14 मिनट पहले
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सवाल– मेरी उम्र 26 साल है। मैं पटना में अपने पेरेंट्स के साथ रहती हूं। 20 साल की उम्र से मेरा बस एक ही सपना है कि मुझे पटना से बाहर निकलना है। मैं बड़े शहर जाना, बड़ी दुनिया देखना, अपने पैरों पर खड़े होना, अपने दम पर जीना चाहती हूं, लेकिन मेरे घरवाले मुझे पटना से बाहर पैर नहीं रखने देते। पहले मैं ग्रेजुएशन के लिए दिल्ली जाना चाहती थी, लेकिन उन्होंने जाने नहीं दिया। फिर पोस्ट ग्रेजुएशन भी मैंने पटना से ही किया। अब मैं जॉब के लिए दिल्ली जाना चाहती हूं, लेकिन अभी भी पेरेंट्स की यही जिद है कि जो भी करना है, यहीं रहकर करो। उन्हें लगता है कि बड़े शहर लड़कियों के लिए सुरक्षित नहीं होते। जबकि मेरा भाई पढ़ने और नौकरी करने के लिए बाहर गया। एक ही जिंदगी है, मैं किसी की बहू बनकर नहीं गुजार सकती। मैं इस घर में हर दिन घुटन महसूस करती हूं। दिल करता है, घर से भाग जाऊं। प्लीज बताइए मैं क्या करूं।
एक्सपर्ट– डॉ. द्रोण शर्मा, कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट, आयरलैंड, यूके। यूके, आयरिश और जिब्राल्टर मेडिकल काउंसिल के मेंबर।
आपकी मन:स्थिति का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण
हमसे अपना मन साझा करने और सवाल पूछने के लिए बहुत शुक्रिया। मैं आपकी मन:स्थिति समझ सकता हूं। आप जीवन से जो चाहती हैं, वो बहुत बुनियादी मानवीय अधिकार है। अपना जीवन गढ़ने का स्पेस और आजादी तो हर इंसान को मिलनी ही चाहिए।
यह बात सिर्फ करियर या स्वतंत्रता की नहीं है, बल्कि मनोवैज्ञानिक स्वायत्तता (साइकोलॉजिकल ऑटोनॉमी) की भी है। किसी भी इंसान के स्वस्थ और संपूर्ण विकास के लिए मनोवैज्ञानिक स्वायत्तता और अपने जीवन का अधिकार बहुत जरूरी है। भारतीय परिवारों में प्यार और नियंत्रण अक्सर एक साथ चलते हैं, जहां सुरक्षा के नाम पर बेटी के विकास को सीमित कर दिया जाता है।
आइए समझते हैं कि इस व्यवहार का किसी व्यक्ति के मनोविज्ञान पर क्या प्रभाव पड़ता है ।

1. भावनात्मक घुटन
जब व्यक्ति को अपने फैसले खुद लेने का मौका नहीं मिलता तो वह एक तरह की लाचारी महसूस करता है। यह लाचारी हमारे व्यक्तित्व का हिस्सा नहीं होती। ऐसा नहीं है कि हम बुनियादी रूप से कमजोर और विवश हैं, बल्कि यह “लर्नड हेल्पलेसनेस” (सीखी हुई लाचारी) होती है। इससे आत्मविश्वास कम होता है और निराशा की भावना बढ़ती है।
2. जेंडर भेदभाव
भाई को स्वतंत्रता देना और बहन को सुरक्षा के नाम पर रोके रखना, यह दोहरा मानदंड लड़कियों के आत्म-सम्मान को बहुत गहरी चोट पहुंचाता है।
3. अधूरी आकांक्षाएं
सपनों को लगातार दबाया जाना “असंतोष, गुस्सा और भागने की इच्छा” को जन्म देता है। यह बदलाव की पुकार है, यह विद्रोह नहीं है।
4. पहचान का संकट
युवावस्था इस खोज का समय होता है कि “मैं कौन हूं।” हर संवेदनशील और जिज्ञासु इंसान इस उम्र में दुनिया में अपनी जगह खोजने और बनाने की कोशिश कर रहा होता है। ऐसे में अगर किसी से यह मौका छीन लिया जाए और उसे कहा जाए कि उसकी जगह हमने पहले से बना दी है तो इससे उसका विकास रुक जाता है। जब परिवार यह निर्णय अपने हाथ में रखता है तो व्यक्ति की आत्म-पहचान विकसित नहीं हो पाती।

मैं आगे आपको सेल्फ हेल्प के और अपने माता-पिता से बात करने के लिए कुछ टिप्स और टूल्स दूंगा, लेकिन उससे पहले आइए समझते हैं कि घर से दूर रहना के साइकोलॉजिकल बेनिफिट्स क्या हैं।
घर से दूर रहने के मनोवैज्ञानिक लाभ
1. सच्ची आत्मनिर्भरता
जब बच्चों के जीवन के सारे निर्णय माता-पिता लेते हैं, तो बच्चा परिणामों का अनुभव नहीं कर पाता। अपने दम पर निर्णय लेना आत्मविश्वास और जिम्मेदारी सिखाता है।
2. प्रॉब्लम सॉल्विंग स्किल
घर से दूर बाहर रहने पर हमें रोजमर्रा की जिंदगी की छोटी-छोटी प्रॉब्लम्स को खुद ही सॉल्व करना होता है। हम अपनी गलतियों से सबक सीखते हैं। इससे जीवन की प्रैक्टिकल समझ बनती है, प्रॉब्लम सॉल्विंग स्किल मजबूत होती है। यही मानसिक मजबूती है।
3. पहचान का विस्तार
घर के रोल से बाहर निकलकर “मैं कौन हूं” की खोज होती है और यह आत्म-विकास का सबसे महत्वपूर्ण चरण है।
4. इमोशनल मैच्योरिटी
असफलता से निपटना, अकेले निर्णय लेना और खुद के साथ एक डायलॉग विकसित करना, इन सारी चीजों से इमोशनल मैच्योरिटी आती है।
5. सोशल स्किल
अलग-अलग तरह के लोगों से मिलने से हमारा नजरिया बड़ा होता है, हम विविधता का अनुभव करते हैं और हमारे भीतर सहिष्णुता भी बढ़ती है।
6. परिवार से बेहतर रिश्ता
थोड़ी दूरी से रिश्ते और भी गहरे और सम्मानजनक बनते हैं। मनोविज्ञान की भाषा में इसे “हेल्दी डिस्टेंस विद कनेक्शन” कहते हैं। इसका अर्थ है अलग और दूर रहकर भी गहराई से जुड़े रहना।

अपने पेरेंट्स से बात कैसे करें
स्टेप-बाय-स्टेप प्लानिंग
आपको बहुत समझदारी के साथ स्ट्रेटजी बनाकर अपने मम्मी-पापा से बातचीत करने की जरूरत है। उन्हें समझाने की जरूरत है कि आपके लिए घर से बाहर निकलना, जॉब करना, आत्मनिर्भर होना और अपने फैसले खुद लेना क्यों जरूरी है।
इसके लिए मैं आपको छह चरणों की एक कंप्लीट स्ट्रेटजिक प्लानिंग बनाकर दे रहा हूं। इसके जरिए आप सम्मान, कृतज्ञता और आत्मविश्वास के साथ अपनी बात पेरेंट्स के सामने रख सकती हैं।
स्टेप 1
सही समय और माहौल चुनें
बात तब करें, जब घर का वातावरण शांत हो। याद रखें, हमारा मकसद “लड़ाई करना” नहीं, बल्कि ये है कि हमारे पक्ष को “समझा जाए”।
स्टेप 2
अपनी फीलिंग्स और ग्रैटीट्यूड व्यक्त करें
अपनी बात कहने से पहले उन्होंने आज तक आपके लिए जो किया है, उसके लिए शुक्रिया अदा करें। उन्हें बताएं कि आप उन्हें कितना प्यार करती हैं। उनका होना आपके लिए कितना कीमती है। जैसेकि-
- “मम्मी-पापा, आपने मुझे बहुत मजबूती से पाला है।”
- “आपने सिखाया कि सही-गलत में फर्क कैसे करें, लोगों को कैसे परखें और खुद को सुरक्षित कैसे रखें।”
- “आपकी परवरिश ने मुझे एक मजबूत नैतिक आधार दिया है।”
- “मैं जो जीवन में यहां तक पहुंची हूं, वो आपकी ही मेहनत और शिक्षा का फल है।”
- “लेकिन अब जब मैं अपने दम पर आगे बढ़ना चाहती हूं, ये आपके ही दिए संस्कार और सीख हैं कि मेरे भीतर ये आत्मविश्वास आया है।”
- “मैं बाहर जाकर उन तमाम स्किल्स को और तराशना चाहती हूं, जो आपने ही मुझे सिखाया है। चाहती हूं कि आपकी ही शिक्षाओं को अब व्यवहार में उतार सकूं।”
- “मुझे लगता है कि यहां रहकर मैं अपनी क्षमता का पूरी तरह इस्तेमाल नहीं कर पा रही हूं।”
- “मैं अपने दम पर खड़ी होना चाहती हूं, ताकि आपको गर्व हो कि आपकी बेटी आपके सिखाए रास्ते पर चलकर जिम्मेदारी ले रही है।”
जब आप इस तरीके से बात करेंगी तो यह दिखाता है कि आपकी आजादी की चाह उनकी ही परवरिश का परिणाम है। यह उनका विरोध नहीं है।
स्टेप 3
उनकी चिंताओं को स्वीकार करें
माता-पिता के जो भी कंसर्न हैं, उन्हें नकारने की बजाय उन्हें भी एक्सेप्ट करें। जैसेकि
- “मुझे पता है कि बड़े शहर में मेरी सुरक्षा को लेकर आपको डर लगता है। आपकी चिंता बिल्कुल जायज है।”
- “मैं वहां पर वो सारी बातें ध्यान रखूंगी, वो सारी सावधानियां बरतूंगी, जो आपने मुझे सिखाई हैं।”
- “जैसेकि सेफ हॉस्टल चुनना, अपनी लोकेशन शेयर करना और हमेशा कॉन्टैक्ट में रहना।”
- “आपकी चिंता मुझे डराती नहीं, बल्कि और ज्यादा सजग, सावधान रहने और पूरी तैयारी के साथ कदम बढ़ाने की ताकत देती है।”
स्टेप 4
व्यवहारिक विकल्प दें
पेरेंट्स को बीच का रास्ता सुझाएं और उन्हें कुछ ऐसे प्रैक्टिकल विकल्प दें, जिन्हें स्वीकारना उनके लिए बहुत कठिन न हो। जैसेकि:
- “अगर आप चाहें तो हम छह महीने का ट्रायल रख सकते हैं।”
- “मैं अपनी सुरक्षा और जिम्मेदारियों की रिपोर्ट आपको देती रहूंगी।”
- “यह कोई अचानक फैसला नहीं, बल्कि बहुत सोच-समझकर लिया गया निर्णय है।”
स्टेप 5
आजादी के मायने
अपने पेरेंट्स को समझाएं कि आजादी का मतलब परिवार से दूर होना नहीं, बल्कि परिवार को भीतर अपने साथ लेकर आगे बढ़ना होता है। जैसेकि-
- “मुझे पता है कि घर छोड़ना आप लोगों को ‘दूरी’ जैसा लगेगा, पर मेरे लिए ये वही लाइफ स्किल और वैल्यूज हैं, जो आपने मुझे सिखाए हैं।”
- “आपने मुझे सिखाया कि रिस्क को कैसे समझना है, कैसे सही निर्णय लेना है, और कैसे कठिनाई में शांत रहना है।”
- “अब मैं वही स्किल असली जीवन में प्रैक्टिस करना चाहती हूं।”
- “मैं जहां भी रहूंगी, आपके संस्कार, आपकी सोच, और आपकी परवरिश मेरे भीतर होंगी।”
- “मैं ‘घर से निकल रही हूं,’ पर ‘घर को अपने भीतर लेकर’ जा रही हूं।”
मनोवैज्ञानिक रूप से इसे इंट्रोजेक्शन (Introjection) कहते हैं, यानी परिवार के मूल्यों को भीतर आत्मसात कर लेना। स्वतंत्रता का अर्थ अलग होना नहीं, बल्कि उन्हीं मूल्यों को अपने निर्णयों में जीवित रखना है।
स्टेप 6
इमोशनल क्लोजर
अपने माता-पिता से कहें-
- “मैं चाहती हूं कि जब मैं बाहर जाऊं, तो आप लोग मेंटली और इमोशनली मेरे साथ रहें।”
- “मैं डरने नहीं, सीखने जा रही हूं।”
- “मैं हमेशा आपकी बेटी रहूंगी। अब बस मैं अपने पंखों को आजमाने निकली हूं।”

चार हफ्ते का सेल्फ हेल्प प्लान
सप्ताह 1
फोकस- आत्म-पहचान
अभ्यास- अपनी ताकत, रुचियां, लक्ष्य सब एक कागज पर लिखें। खुद को रोज याद दिलाएं।
सप्ताह 2
फोकस- संवाद
अभ्यास- माता-पिता से शांत, स्पष्ट बातचीत करें।
सप्ताह 3
फोकस- व्यावहारिक योजना
अभ्यास- सुरक्षित रहने की योजना बनाएं। जॉब या कोर्स के विकल्प चुनें।
सप्ताह 4
फोकस- भावनात्मक दृढ़ता
अभ्यास- जर्नलिंग करें, माइंडफुलनेस का अभ्यास करें, या काउंसलर से बात करें।

कब मदद लेना जरूरी है
इन स्थितियों में तुरंत किसी क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट या साइकेट्रिस्ट से संपर्क करें।
- यदि घर से “भाग जाने” या “फंस जाने” जैसे विचार बढ़ रहे हों।
- यदि नींद, भूख, ध्यान या मनोदशा बिगड़ रही हो।
याद रखें, मदद लेना कमजोरी नहीं, बल्कि ताकत और परिपक्वता की निशानी है।

निष्कर्ष
जब बेटों को दुनिया देखने, बाहर जाकर पढ़ने और काम करने की छूट दी जाती है, लेकिन बेटियों को “सुरक्षा” के नाम पर रोका जाता है, तो इससे परिवार के भीतर अनजाने में असमानता और भावनात्मक दूरी पैदा होती है। बेटी जब देखती है कि उसका भाई वही आजादी पा रहा है, जो उससे छीन ली गई है, तो उसके भीतर कड़वाहट और आक्रोश जन्म लेता है। यह आक्रोश समय के साथ भाई से और पूरे परिवार से भावनात्मक दूरी में बदल सकता है।
और भी चिंताजनक यह है कि ऐसी असमानता बार-बार झेलने से बेटी भी अपने मन में यह मानने लगती है कि वह पुरुषों से “कमतर” है। यह सोच उसके आत्मविश्वास, महत्वाकांक्षा और सफलता की सीमाएं तय कर देती है। वह साहस के बजाय आज्ञाकारिता, और निर्णय की जगह निर्भरता सीखने लगती है।
किसी भी माता-पिता की यह इच्छा नहीं होती कि उनकी बेटी खुद को अपने भाई से कम समझे। सच्चा प्यार यही है कि बेटे और बेटी दोनों को बराबरी का मौका मिले ताकि दोनों अपनी क्षमता, गलती और अनुभव से सीखकर आगे बढ़ें।
परिवार के भीतर समान अवसर केवल सामाजिक आदर्श नहीं, बल्कि भावनात्मक स्वास्थ्य, आत्मसम्मान और पारिवारिक भरोसे की नींव है।
………………
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