छोटे किसानों के लिए बड़ा बाजार तैयार कर रही काबुली चने की फसल, सफलता का मंत्र

रीवा. चना देश की सबसे महत्वपूर्ण दलहनी फसल है. चने को दालों का राजा भी कहा जाता है, खासकर काबुली चने की तो बात ही अलग होती है. इसका उत्पादन उत्तरी भारत और मध्य भारत में बहुत बड़े पैमाने पर किया जाता है. संरक्षित नमी वाले शुष्क क्षेत्रों में इसकी खेती आसानी से की जा सकती है. काबुली चना एक शुष्क और ठंडी जलवायु की फसल है. इसे रबी मौसम में उगाया जाता है. इसकी खेती के लिए मध्यम वर्षा और सर्दी वाले क्षेत्र सर्वाधिक उपयुक्त हैं. काबुली चने की खेती के लिए 24 से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान उपयुक्त माना जाता है. यह खेती हल्की से भारी मिट्टी में की जाती है लेकिन अधिक जल धारण और उचित जल निकास वाली मिट्टी सर्वोत्तम रहती है. लवणीय और क्षारीय भूमि जहां जल निकास की समस्या है, वो भूमि इसकी खेती के लिए उपयुक्त नहीं है. इसके अच्छे विकास के लिए 5.5 से 7 पीएच वाली मिट्टी अच्छी होती है.

चना मुख्यतः दो प्रकार का होता है, देशी चना और काबुली चना. काबुली चने की कई किस्में होती हैं.
1. जी.एन.जी. 1969 (त्रिवेणी)- इसके दाने का रंग मटमैला सफेद क्रीम रंग का होता है. झुलसा और जड़गलन आदि रोगों के प्रति मध्यम सहनशीलता रखता है. इसकी औसत पकाव अवधि 146 दिन है. एक हेक्टेयर में औसत पैदावार 22 क्विंटल तक पाई जाती है.

2.जी.एन.जी. 1499 (गौरी)- इसके बीज का रंग मटमैला सफेद होता है. फसल 143 दिन में पककर तैयार हो जाती है. एक हेक्टेयर में औसत पैदावार 18 क्विंटल तक हो जाती है.

3. जी.एन.जी. 1292- यह किस्म लगभग 147 दिन में पक जाती है. झुलसा, एस्कोकाईटा ब्लाइट, शुष्क जड़गलन आदि रोगों के प्रति मध्यम प्रतिरोधी है. औसत उत्पादन 23-25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक हो जाता है. इसके अलावा काबुली एक और काबुली दो किस्में खासकर विंध्य क्षेत्र के लिए बहुत अच्छी मानी जाती है.

भूमि उपचार 
काबुली चने में कई प्रकार के रोग और कीट लगते हैं. उनके नियंत्रण के लिए भूमि उपचार जरूरी है.

1. दीमक और कटवर्म से बचाव के लिए क्युनालफॉस (1.5 प्रतिशत) चूर्ण 6 किलो प्रति बीघा आखिरी जुताई से पहले खेत में मिलाएं.

2. दीमक नियंत्रण के लिए बिजाई से पूर्व प्रभावित क्षेत्र में 400 मिली क्लोरोपाइरिफॉस (20 EC) या 200 मिली इमिडाक्लोप्रीड (17.8 एसएल) का पांच लीटर पानी का घोल बनाकर 100 किलो बीज के हिसाब से उपचारित करें.

3. जड़ गलन और उखटा (उकसा) की समस्या से बचने के लिए बुवाई से पहले पांच किलो ट्राइकोडर्मा हरजेनियम और स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस जैव उर्वरक की पांच किलोग्राम मात्रा को 100 किलो अद्रतायुक्त गोबर (FYM) में अच्छी तरह मिलाकर 10-15 दिन छाया में रख दें. इसको बुवाई से पूर्व खेत में मिला दें. यदि स्यूडोमोनास उपलब्ध नहीं है, तो ट्राइकोडर्मा की मात्रा को 10 किलोग्राम तक किया जाता है.

बीजोपचार
1. जड़गलन और उकटा की रोकथाम के लिए बुवाई पूर्व 10 किलो ट्राइकोडर्मा हरजेनियम या 1.5 ग्राम कार्बेन्डेजिम (50 WP) या 2.5 ग्राम कार्बेन्डेजिम (25 एस.डी.) प्रति किलो के हिसाब से उपचारित करें.

2. एजोटोबैक्टर और पीएसबी कल्चर पाउडर के तीन पैकेट/600 ग्राम कल्चर से एक हेक्टेयर क्षेत्र के बीज को उपचारित कर बोने पर नत्रजन और फास्फोरस की बचत की जा सकती है. इसका परिणाम लाभकारी पाया गया है.

3. बारानी और सिंचित क्षेत्रों में बुवाई से पहले चार मिली क्लोरोपाइरिफॉस (20 ई.सी.) या दो मिली इमिडाक्लोप्रीड (17.8 एसएल.) को 50 मिली पानी में घोल बनाकर एक किलो बीज के हिसाब से उपचारित करें.

सिंचित चने की बुवाई 20 अक्टूबर से 15 नवंबर तक कर सकते हैं. चने की कतार से कतार की दूरी 30 सेमी रखें. सिंचित क्षेत्र में बीज की गहराई 7 सेमी उपयुक्त होती है. जिन क्षेत्रों में उकटा (विल्ट) प्रकोप है, वहां बुवाई गहरी और देरी से करनी चाहिए.

उर्वरक
चने के खेत में 15 टन गोबर की खाद या पांच क्विंटल वर्मी कम्पोस्ट का प्रयोग करें. अच्छी पैदावार के लिए 20 किलो नत्रजन, 40 किलो फास्फोरस प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें. मृदा परीक्षण के आधार पर 0.5% प्रतिशत जिंक सल्फेट के विलियन के दो पर्णीय छिड़काव फल विकास अवस्था पर करना चाहिए.

खरपतवार नियंत्रण और निराई-गुड़ाई 
1. बारानी क्षेत्रों में बुवाई के 5-6 सप्ताह बाद तक निराई-गुड़ाई करनी चाहिए.

2. खरपतवार नियंत्रण पेंडिमेथालिन (30 ई.सी.) खरपतवारनाशी के व्यपारिक उत्पाद की 2.4 किलोग्राम मात्रा को 600 लीटर पानी प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई के बाद बीज के उगने से पहले और समान छिड़काव करें.

सिंचाई 
प्रथम सिंचाई के 55-55 दिन बाद द्वितीय सिंचाई 100 दिन बाद करें लेकिन यदि एक ही सिंचाई करनी हो, तो 50-60 दिन बाद करें.

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