Success Story: तीन दोस्तों पर हंसते थे दुकानदार! कहते थे- ‘पेंसिल बनाकर करोड़पति बनोगे?’ आज खड़ी कर दी 500 करोड़ की कंपनी

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Success Story: बचपन में रंग-बिरंगी पेंसिल से लिखना हर किसी को पसंद होता है लेकिन तीन दोस्त ऐसे भी थे जिन्होंने भारत में स्वदेशी पेंसिल लाकर एक नई पहचान बनाई. उनके इसी सपने पर दुकानदार हंसते थे और आज वहीं तीन दोस्त 500 करोड़ की कंपनी बना चुके हैं.

बचपन में आपने पेंसिल से खूब लिखा होगा. अलग-अलग रंग की पेंसिल हर बच्चे का एक यादगार साथ होती है. किसी को रबर वाली पेंसिल पसंद होती है तो किसी को कैप वाली. लेकिन क्या पता है कि भारत में मशहूर एक पेंसिल की कंपनी तीन दोस्तों ने शुरू की थी.

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नटराज और अप्सरा पेंसिल्स से बचपन में लिखते वक्त हाथ में वो मजबूती और स्मूथ फील, आज भी याद आता है. असल में ये कंपनी तीन दोस्तों की हिम्मत से बनी, जिनपर लोग ये कहकर हंसते थे- ‘तुम लोग पेंसिल बनाकर करोड़पति बनोगे’.

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साल 1950 में भारत में पढ़ाई का सपना तो लाखों बच्चों का था, लेकिन अच्छी पेंसिल तक नहीं. अमीर बच्चे महंगी विदेशी पेंसिल्स लेते, बाकी लोकल वाली जो कमजोर थीं, जल्दी टूट जातीं. मिडिल क्लास के लिए तो महंगी पेंसिल दूर की बात, बच्चे नरकट की कलम और दवात की स्याही से काम चलाते. अगर किसी के पास लकड़ी की पेंसिल आ जाती तो वो दोस्तों में वीआईपी बन जाता.

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इसी हालात में बड़े हुए बीजे सांगवी उर्फ बाबू भाई. पढ़ाई में तेज थे, लेकिन पैसे की तंगी ने हाई स्कूल के बाद रास्ता रोक दिया. इंजीनियरिंग का सपना अधूरा रह गया. बड़े होकर देखा कि गरीब बच्चों के पास साधारण पेंसिल तक नहीं. ठान लिया कि ये समस्या खत्म करेंगे.

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उस वक्त कैमलिन जैसी कुछ देसी कंपनियां पेंसिल बना रही थीं, लेकिन क्वालिटी विदेशी ब्रांड्स जितनी नहीं. मेड इन इंडिया को लो क्वालिटी समझा जाता, लोग भरोसा नहीं करते. लेकिन 1950 के अंत में सरकार ने स्वदेशी को बढ़ावा दिया, इंपोर्ट कम करने की कोशिश की. यही मौका था.

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बीजे सांगवी ने दोस्त रामनाथ मेहरा और मनसुखानी के साथ पेंसिल बनाने का फैसला लिया. पेंसिल बनाना आसान नहीं. टेक्नोलॉजी सिर्फ विदेशी कंपनियों के पास. तीनों जर्मनी गए, वहां की बेस्ट पेंसिल्स कैसे बनतीं, देखा, सीखा. रॉ मटेरियल की समस्या थी. हाई क्वालिटी वुड यानी सीडर वुड अमेरिका से आता, महंगा. ग्रेफाइट कोर के लिए कार्बन और क्ले का सटीक मिक्स चाहिए, जो स्मूथ और मजबूत हो. भारत में न लकड़ी मिलती, न प्योर ग्रेफाइट.

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लेकिन तीनों ने हार नहीं मानी. लकड़ी के लिए राज्यों के जंगलों में घूमे, सैंपल टेस्ट किए, फेल हुए लेकिन रुके नहीं. मशीनों का भी इश्यू था, फिर लोकल इंजीनियर्स, कारपेंटर्स से बात की, जुगाड़ से मशीन बनाई. बीजे सांगवी इतने परेशान कि नींद की गोली के बिना सोना मुश्किल. मेंटल हेल्थ प्रभावित, लेकिन हार नहीं मानी. अपग्रेड्स किए, मशीन तेज हुई.

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1958 में हिंदुस्तान पेंसिल्स लिमिटेड शुरू हुआ और नटराज 621 लॉन्च किया गया. लेकिन लोग मेड इन इंडिया पर भरोसा नहीं करते, दुकानदार रखने को तैयार नहीं. फिर स्ट्रैटेजी बदली. धीरे-धीरे कंपनी बड़ी हुई और आज नटराज की मूल कंपनी हिंदुस्तान पेंसिल्स प्राइवेट लिमिटेड ने 2024 वित्तीय वर्ष में 500 करोड़ रुपये से अधिक की कमाई कर चुकी है. तीन दोस्तों की मेहनत ने सपना सच किया, ये हमें सिखाया कि हिम्मत और इनोवेशन से कुछ भी मुमकिन. नटराज-अप्सरा अब यादों का हिस्सा.

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