मप्र की 5 हजार हेरिटेज साइट खतरे में: बिना सोचे किए जा रहे विकास को बताया बर्बादी का कारण – Bhopal News

मप्र की 5 हजार से अधिक ऐतिहासिक धरोहरें खतरे में हैं। बिना सोचे विकास कार्याे के कारण वे बर्बाद हो रही हैं। इन हेरिटेज साइट को बचाने के लिए तीन साल पहले ड्राफ्ट बनाया गया, लेकिन मप्र में नीति नहीं बन सकी। हाल ही में अटल बिहारी वाजपेयी सुशासन एवं नीति

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इसमें लिखा है कि ड्राफ्ट बनने के बाद असंरक्षित हेरिटेज साइट की लिस्ट भी बनाई, हेरिटेज साइट को लेकर नियम भी बनाए, पर लागू नहीं किए गए।

राज्य सरकार ने “अनप्रोटेक्ट बिल्ट हेरिटेज ऑफ मप्र” बनाई थी, लेकिन यह फाइलों में बंद है। सुशासन एवं नीति विश्लेषण संस्थान ने ही वर्ष 2022 में इस नीति का ड्राफ्ट तैयार किया था, जिसका उद्देश्य था पूरे राज्य में पुरातात्विक, स्थापत्य और सांस्कृतिक धरोहरों की पहचान करके उन्हें सुरक्षित करना और उन्हें पुनर्जीवन देना।

खासकर जो हेरिटेज साइट केंद्र और राज्य की सूची में संरक्षित घोषित नहीं हैं। इसमें राज्य की हजारों प्राचीन इमारतें, मंदिर, हवेलियां, बावड़ी और तालाब शामिल हैं। इन धरोहरों को बचाने के लिए डिस्ट्रिक्ट आर्केलॉजी टूरिज्म एंड कल्चर काउंसिल (डीएटीसीसी) को नोडल एजेंसी बनाकर सब हेरिटेज डिपार्टमेंट की स्थापना का प्रस्ताव दिया गया था। इसको ही संरक्षण, प्रबंधन, और इनके डे वलपमेंट की जिम्मेदारी सौंपी जानी थी।

चार बिंदुओं पर करना था काम

पहला काम : ऐसी धरोहरों की पहचान करना था, जो सं​रक्षित घोषित नहीं है। जिलास्तर पर भौतिक परीक्षण करके इसका सार्वजनिक डेटाबेस बनाना था और इसके बाद इसका प्रकाशन होना था। लेकिन एक भी जिले में “नोटिफाइड अनप्रोटेक्टेड साइट्स” की सूची नहीं बनी और न राज्य स्तर पर कोई डेटाबेस जारी हुआ।

दूसरा काम : इन असुरक्षित हेरिटेज साइट्स को कानूनी सुरक्षा देना था। इसमें मान्यता प्राप्त धरोहरों की सुरक्षा के लिए राज्य को कानून बनाना होगा, ताकि उनके साथ की जा रही छेड़छाड़ या बदलाव पर रोक लगाई जा सके। रिपोर्ट में बताया कि आज तक न हेरिटेज प्रोटेक्शन एक्ट नहीं बनाया और न ही किसी प्रकार के दंड का प्रावधान किया गया है।

तीसरा काम: हर साइट के लिए एक निगरानी करने वाला प्रबंधक नियुक्त करने की अनुशंसा की गई थी। साथ ही, धरोहरों के चारों ओर बफर जोन बनाने, अतिक्रमण हटाने और अवैध निर्माण को रोकने का काम करना था। इसमें भोपाल, उज्जैन और जबलपुर की पुरानी हवेलियों और मंदिरों का उदाहरण देते हुए लिखा ​है कि इनके आसपास तेज़ी से निर्माण हो रहे हैं, जिन पर किसी तरह की रोक नहीं।

चौथा काम : इसके तहत जनभागीदारी के तहत काम करके गैर स्वयंसेवी संस्थाओं, समूहों को जोड़कर इसे जनआंदोलन बनाने की बात कही है। लेकिन न तो किसी जिले में हेरिटेज क्लब बना, न कोई प्रशिक्षण हुआ और न कोई अभियान चला। रिपोर्ट में बताया कि तीन वर्ष में किसी विभाग ने न तो ऐसा सहयोग हासिल किया और न कोई रिपोर्ट जारी की, जबकि ड्राफ्ट के तहत हर साल ऑडिटिड फाइनेंस स्टेटमेंट पब्लिक डोमेन में जारी करना था।

पुरानी इमारतें ढह गई

नीति के तहत हर धरोहर के लिए फायर मैनेजमेंट और ​डिजास्टर माइग्रेशन प्लान बनाया जाना था। किसी भी जिले में यह काम नहीं हुआ। उलटा जिन स्मारकों में फायर सेफ्टी लगी है, उनकी जांच नहीं होती है और न ही किसी आपदा स्थिति के लिए एसओपी बनाई गई है। इसके चलते पिछले साल बारिश के दौरान जबलपुर और मंदसौर में कई पुरानी इमारतें ढह गईं।

यहां की हालत खराब

भोपाल में पुष्पा नगर में बनी बावड़ी, गिन्नौरगढ़ का किला, चौधरी हवेली राम नगर, देवगढ़ किला, हटा सागर में अंग्रेजों के जमाने की बिल्डिंग, थूभोन के मंदिर, बांधवगढ़ का मंदिर, चंदेरी किले की दीवारें, देवगढ़ की बावड़ी, उदयपुरा की छतरी, जावरा पैलेस, सिंगरौली किला, हट्टा किला, चंदेरी की हवेली समेत कई स्थान शामिल है।

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