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देहरादून: आपके घर या आस-पास अक्सर छोटी-छोटी चीजें नजर आती हैं, जिनका महत्व हम समझते नहीं. ऐसी ही एक अद्भुत चीज है दूब घास. उत्तराखंड में पाए जाने वाली यह दूब साधारण घास से अलग है. यह न केवल सांस्कृतिक प्रतीक है, बल्कि एक प्राकृतिक औषधि और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने वाला महत्वपूर्ण तत्व भी है.
दूब घास साल भर हरी रहने वाली अद्भुत वनस्पति है, जिसे इसके अमरत्व और निरंतरता के गुणों के कारण जीवन के शुभ कार्यों में शामिल किया जाता है. यह पहाड़ी और मैदानी इलाकों में पशुओं के लिए पोषणयुक्त चारा भी प्रदान करती है, जिससे मवेशियों का स्वास्थ्य बेहतर रहता है. इसके अलावा, दुब घास मधुमेह रोगियों के लिए भी फायदेमंद मानी जाती है.

डायबिटीज के मरीज ताजी दूब घास को पानी में उबालकर सेवन करें तो इसका असर ब्लड शुगर लेवल पर काफी सकारात्मक होता है. शोध के अनुसार, इससे ब्लड शुगर में 59% तक की कमी देखी जा सकती है, जिससे यह एक प्रभावी और प्राकृतिक उपाय के रूप में जाना जाता है.

दूब घास धार्मिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्व रखती है. इसे भगवान श्रीगणेश की प्रिय माना जाता है और किसी भी शुभ कार्य या पूजा में इसका उपयोग अनिवार्य माना जाता है. पूजा से पहले दूब अर्पित करना शुभ और मंगलकारी माना जाता है, जो इसकी पवित्रता और महत्व को दर्शाता है.
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पशु चिकित्सक डॉ. माधव के अनुसार, सर्दियों में पशुपालकों को अपने जानवरों को दूब घास अधिक से अधिक खिलानी चाहिए. यह घास न केवल पौष्टिक है, बल्कि पशुओं की सेहत को बनाए रखने में भी मदद करती है. साथ ही, दूब घास आसानी से उपलब्ध होने के साथ उगाने में भी आसान है, जिससे यह एक किफायती और प्रभावी विकल्प बन जाती है.

डॉ. शालिनी के अनुसार, दूब घास में ग्लाइसेमिक इंडेक्स संतुलित मात्रा में होता है, इसलिए यह शुगर के मरीजों के लिए फायदेमंद है. इसके अलावा, दूब का रस हरा रक्त माना जाता है क्योंकि इसे पीने से एनीमिया जैसी समस्याओं में राहत मिल सकती है.

दूब घास खून को शुद्ध करके रेड ब्लड सेल्स बढ़ाने में मदद करती है, जिससे हीमोग्लोबिन का स्तर भी सुधरता है. साथ ही, सुबह नंगे पांव हरी दूब घास पर चलने से माइग्रेन के दर्द में राहत मिलती है.

डॉ. शालिनी के अनुसार, दूब घास का नियमित सेवन पेट संबंधी बीमारियों के जोखिम को कम करता है और पाचन तंत्र को भी सही बनाए रखता है.
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