Gwalior News: ग्वालियर हाई कोर्ट की खंडपीठ ने गुना जिले के एक मुस्लिम युवक अरबाज की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को खारिज कर दिया. अरबाज ने अपनी हिंदू प्रेमिका को उसके घरवालों द्वारा बंधक बनाने का आरोप लगाते हुए यह याचिका दायर की थी. उसका कहना था कि उसकी प्रेमिका उसके साथ शादी करना चाहती है, लेकिन लड़की के परिवार वाले उसे जबरदस्ती घर में बंद करके रख रहे हैं.
युवक ने कोर्ट से गुहार लगाई थी कि उसकी प्रेमिका को आजाद कराया जाए और उसे उसके पास भेजा जाए. उसने दावा किया कि दोनों एक-दूसरे से प्यार करते हैं और शादी करना चाहते हैं. लेकिन लड़की के घरवाले इस रिश्ते के खिलाफ हैं और उसे बंधक बनाकर रखा है.
हाई कोर्ट ने याचिका की सुनवाई के दौरान मुस्लिम पर्सनल लॉ का हवाला दिया. कोर्ट ने कहा कि मुस्लिम विधि के आर्टिकल 259 के अनुसार, कोई मुस्लिम पुरुष अग्नि पूजा या मूर्ति पूजा करने वाली महिला से विवाह नहीं कर सकता. यानी हिंदू लड़की से मुस्लिम युवक का निकाह कानूनी रूप से मान्य नहीं होगा. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस्लामी कानून में ऐसी शादी की इजाजत नहीं है.
कोर्ट ने एक और महत्वपूर्ण बात कही. याचिका में लड़की के परिवार को पक्षकार नहीं बनाया गया था. यानी घरवालों को नोटिस तक नहीं दिया गया. कोर्ट ने पूछा कि जब परिवार को केस में शामिल ही नहीं किया, तो लड़की को बंधक कैसे माना जा सकता है? कोर्ट का कहना था कि बिना सबूत और बिना दूसरी पार्टी को सुनवाई का मौका दिए, ऐसे गंभीर आरोप नहीं लगाए जा सकते.
हाई कोर्ट ने कहा कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका तभी चलती है, जब साफ-साफ साबित हो कि कोई व्यक्ति गैरकानूनी तरीके से कैद है. लेकिन यहां न तो लड़की की तरफ से कोई शिकायत आई, न ही कोई मेडिकल या पुलिस रिपोर्ट पेश की गई. सिर्फ युवक का दावा है कि वह बंधक है. कोर्ट ने इसे आधारहीन बताया.
कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि दोनों वयस्क हैं, लेकिन शादी का फैसला व्यक्तिगत होता है. अगर लड़की खुद कोर्ट में आकर कहती कि वह आजाद है और शादी नहीं करना चाहती, तो बात अलग होती. लेकिन यहां लड़की का पक्ष ही नहीं सुना गया. इसलिए याचिका खारिज करना उचित है.
अरबाज ने कोर्ट में बताया कि दोनों कई साल से एक-दूसरे को जानते हैं. लड़की ने उसे फोन पर कहा था कि घरवाले उसे मारपीट कर रहे हैं और बाहर नहीं जाने दे रहे. लेकिन कोर्ट ने कहा कि फोन कॉल या मैसेज कोई कानूनी सबूत नहीं हैं. इसके लिए ठोस प्रमाण चाहिए.
अंत में हाई कोर्ट ने याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया. कोर्ट ने युवक को सलाह दी कि अगर शादी करनी है, तो कानूनी तरीके अपनाएँ. स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत दोनों धर्म के लोग शादी कर सकते हैं, लेकिन इसके लिए दोनों की सहमति और कोर्ट की प्रक्रिया जरूरी है. मुस्लिम पर्सनल लॉ में हिंदू लड़की से निकाह की मनाही है.
इस फैसले से साफ हो गया कि कोर्ट सिर्फ कानून के दायरे में फैसला करता है. प्यार और भावनाएँ महत्वपूर्ण हैं, लेकिन कानून से ऊपर नहीं. अगर लड़की खुद आजाद है और शादी करना चाहती है, तो उसे खुद आगे आना होगा. बिना उसके बयान के कोई कार्रवाई नहीं हो सकती. ग्वालियर हाई कोर्ट का यह फैसला कानूनी विशेषज्ञों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है. कई लोग इसे मुस्लिम पर्सनल लॉ की सख्ती का उदाहरण बता रहे हैं.
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