ऑटोइम्यून बीमारियां क्‍या होती हैं? जिनकी 70% मरीज हैं महिलाएं, 20 की उम्र में पैदा हो रहा बड़ा खतरा

What Are Autoimmune Diseases: भारत में ऑटोइम्यून रोगों से पीड़ित हर 10 मरीजों में से लगभग 7 मरीज महिलाएं हैं. इस बात का खुलासा हाल ही में आयोजित भारतीय रूमेटोलॉजी एसोसिएशन के 40वें सम्मेलन में हुआ है. महिलाओं के स्वास्थ्य और ऑटोइम्यून विकारों पर केंद्रित एक विशेष सेशन के दौरान डॉक्टरों ने बताया कि कैसे हार्मोनल बदलाव, आनुवंशिक प्रवृत्ति और विशिष्ट बायोलॉजिकल मैकेनिज्म महिलाओं को ऐसी स्थितियों के प्रति ज्यादा संवेदनशील बना देते हैं. वैज्ञानिक रूप से महिलाओं का इम्यून सिस्टम संक्रमणों से लड़ने में ज्यादा सक्षम होता है. इसके बावजूद कभी-कभी यही शरीर के खिलाफ खड़ा हो जाता है और उससे ऑटोइम्यून बीमारियां जन्म ले लेती हैं.

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हाल ही में स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की एक स्टडी बताती है कि महिलाओं के शरीर में ज़िस्ट आरएनए नाम के एक विशेष अणु का उत्पादन होता है जो इनमें मौजूद दो एक्स गुणसूत्रों में से एक को नियंत्रित करने में मदद करता है.हालांकि यही अणु कभी-कभी इम्यून सिस्टम को भ्रमित कर देता है और यह शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं की रक्षा करने के बजाय उल्टा उन पर हमला कर देता है. इससे ऑटोइम्यून रोग पैदा हो जाते हैं.

क्‍या और कब होती हैं ऑटोइम्यून बीमारियां?
ऑटोइम्यून बीमारियां तब होते हैं जब शरीर की रक्षा प्रणाली, जो आमतौर पर संक्रमणों से बचाती है, गलती से अपने ही ऊतकों पर हमला कर देती है. ऐसे में रुमेटाइड गठिया, ल्यूपस, थायरॉइडाइटिस, सोरायसिस और स्जोग्रेन सिंड्रोम जैसे ऑटोइम्यून रोग हो जाते हैं. ये रोग जोड़ों, त्वचा, रक्त वाहिकाओं और यहां तक कि हृदय या फेफड़ों जैसे आंतरिक अंगों को भी प्रभावित कर सकते हैं. देखा जा रहा है कि खासतौर पर 20 से 50 वर्ष की आयु के बीच जब हार्मोनल और जीवनशैली संबंधी कारक सबसे अधिक सक्रिय होते हैं, ये रोग हो रहे हैं.

महिलाओं का देर से आना खतरनाक
एम्स नई दिल्ली में रुमेटोलॉजी विभाग की प्रमुख डॉ. उमा कुमार कहती हैं, ‘एम्स स्थित मेरे ओपीडी क्लिनिक में ऑटोइम्यून बीमारियों से पीड़ित हर दस में से लगभग सात मरीज महिलाएं हैं. हम एक स्पष्ट पैटर्न देखते हैं कि महिलाएं डॉक्टरों के पास अक्सर देर से आती हैं क्योंकि वे लगातार लक्षणों को अनदेखा कर देती हैं. आनुवंशिक संरचना, प्रजनन आयु के दौरान और बच्चे के जन्म के बाद हार्मोनल परिवर्तन, तनाव, मोटापा और पोषण संबंधी कमियां साथ मिलकर उन्हें ऑटोइम्यून बीमारियों की तरफ धकेल देते हैं. अब समय है कि ऑटोइम्यून विकारों को भारत में महिलाओं के स्वास्थ्य की एक प्रमुख समस्या के रूप में पहचाना जाए.’

जोड़ों का दर्द-सूजन अनदेखा करना पड़ रहा भारी
फोर्टिस अस्पताल में रुमेटोलॉजी निदेशक डॉ. बिमलेश धर पांडेय ने बताया, ‘हर हफ्ते, मैं उन महिलाओं से मिलती हूं जो इलाज से पहले वर्षों से अस्पष्टीकृत जोड़ों के दर्द या सूजन से जूझ रही होती हैं.कई महिलाएं 30 या 40 की उम्र के बीच हैं. जब तक वे हमारे पास पहुंचती हैं, तब तक बीमारी उनके जोड़ों या अंगों को नुकसान पहुंचा चुकी होती है. हमें जागरूकता बढ़ानी चाहिए और विशेष रूप से महिलाओं के बीच, शीघ्र जांच सुनिश्चित करनी चाहिए.’

यह समस्या और भी बदतर हो जाती है क्योंकि महिलाएं अक्सर थकान, जोड़ों में अकड़न या सूजन जैसे शुरुआती चेतावनी संकेतों को नजरअंदाज कर देती हैं. वे उन्हें छोटी समस्याएं या तनाव या उम्र बढ़ने का नतीजा मानकर टाल देती हैं. कई महिलाएं पारिवारिक जिम्मेदारियों, जागरूकता की कमी या सामाजिक कारणों से डॉक्टर के पास जाने में देरी करती हैं, जिससे यह बीमारी चुपचाप बढ़ती रहती है और गंभीर हो जाती है.

गलत इलाज करवा चुकी होती हैं मरीज
सर गंगा राम अस्पताल में रुमेटोलॉजी के उपाध्यक्ष डॉ. नीरज जैन ने कहा कि उन्होंने भी यही चलन देखा है. ऑटोइम्यून रोगियों में स्पष्ट बहुमत महिलाएं हैं. भारत में सामाजिक और पर्यावरणीय कारक ऑटोइम्यून रोगों के मामलों को बढ़ाने में प्रमुख भूमिका निभाते हैं.

वहीं डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल में प्रोफेसर और रुमेटोलॉजिस्ट डॉ. पुलिन गुप्ता ने बताया कि उनके क्लिनिक में लगभग 70 फीसदी ऑटोइम्यून मरीज महिलाएं हैं और कई लोग विशेषज्ञ के पास पहुंचने से पहले वर्षों तक गलत इलाज करवा चुके होते हैं.इन मरीजों में शुरुआती लक्षणों की पहचान करनी चाहिए, खासकर महिलाओं में, ताकि उन्हें जल्द से जल्द रुमेटोलॉजिस्ट के पास भेजा जा सके. शुरुआती निदान से दीर्घकालिक विकलांगता को रोका जा सकता है.

इराकॉन सम्मेलन के अध्यक्ष और इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल्स के सीनियर कंसलटेंट डॉ. रोहिणी हांडा ने कहा कि ऑटोइम्यून रोग मधुमेह या हृदय रोग जितने ही आम हैं, फिर भी इन पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है. जब 70 फीसदी प्रभावित महिलाएं हैं, तो इसे लिंग-तटस्थ मुद्दा नहीं मान सकते. पूरे भारत में जागरूकता अभियान, महिलाओं पर केंद्रित शोध और रुमेटोलॉजी सेवाओं तक बेहतर पहुंच की सख्त जरूरत है.

इस कारण बढ़ रही हैं ये बीमारियां
विशेषज्ञों का कहना है कि जैविक कारकों के अलावा, जीवनशैली और पर्यावरण भारतीय महिलाओं में ऑटोइम्यून विकारों को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. खासतौर पर बढ़ता प्रदूषण स्तर, सुस्त दिनचर्या, अनहेल्दी आहार, बढ़ता तनाव और पर्याप्त नींद की कमी ये सभी चीजें इन बीमारियों को बढ़ा रही हैं. कुछ अध्ययनों से पता चला है कि वायु प्रदूषकों और औद्योगिक रसायनों के संपर्क में आने से हार्मोनल और प्रतिरक्षा तंत्र गड़बड़ा सकते हैं, जिससे रिस्क और बढ़ जाता है.हालांकि इलाज से इन्हें कंट्रोल किया जा सकता है.

भारत में बस 1000 एक्सपर्ट
इन बीमारियों के इलाज के लिए भारत में एक्सपर्ट की भारी कमी देखी जा रही है. करोड़ों लोगों के इलाज के लिए भारत में 1,000 से भी कम रूमेटोलॉजिस्ट हैं. विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि प्राथमिक देखभाल चिकित्सकों को शुरुआती लक्षणों को पहचानने और मरीजों को उचित रूप से रेफर करने के लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए. कैंसर और प्रेग्नेंसी जांचों की तरह ही ऑटोइम्यून बीमारियों की भी जांच होनी चाहिए.

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