बीसवीं सदी के महान संत धूनीवाले दादाजी, खंडवा की संत परंपरा के प्रतीक; आस्था और चमत्कारों का जीवंत केंद्र

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आज खंडवा शहर सहित देश-विदेश में धूनीवाले दादाजी के 27 धाम हैं, जहां लगातार धूनी जल रही है। भक्तों का विश्वास है कि दादाजी की कृपा से आज भी यहां आने वाले श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

मध्य प्रदेश के खंडवा की पहचान सिर्फ एक धार्मिक नगरी के रूप में नहीं, बल्कि संत परंपरा के एक प्रमुख केंद्र के रूप में भी है. बीसवीं सदी के महान संत धूनीवाले दादाजी का नाम इस पावन धरती से जुड़ा है. जिन्हें श्रद्धालु भगवान शंकर का अवतार मानते है. आज भी देश-विदेश से लोग खंडवा स्थित उनके धाम पर आकर अपनी मनोकामनाएं रखते है और माथा टेकते है. धूनीवाले दादाजी को भक्त बड़े दादाजी या श्री दादाजी के नाम से भी संबोधित करते है. उनका जीवन रहस्यों से भरा हुआ था. कहा जाता है कि उनका वास्तविक नाम केशवानंद जी महाराज था. उनके प्रमुख शिष्य हरिहर भोले भगवान, जिन्हें छोटे दादाजी कहा जाता है, भी उन्हीं के साथ समाधिस्थ है.

LOCAL 18 से बातचीत में दादाजी के भक्त लव जोशी बताते है कि धूनीवाले दादाजी की पहली प्रकट लीला मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले के साईं खेड़ा गांव में मानी जाती है. मान्यता है कि वे गांव के एक पेड़ के नीचे अचानक प्रकट हुए और वहीं पवित्र धूनी प्रज्वलित की जो आज भी निरंतर जल रही है. भक्तों के अनुसार, दादाजी की धूनी से कई चमत्कार जुड़े है. कहा जाता है कि जब दादाजी इस धूनी में चने डालते थे तो वे सोने-चांदी या हीरे-मोती में बदल जाते थे. भक्त अपनी बहुमूल्य वस्तुएं श्रद्धा के साथ धूनी में अर्पित करते थे.

लव जोशी आगे बताते है कि दादाजी साईं खेड़ा में कई चमत्कार दिखाने के बाद खंडवा पहुंचे. यहीं मार्गशीर्ष माह वर्ष 1930 में उन्होंने समाधि ली. जिस स्थान पर उन्होंने समाधि ली. आज वहीं उनका भव्य समाधि स्थल बना हुआ है. हालांकि धूनीवाले दादाजी का जीवन वृत्तांत प्रामाणिक रूप से बहुत कम उपलब्ध है. लेकिन उनकी महिमा, आस्था और चमत्कारों से जुड़ी कहानियां आज भी लोगों के बीच जीवित है. दादाजी प्रतिदिन पवित्र धूनी के सामने बैठकर ध्यान करते थे. इसी वजह से वे धूनीवाले दादाजी कहलाए.

आज खंडवा शहर सहित देश-विदेश में धूनीवाले दादाजी के 27 धाम है. जहां लगातार धूनी जल रही है. भक्तों का विश्वास है कि दादाजी की कृपा से आज भी यहां आने वाले श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं पूरी होती है. खंडवा की यह संत परंपरा न सिर्फ आस्था की मिसाल है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक आध्यात्मिक धरोहर है.

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बीसवीं सदी के महान संत धूनीवाले दादाजी, खंडवा की संत परंपरा के प्रतीक

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