Balaji Wafers Success Story: ‘बालाजी वेफर्स’ का नाम तो आपने जरूर सुना होगा. हाल ही में इस कंपनी से जुड़ी हुई बड़ी खबर सामने आई. बालाजी वेफर्स में जनरल अटलांटिक 7% हिस्सेदारी 2500 करोड़ में खरीदने की तैयारी कर रही है. लेकिन क्या आपको पता है कि इसकी शुरुआत एक 25 साल के लड़के ने की थी. जी हां, ये लड़का अपने घर के बने चिप्स लेकर साइकिल पर दुकान-दुकान जाता था. उसकी साइकिल पुरानी थी और उसके साधारण लुक की वजह से कई दुकानदार उसे तक देखने की जहमत नहीं उठाते थे, और सीधे-सीधे उसके चिप्स अपनी दुकान में रखने से मना कर देते थे.
उस वक्त शायद किसी ने ख्वाब में भी नहीं सोचा होगा कि यही लड़का आगे चलकर भारत का वेफर किंग बनेगा, और देश भर के लाखों दुकानदार उसके प्रोडक्ट्स रखने के लिए मजबूर हो जाएंगे. चंदुभाई विरानी का जन्म 1957 में गुजरात के छोटे से गांव धुंधोराजी में हुआ था. गांव में बिजली तक नहीं थी, सब खेती पर निर्भर थे.
90 रुपये महीने की नौकरी से चलाया घर
साल 1972 में देश में भयंकर सूखा पड़ा और फसलें बर्बाद हो गई. पिता ने मजबूरी में पैतृक जमीन 20 हजार रुपये में बेच दी और तीन बेटों में पैसे बांट दिए. 17 साल के चंदुभाई को सिर्फ 6 हजार रुपये. वे दो भाइयों के साथ राजकोट आ गए. पहले फर्टिलाइजर का छोटा कारोबार शुरू किया, लेकिन सप्लायर ने नकली माल थमा दिया. उनकी सारी पूंजी डूब गई. वह सड़क पर आ गए थे, लेकिन गांव लौटना मंजूर नहीं था. फिर एक दिन एस्ट्रॉन सिनेमा में 90 रुपये महीने की नौकरी मिली. उन्होंने पोस्टर चिपकाने शुरू किए, टिकट चेक किए, सफाई भी की और सीट तक को सिलने का काम किया. सिनेमा का मालिक इतना खुश हो गया कि उन्होंने कैंटीन का कॉन्ट्रैक्ट दे दिया.
चंदुभाई को महीने का सिर्फ 1000 रुपये किराया देना था, बाकी सारा मुनाफा उनका अपना था. वह कैंटीन में सैंडविच, कोल्ड ड्रिंक और आलू चिप्स बेचते थे. उन्होंने इस दौरान एक चीज नोटिस की कि 80 प्रतिशत कमाई सिर्फ चिप्स से हो रही है, वो भी इंटरवल के 10-15 मिनट में लोग सबसे ज्यादा इसे खरीद रहे हैं. लेकिन चिप्स का सप्लायर या तो देरी से इसे लाता या कम लाता है. छह साल तक यही परेशानी चली. आखिर 1982 में चंदुभाई ने ठान लिया कि अब खुद चिप्स बनाएंगे.
कैसे पड़ा बालाजी वेफर्स का नाम?
उन्होंने हनुमान मंदिर से प्रेरणा लेकर ब्रांड नाम रखा ‘बालाजी वेफर्स’ रखा. इस बिजनेस में उन्होंने 10 हजार रुपये लगाए और घर के आंगन में छोटा शेड बनाया. वह महंगी मशीन नहीं खरीद सकते थे तो खुद ही पार्ट्स जोड़कर 5 हजार में मशीन बना ली. दिन में कैंटीन का काम करते थे और रात में घर पर चिप्स बनाते. इतना ही नहीं, उनका पूरा परिवार इसमें लगा रहता था. उन्होंने सबसे बड़ा फंडा ये अपनाया कि ग्राहक को कम पैसे में ज्यादा चिप्स दें. इसलिए बालाजी के पैकेट में दूसरों से 25-30 प्रतिशत ज्यादा चिप्स होते थे. स्वाद भी गुजराती जीभ के हिसाब से परफेक्ट था. पहले सिर्फ अपनी कैंटीन में वह ये पैकेट बेचते थे, फिर स्कूल की कैंटीन और राजकोट की 25-30 दुकानों में उन्होंने इन चिप्स को बेचना शुरू कर दिया. वह साइकिल पर जाते तो दुकानदार उन्हें गरीब समझकर भगा देते, लेकिन चंदुभाई हार नहीं माने.
धीरे-धीरे उनके चिप्स क्वालिटी में भी सुधार आने लगा. इसके बाद उन्होंने 50 लाख का कर्ज लिया और पहली सेमी ऑटोमैटिक फैक्ट्री लगाई लेकिन जिस कंपनी से प्लांट बनवाया था, वो बीच में बंद हो गई. इसमें उनके 50 लाख लगे थे और वह प्लांट अधूरा रह गया. चंदुभाई और उनके भाइयों ने हर मशीन खोलकर समझी, खुद ठीक की और चलाना शुरू कर दिया. इसके बाद उन्होंने 1995 में दूसरा प्लांट लगाया और 2002 में पूरी तरह ऑटोमेटेड फैक्ट्री में काम करने लगे. गुजरात में 2006 तक 90 प्रतिशत मार्केट उनके पास था.
Lays और Kurkure को दी टक्कर
इसके बाद उन्होंने धीरे-धीरे नए फ्लेवर जैसे चाट चस्का, केले के चिप्स, खाखरा, रतलामी सेव, पंजाबी तड़का भी एड किया. साथ ही बालाजी नमकीन भी शुरू किया. युवाओं के लिए नाचोज़, व्हीलोज़ जैसे नाम के हर प्रोडक्ट लॉन्च किए. आज उनके प्लांट में सब कुछ ऑटोमैटिक है. 2023 में पेप्सी ने 4000 करोड़ में खरीदने का ऑफर दिया था, लेकिन कंपनी ने मना कर दिया. आज बालाजी Lays और Kurkure को कड़ी टक्कर देता है. इसकी सबसे बड़ी वजह ये भी है कि उनके प्रोडक्ट्स में चिप्स की जगह हवा ज्यादा होती थी और बालाजी वेफर्स ने इस बात को ही अपनी मार्केटिंग का हिस्सा बनाया. इस कमजोरी को टारगेट करते हुए, बालाजी वेफर्स ने अपना मैसेज “कम हवा, ज्यादा वेफर्स, और जबरदस्त फ्लेवर्स” बनाया. इसके प्रोडक्ट लाखों दुकानों पर हैं, 25 देशों में एक्सपोर्ट होते हैं, सालाना टर्नओवर 5000 करोड़ से ज्यादा. और ये सारा साम्राज्य उस लड़के ने खड़ा किया जो कभी साइकिल पर चिप्स बेचता था और दुकानदार उसे भगा देते थे. चंदुभाई विरानी ने साबित कर दिया – अगर हिम्मत और मेहनत हो तो साइकिल से भी साम्राज्य बनाया जा सकता है. ये है असली मेड इन इंडिया की सफलता की कहानी.
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