उज्जैन. हर इंसान के दिल में एक ही ख्वाहिश होती है कि शादी के बाद उसकी जिंदगी प्यार, समझ और भरोसे से भरी रहे. जीवनसाथी सिर्फ साथ निभाने वाला ही नहीं बल्कि हर सुख-दुख में हमसफर बने. घर में शांति हो, रिश्तों में अपनापन हो और भविष्य सुरक्षित महसूस हो लेकिन कई लोगों के जीवन में शादी के बाद हालात वैसे नहीं रहते जैसी उम्मीद की जाती है. कभी रिश्तों में तनाव आ जाता है, कभी जीवनसाथी की सेहत चिंता का कारण बनती है, तो कभी आर्थिक परेशानियां मन को बेचैन कर देती हैं. ऐसे में अक्सर मन में सवाल उठता है कि आखिर हमारी खुशियों में यह रुकावट क्यों आती है.
शुक्र ग्रह की स्थिति का अध्ययन
ज्योतिष शास्त्र में विवाह और दांपत्य जीवन के सुख का प्रमुख कारक शुक्रदेव को माना गया है. किसी भी विवाह मुहूर्त का निर्धारण करते समय सबसे पहले शुक्र ग्रह की स्थिति का गहन अध्ययन किया जाता है. यदि जन्मकुंडली में शुक्र ग्रह अस्त अवस्था में हो या अशुभ ग्रहों के प्रभाव में आ जाए, तो विवाह से जुड़े शुभ संयोग कमजोर पड़ जाते हैं और रुकावटें सामने आने लगती हैं. शास्त्रों के अनुसार सफल और सुखद विवाह के लिए गुरु बृहस्पति और शुक्र, दोनों ग्रहों का मजबूत और अनुकूल स्थिति में होना अत्यंत आवश्यक माना गया है. जब कुंडली में शुक्र ग्रह दुर्बल होते हैं, तब शुक्रवार के दिन सफेद रंग से जुड़ी वस्तुओं जैसे- दूध, दही, चावल, मिठाई, सफेद वस्त्र या सफेद फूलों का दान करना विशेष फलदायी माना गया है. ऐसे उपाय करने से शुक्रदेव की कृपा प्राप्त होती है, शुभ विवाह योग सक्रिय होने लगते हैं और वैवाहिक जीवन में आने वाली बाधाएं धीरे-धीरे दूर होने लगती हैं.
बृहस्पति ग्रह को विवाह और दांपत्य सुख का सबसे प्रभावशाली कारक माना गया है, खासतौर पर कन्या के विवाह में गुरु ग्रह की स्थिति को अत्यंत निर्णायक माना जाता है. यदि जन्मकुंडली में बृहस्पति ग्रह उच्च राशि में स्थित हो या अपनी मित्र राशि में बलवान अवस्था में हो, तो विवाह से जुड़ी किसी भी प्रकार की अड़चन नहीं आती और सुयोग्य जीवनसाथी मिलने के प्रबल संकेत बनते हैं. गुरु ग्रह की शुभ दृष्टि से विवाह के बाद जीवन में सुख-समृद्धि, मान-सम्मान, संतान सुख और मानसिक शांति बनी रहती है. वहीं यदि कुंडली में बृहस्पति ग्रह नीच अवस्था में हो या अशुभ ग्रहों के प्रभाव में आ जाए, तो विवाह में देरी, रुकावटें या बार-बार बाधाएं उत्पन्न होने की संभावना बढ़ जाती है. इस ग्रह के उपाय करने से यह भी शुभ फल देता है.
लग्न भाव और सप्तम भाव की भूमिका
ज्योतिष शास्त्र में लग्न भाव व्यक्ति के स्वभाव, व्यक्तित्व और जीवन की पूरी दिशा को दर्शाता है. यदि कुंडली के लग्न भाव पर किसी अशुभ ग्रह का प्रभाव बन रहा हो, तो विवाह से जुड़े मामलों में देरी या अड़चनें देखने को मिल सकती हैं. ऐसी स्थिति में प्रभावित ग्रह के मंत्रों का नियमित जाप और शास्त्रों में बताए गए दान करने से नकारात्मक प्रभाव धीरे-धीरे कम होने लगते हैं और विवाह के अनुकूल योग सक्रिय होने लगते हैं. दूसरी ओर सप्तम भाव को विवाह और वैवाहिक जीवन का सबसे अहम भाव माना गया है. जब इस भाव पर शुभ ग्रहों की दृष्टि होती है, सप्तमेश मजबूत अवस्था में होते हैं और संबंधित ग्रह अनुकूल स्थिति में होते हैं, तब विवाह के योग जल्दी बनते हैं और दांपत्य जीवन में सुख, स्थिरता और सकारात्मक परिणाम प्राप्त होते हैं.
Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी, राशि-धर्म और शास्त्रों के आधार पर ज्योतिषाचार्य और आचार्यों से बात करके लिखी गई है. किसी भी घटना-दुर्घटना या लाभ-हानि महज संयोग है. ज्योतिषाचार्यों की जानकारी सर्वहित में है. बताई गई किसी भी बात का Local-18 व्यक्तिगत समर्थन नहीं करता है.
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