Ajab Gajab: गधों का मेला! दांत देखकर तय होती कीमत, शाहरूख-सलमान जैसे कई ऑप्शन, गुलाब जामुन खिलाकर होती शुरूआत

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Ajab Gajab Donkey Fair: एमपी के उज्जैन में हर साल देव उठनी एकादशी पर एक मेला लगता है. जिसे गधों का मेला कहा जाता है. इस मेलेकी खासियत ये है कि यहां दांत देखकर गधों की कीमत तय की जाती है.

शुभम मरमट / उज्जैन. मध्यप्रदेश के उज्जैन में हर साल देव उठनी एकादशी से लेकर कार्तिक पूर्णिमा तक गधों को बेचने का मेला लगता है. यहां बड़ी संख्या में पशु पालक गधे को बेचने और खरीदने आते हैं. यहां दांत देखकर कीमत तय होती है. वैसे तो यह मेला पांच दिन लगता है लेकिन जरूरत के हिसाब से बढ़ भी जाता है.

गधों के नाम भी अनोखे 
इन गधों के नाम की अगर बात करें तो इस मेले मे सलमान, शाहरुख, ऐश्वर्या, जैकलिन, शबनम और शबाना व अन्य फिल्मी सितारों के नाम इसमें शामिल है. ये कोई सितारे नहीं बल्कि गधे व खच्चर हैं. इस बार शाहरुख की कीमत 15000 तक लगाई जा रही है.हजारों की कीमत में गधे बिकने व खरीदने की ये परम्परा बरसो से चली आ रही है.

दूर-दूर से आते हैं व्यापारी
हर साल की तरह यहां प्रदेश के कई जिलों से आने वाले व्यापारी खच्चर और गधों की खरीदी करेंगे. प्रतिवर्ष यहां मप्र के अलावा राजस्थान, महाराष्ट्र प्रांतों के व्यापारी पशुओं की खरीदी करने आते हैं. खास बात यह है कि उम्र दात के हिसाब से गधों की कीमत लगाई जाती है.

इस बार इतनी है कीमत
मनोज बाबु लाल प्रजापत गधे वाले ने कहा कि पिछले कई साल से यहा पर गधे व खच्चर का व्यापार करते आ रहे हैं. उन्होंने बताया यहां पर सैकड़ों की संख्या में यह जानवर देखने को मिलेंगे, इनको खरीदने अन्य राज्यों से व्यापारी आते हैं. इनकी कीमत इनके दात देख कर लगाई जाती है. चार दात वाले की कीमत लगभग 15000 से चालू होती है. और दो दांत वालो की क़ीमत कम दाम यानी 8000 से चालू हो जाती है.

कार्तिक पूर्णिमा के पहले शुरू होता है मेला 
गधे पालक ने बताया कि कार्तिक पूर्णिमा से पहले यह मेला वर्षों से आयोजित होता आ रहा है, और यह परंपरा प्रजापत समाज द्वारा निभाई जाती है. इस बार भी व्यापारी अच्छी बिक्री की उम्मीद कर रहे हैं, जिससे मेले का माहौल उत्साहपूर्ण बना हुआ है.

कब से शुरू हुईं परम्परा 
स्थानीय लोगों का कहना है कि 16वीं शताब्दी में मुगल आक्रांता बादशाह औरंगजेब अपने काफिले के साथ चित्रकूट पर चढ़ाई करने आया था. यहां उसके काफिले में बहुत से घोड़े और गधे बीमारी से ग्रसित होकर मारे गए. काफिले में गधों की कमी होने पर उनकी पूर्ति के लिए स्थानीय स्तर पर पशु बाजार लगवाया गया था. तब से लेकर आज तक यह ऐतिहासिक गधा मेला लगता चला रहा है.

shweta singh

Shweta Singh, currently working with News18MPCG (Digital), has been crafting impactful stories in digital journalism for more than two years. From hyperlocal issues to politics, crime, astrology, and lifestyle,…और पढ़ें

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