टिबाधितों के लिए सबसे बड़ा ‘उजाला’ बनने वाला था?

दुनिया को ये रोशनी देने वाली लुई का जन्म साल 1809 में 4 जनवरी के दिन हुआ था. उस हादसे के बाद भी लुई के माता-पिता ने हार नहीं मानी. उन्होंने लुई को स्कूल भेजा. 10 साल की उम्र में लुई को पेरिस के ‘रॉयल इंस्टीट्यूट फॉर ब्लाइंड यूथ’ में छात्रवृत्ति मिली. यह दुनिया का पहला ऐसा स्कूल था, जिसकी स्थापना वैलेन्टिन होय ने की थी. वहां पढ़ाई के लिए उभरे हुए रोमन अक्षरों का उपयोग होता था, लेकिन ये किताबें बहुत भारी, महंगी और पढ़ने में बहुत धीमी थीं. सबसे बड़ी समस्या यह थी कि छात्र पढ़ तो सकते थे, पर लिख नहीं सकते थे.

1821 में स्कूल में फ्रांसीसी सेना के कैप्टन चार्ल्स बार्बियर आए. उन्होंने ‘नाइट राइटिंग’ का प्रदर्शन किया, जिसे सैनिक युद्ध के मैदान में रात के अंधेरे में संदेश पढ़ने के लिए इस्तेमाल करते थे. यह 12 बिंदुओं पर आधारित ध्वन्यात्मक प्रणाली थी. 12 साल के लुई ने इसकी क्षमता को पहचाना, लेकिन इसकी जटिलता को भी समझा. उन्होंने अगले तीन साल (1821-1824) तक दिन-रात एक कर दिया. मात्र 15 साल की उम्र में उन्होंने 12 बिंदुओं को घटाकर 6 कर दिया. उन्होंने महसूस किया कि 6 बिंदुओं वाली एक ‘सेल’ उंगली के एक ही पोर के नीचे पूरी तरह समा जाती है. यही वह क्षण था जब ब्रेल लिपि का जन्म हुआ.

ब्रेल लिपि कोई रैंडम बिंदुओं का समूह नहीं, बल्कि एक शानदार गणितीय संरचना है. एक सेल में 2 स्तंभ और 3 पंक्तियां होती हैं. कुल 6 बिंदु होते हैं. इन 6 बिंदुओं के संयोजन से 64 कोड बनते हैं. अजीब बात यह थी कि इस महान आविष्कार का शुरुआती विरोध खुद उसी स्कूल के शिक्षकों ने किया जहां लुई पढ़ते थे. पियरे-अर्मंड डफौ जैसे प्रशासकों ने ब्रेल में छपी पुस्तकों को जलवा दिया.

1844 के एक समारोह में जब लुई की लिपि की प्रभावशीलता का प्रदर्शन हुआ, तो पूरी दुनिया दंग रह गई. अफसोस कि जब 1854 में फ्रांस ने इसे आधिकारिक लिपि माना, तब तक टीबी के कारण लुई ब्रेल का 43 वर्ष की आयु में निधन हो चुका था.

भारत में ब्रेल लिपि का सफर 19वीं सदी के अंत में शुरू हुआ. आजादी से पहले भारत में 11 अलग-अलग ब्रेल कोड थे, जिससे शिक्षा बहुत कठिन थी. 1951 में यूनेस्को के सहयोग से ‘भारती ब्रेल’ को राष्ट्रीय मानक बनाया गया. भारती ब्रेल की खूबसूरती यह है कि यह भारतीय भाषाओं की ध्वन्यात्मक प्रकृति को समझती है और हिंदी, मराठी, बंगाली जैसी कई भाषाओं के लिए एक ही मानक प्रदान करती है.

आज के दौर में लोग समझते हैं कि ऑडियो बुक्स और स्क्रीन रीडर्स के आने से ब्रेल खत्म हो जाएगी, लेकिन आंकड़े कुछ और ही कहते हैं. ऑडियो ‘सुनना’ है, जबकि ब्रेल ‘पढ़ना’ है. ब्रेल के बिना नेत्रहीनों के लिए व्याकरण, वर्तनी और गणित सीखना लगभग नामुमकिन है.

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