जयपुर से दिल्ली तक अलर्ट,SMS अस्पताल की रिपोर्ट में एंटीबायोटिक पर बड़ा खुलासा

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Jaipur News : जयपुर के एसएमएस मेडिकल कॉलेज की रिपोर्ट में एंटीबायोटिक दवाओं के 57 से 90 फीसदी बेअसर होने का खुलासा, मरीजों में रेजिस्टेंस बढ़ा, नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल को भेजी गई रिपोर्ट. रिसर्च के मुताबिक, एंटीबायोटिक दवाओं के अंधाधुंध और जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल की वजह से मरीजों के शरीर में इन दवाओं के प्रति रेजिस्टेंस तेजी से बढ़ रहा है. इसका नतीजा यह है कि सामान्य खांसी, जुकाम, एलर्जी या हल्के संक्रमण भी अब लंबे समय तक ठीक नहीं हो रहे. कई मामलों में मरीजों को साइड इफेक्ट के तौर पर खुजली, यूरिन इंफेक्शन जैसी समस्याओं का सामना भी करना पड़ रहा है.

जयपुर. जयपुर में एंटीबायोटिक दवाओं को लेकर एक गंभीर और चिंताजनक तस्वीर सामने आई है. बीमारियों के इलाज में वर्षों से कारगर मानी जाने वाली एंटीबायोटिक दवाएं अब बड़ी संख्या में मरीजों पर असर नहीं कर पा रही हैं. जयपुर के सवाई मानसिंह मेडिकल कॉलेज और अस्पताल की एक विस्तृत रिसर्च रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि अलग-अलग बीमारियों में इस्तेमाल की जा रही एंटीबायोटिक दवाएं 57 फीसदी से लेकर 90 फीसदी तक बेअसर या बेहद कम असरदार हो चुकी हैं. यह स्थिति न सिर्फ मरीजों के लिए परेशानी का कारण बन रही है, बल्कि डॉक्टरों और स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए भी एक बड़ी चेतावनी मानी जा रही है.

रिसर्च के मुताबिक, एंटीबायोटिक दवाओं के अंधाधुंध और जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल की वजह से मरीजों के शरीर में इन दवाओं के प्रति रेजिस्टेंस तेजी से बढ़ रहा है. इसका नतीजा यह है कि सामान्य खांसी, जुकाम, एलर्जी या हल्के संक्रमण भी अब लंबे समय तक ठीक नहीं हो रहे. कई मामलों में मरीजों को साइड इफेक्ट के तौर पर खुजली, यूरिन इंफेक्शन जैसी समस्याओं का सामना भी करना पड़ रहा है. एसएमएस मेडिकल कॉलेज की इस रिपोर्ट को नई दिल्ली स्थित नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल को भेजा गया है, ताकि राष्ट्रीय स्तर पर इस पर ठोस रणनीति बनाई जा सके.

मरीजों की आपबीती ने बढ़ाई चिंता
जयपुर के सवाई मानसिंह अस्पताल में इलाज के लिए पहुंची निर्मला देवी पिछले दो महीनों से खांसी से परेशान हैं. उन्होंने चार अलग-अलग डॉक्टरों को दिखाया और दवाएं भी बदलीं. खांसी की दवा के साथ एंटीबायोटिक की डोज भी ली, लेकिन इसके बावजूद उनकी खांसी ठीक नहीं हुई. निर्मला देवी का कहना है कि पहले दो दिन में खांसी ठीक हो जाती थी, लेकिन अब दवाएं लेने के बाद भी राहत नहीं मिल रही और एलर्जी की समस्या और बढ़ गई है. इसी तरह कतार में खड़े बुजुर्ग मरीज सैफुद्दीन भी दमे से परेशान हैं. उनका कहना है कि कोरोना से पहले एक-दो दिन में जुकाम ठीक हो जाता था, लेकिन अब दस दिन में भी सुधार नहीं होता और दवाएं असर नहीं कर रही हैं.

पांच अस्पतालों में दो साल का बड़ा अध्ययन
राजस्थान के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल एसएमएस मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल की टीम ने दो साल तक पांच अस्पतालों में कुल 9776 मरीजों पर यह अध्ययन किया. रिपोर्ट में सामने आया कि 57 से 90 फीसदी तक एंटीबायोटिक दवाएं कम असर कर रही हैं या बिल्कुल बेअसर हो चुकी हैं. अध्ययन में यह भी पाया गया कि साधारण जुकाम, खांसी जैसी बीमारियों में बिना जरूरत एंटीबायोटिक लेने से गंभीर बीमारियों में इन दवाओं का असर खत्म होने लगता है. करीब दस हजार मरीजों के सैंपल में एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति 60 से 98 फीसदी तक रेजिस्टेंस पाया गया.

डॉक्टरों की सलाह और आगे की चुनौती
इस रिसर्च की अगुवाई करने वाली माइक्रोबायोलॉजी विभाग की अध्यक्ष डॉ रजनी शर्मा का कहना है कि वायरल और एलर्जी की बीमारियों में बच्चों और बड़ों को दी जाने वाली एंटीबायोटिक दवाएं शरीर में रेजिस्टेंस पैदा कर रही हैं. कोरोना काल के बाद इन दवाओं का अत्यधिक उपयोग समस्या को और गंभीर बना रहा है. एसएमएस मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल और अस्पताल के कंट्रोलर डॉ दीपक माहेश्वरी ने बताया कि रिपोर्ट के बाद डॉक्टरों को सलाह दी जा रही है कि सामान्य बीमारियों में एंटीबायोटिक कम से कम दी जाए. उन्होंने साफ कहा कि जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल के कारण ही मरीज जल्दी ठीक नहीं हो पा रहे हैं.

नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल वर्ष 2015 से एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस पर काम कर रहा है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के लैंसेट जनरल में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, दुनियाभर में 12.9 लाख लोगों की मौत एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस के कारण हो चुकी है. विशेषज्ञों की सलाह है कि बिना डॉक्टर की सलाह के एंटीबायोटिक दवाएं बिल्कुल न ली जाएं. यह रिपोर्ट यह नहीं कहती कि सभी एंटीबायोटिक बेअसर हो चुकी हैं, लेकिन जिन मरीजों के शरीर में रेजिस्टेंट बैक्टीरिया बन चुका है, उनके लिए खतरा तेजी से बढ़ रहा है.

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Anand Pandey

नाम है आनंद पाण्डेय. सिद्धार्थनगर की मिट्टी में पले-बढ़े. पढ़ाई-लिखाई की नींव जवाहर नवोदय विद्यालय में रखी, फिर लखनऊ में आकर हिंदी और पॉलीटिकल साइंस में ग्रेजुएशन किया. लेकिन ज्ञान की भूख यहीं शांत नहीं हुई. कल…और पढ़ें

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