7 अनोखी दिवाली- अरुणाचल में मक्खन के दीये जलते हैं: न पटाखों का शोर, न प्रदूषण; लकड़ी के लैंटर्न, हर्बल पटाखों से होती है इकोफ्रैंडली रोशनी

तवांग28 मिनट पहले

  • कॉपी लिंक

मक्खन के दीपक शुभ दिनों और जन्मदिन और विवाह जैसे अवसरों पर भी जलाए जाते हैं।

अरुणाचल का सीमावर्ती इलाका तवांग इस बार भी अनोखी और आध्यात्मिक दिवाली की रोशनी में नहाया हुआ है। देश के बाकी हिस्सों में जहां आतिशबाजी और शोर से भरी रातें होती हैं, वहीं तवांग में दिवाली का अर्थ है- शांति, प्रार्थना और बटर लैंप (मक्खन के दीये) की रोशनी।

यहां मोनपा जनजाति के लोग और बौद्ध अनुयायी अपने घरों और मठों में मक्खन के दीये जलाकर दीपोत्सव मनाते हैं। इसमें लकड़ी के लैंटर्न और हर्बल पटाखों से पर्यावरण के अनुकूल रोशनी की जाती है। इसे ज्ञान का प्रतीक माना जाता है।

स्थानीय धर्मगुरु रिंचेन लामा कहते हैं, ‘यह त्योहार सामाजिक मेलजोल और सद्भाव का प्रतीक बन चुका है।’ दिवाली के बाद यहां मनाया जाने वाला तवांग दीपोत्सव राज्य सरकार के सालाना तवांग महोत्सव का अहम हिस्सा है।

इस साल यह 27-31 अक्टूबर के बीच होगा, जिसमें पर्यटकों की भारी भीड़ आती है। साढ़े ग्यारह हजार फीट ऊपर बसा तवांग जब दीयों से चमकता है, तो लगता है मानो शांति व श्रद्धा खुद धरती पर उतर आई हो।

सेना के जवान भी तवांग वॉर मेमोरियल को दीयों- बिजली की झालरों से सजाते हैं।

सेना के जवान भी तवांग वॉर मेमोरियल को दीयों- बिजली की झालरों से सजाते हैं।

मान्यता; सम्राट अशोक के बौद्ध धर्म अपनाने का भी उत्सव

स्थानीय मोनपा जनजाति का मुख्य त्योहार नहीं होने के बावजूद बौद्ध लामा लोगों को आशीर्वाद देने के लिए दिवाली के आयोजनों में हिस्सा लेते हैं। बौद्ध समुदाय के कुछ लोग भी सम्राट अशोक के बौद्ध धर्म ग्रहण अपनाने की याद में यह त्योहार मनाते हैं।

तवांग में दिवाली के पर पारंपरिक भारतीय मिठाइयों के साथ-साथ मोनपा व्यंजन जैसे जाउ (चावल से बना मीठा), थुपका और मोमो आदि का भी आदान-प्रदान होता है। मिठाइयों में लड्डू, बर्फी और गुझिया लोकप्रिय हैं, जो स्थानीय स्वादानुसार बनती हैं।

तैयारी; एशिया के सबसे पुराने मठ में भी विशेष प्रार्थना

लंबे समय से तवांग में रहने वाले पूर्व शिक्षक टीएन गामलिंग बताते हैं कि तवांग मठ दिवाली के दौरान भक्तों के लिए खुला रहता है। यहां खास प्रार्थना और दीप प्रज्वलन भी होता है, हालांकि यह पारंपरिक बौद्ध रीति के अनुरूप होती है।

दरअसल, यहां ज्यादातर बौद्ध धर्म को मानने वाले ही रहते हैं। बावजूद इसके हर उत्सव में स्थानीय लोग हिस्सा लेते हैं। यहां का मुख्य आकर्षण 16वीं सदी का तवांग मठ शहर से करीब दो किलोमीटर दूर है। यह एशिया का सबसे पुराना और दूसरा सबसे बड़ा मठ है।

—————————–

‘7 अनोखी दीवाली’ सीरीज की ये खबरें भी पढ़ें….

केरल के कासरगोड का पोलियंथ्रा: खास पेड़ की 7 शाखाओं से लकड़ी का दीपस्तंभ बनाते हैं; यह तूलूभाषी लोगों का उत्सव

केरल के उत्तरी छोर पर स्थित कासरगोड में तूलूभाषी क्षेत्र में दिवाली के दिन एक अलग त्योहार मनाया जाता है, जिसे ‘पोलियंथ्रा’ कहा जाता है। कासरगोड जिले के हजारों घरों और शास्ता मंदिरों में दिवाली के दिन बालि पूजा की जाती है।

एझिलम पाला पेड़ की 7 शाखाओं से लकड़ी का दीपस्तंभ बनाया जाता है, जिसे ‘पोलियंथ्रम पाला’ कहा जाता है। इसे आंगन, कुएं या अस्तबल के पास सजाया जाता है। पढ़ें पूरी खबर…

सिक्किम का तिहार उत्सव: कौवे-कुत्ते और गाय-बैल की पूजा; मान्यता- यमुना ने यम को बुलाने इन्हें दूत के रूप में भेजा था

सिक्किम में दीपावली को तिहार के नाम से मनाया जाता है। जो प्रेम, सामाजिक सद्भाव और प्रकृति व पशुओं के प्रति कृतज्ञता की भावना का उत्सव है। तिहार 5 दिन तक चलता है। यह उत्सव मुख्य रूप से नेपाली समुदाय गोरखा मनाता है। यह मृत्यु के देवता यम और उनकी बहन यमुना से जुड़ा है।

तिहार को दिवाली या यमपंचक भी कहा जाता है। इस पर्व में इंसानों, पशुओं और देवताओं के आपसी संबंधों को सम्मान और आभार के साथ याद किया जाता है। पढ़ें पूरी खबर…

.

Share me..

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *