कैसे कुछ ही घंटों में शरीर पर असर डालता है निर्जल व्रत, बॉडी खाने लगती है अपनी ही कोशिकाएं

आज देश में बड़े पैमाने पर महिलाएं करवा चौथ का व्रत रख रही हैं. ये काफी कठिन व्रत माना जाता है, जिसमें महिलाएं ना कुछ खाती हैं और ना ही पीती हैं, इस व्रत को ड्राई फास्टिंग या निर्जल उपवास कहते हैं. ऐसे व्रत का हमारे शरीर पर क्या असर पड़ता है. खासकर ड्राई फास्टिंग कुछ ही घंटों बाद हमारे शरीर को बुरी तरह तोड़ने लगता है. एक स्थिति ऐसी भी आती है जबकि शरीर अपनी कोशिकाओं को खाने लगता है.

वो व्रत, जिसमें न खाना खाया जाए, न पानी लिया जाए, उस पर विज्ञान ने काफी शोध किया है. जानते हैं कि जब हम ऐसा व्रत रखते हैं तो ऐसा व्रत हमारे शरीर पर कुछ ही घंटों में असर डालने लगता है.

कितनी तरह के होते हैं व्रत

व्रत आमतौर पर तीन तरह के रखे जाते हैं
1. इंटरमिटेंट फास्टिंग – 12-16 घंटे तक कुछ नहीं खाते. अलबत्ता पानी जरूर पीते रहते हैं.
2. वॉटर फास्टिंग – जिसमें कुछ पानी लिया जाता है, खाना नहीं.
3. ड्राई फास्टिंग (निर्जल उपवास) – न खाना, न पानी. ये व्रत सबसे कठिन माना जाता है. शरीर पर इसका तेज असर होता है.

ड्राई फास्टिंग में पहले 8–12 घंटे में क्या होता है

जब आप कुछ नहीं खाते, तो शरीर ब्लड ग्लूकोज़ को ऊर्जा के लिए इस्तेमाल करता है. जैसे-जैसे शरीर का ग्लूकोज़ खत्म होता है, तो ग्लाइकोजन (जो लिवर और मांसपेशियों में जमा होता है) टूटकर ऊर्जा देने लगता है.
जर्नल ऑफ क्लिनिकल न्यूट्रीशन के अनुसार, व्रत में पानी नहीं लेने की वजह से डिहाइड्रेशन शुरू हो जाता है. शरीर के तरल पदार्थ कम होने लगते हैं, और मूत्र (urine) बनना घट जाता है.

फिर 12–24 घंटे बाद शरीर में बदलाव

कीटोसिस शुरू होता है, जिसमें शरीर ऊर्जा के लिए वसा को तोड़ना शुरू करता है. इससे कीटोन बॉडीज बनती हैं जो मस्तिष्क और हृदय को ऊर्जा देती हैं.
पानी की कमी से ब्लड प्रेसर गिर सकता है, सिर दर्द, थकान महसूस होने लगती है और या मुंह सूखने लग सकता है. किडनी “पानी बचाने” के लिए मूत्र को बहुत गाढ़ा बनाती है.न्यूट्रीशनल न्यूरोसाइंस मैगजीन के अनुसार, सामान्य से 1%–2% डिहाइड्रेशन भी दिमाग की कार्यक्षमता को कम कर देता है.

24 घंटे के बाद शरीर का हाल खराब होने लगता है

24 घंटे तक अगर इसी पोजिशन में व्रत रखते हैं तो शरीर सुरक्षा मोड में चला जाता है . मेटाबॉलिक रेट (ऊर्जा जलने की गति) धीमी हो जाता है.
ऑटोफैगी (Autophagy) नाम की प्रक्रिया शुरू होती है, जिसमें शरीर पुरानी, बेकार या क्षतिग्रस्त कोशिकाओं को खुद खाकर साफ करता है.
इस प्रक्रिया के बारे में नोबेल पुरस्कार (2016) पाने वाले जापानी वैज्ञानिक योशिनोरी ओसुमी ने बतया था. ये भी कह सकते हैं कि ये वो स्थिति होती है जबकि शरीर खुद की सफाई यानि डिटोक्स का काम करना शुरू करता है. लेकिन ऑटोफैगी का असर ड्राई फास्टिंग में पानी की कमी से सीमित भी हो सकता है.

पानी नहीं लेने के खतरे

ड्राई फास्टिंग 12–24 घंटे तक सामान्य व्यक्ति के लिए तो ठीक है लेकिन अधिक देर तक करने पर इसके खतरे बढ़ जाते हैं. किडनी पर दबाव पड़ता है और पानी की कमी से विषैले पदार्थ बाहर नहीं निकल पाते. इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन होता है, जिसमें शरीर के अंदर रहने वाले सोडियम और पोटैशियम का स्तर बिगड़ने लगता है. तब लो ब्लड प्रेशर, चक्कर, हृदय गति बढ़ने जैसी स्थितियों से शरीर गुजर सकता है. यूरोपियन जर्नल ऑफ क्लिनिकल न्यूट्रीशन की वर्ष 2024 की रिपोर्ट कहती है कि अगर तापमान ज्यादा हो तो शरीर ओवरहीट हो सकता है.

व्रत में धार्मिक दृष्टिकोण बनाम वैज्ञानिक दृष्टिकोण

धार्मिक व्रतों जैसे करवा चौथ, एकादशी, रमजान का रोज़ा का मकसद आत्मसंयम, मानसिक एकाग्रता और शुद्धिकरण है. वैज्ञानिक दृष्टि से ये शरीर को मेटाबॉलिक रेस्ट देते हैं और माइंड डिटोक्स का मौका – बशर्ते संतुलन में रहें तो.

व्रत से फायदे भी 

साइंस का कहना है कि अगर कुछ सीमित समय के लिए व्रत रहें तो शरीर को फायदा होता है
– इंसुलिन संवेदनशीलता में सुधार
– सूजन कम होती है
– रक्त शर्करा का संतुलन
– वजन घटाने में मदद
– मानसिक स्पष्टता में सुधार
– ऑटोफैगी से कोशिकीय सफाई
ये फायदे वॉटर फास्टिंग या 12–16 घंटे के उपवास में ज़्यादा पाए गए हैं. ड्राई फास्टिंग को बहुत लंबा करना वैज्ञानिक रूप से सुरक्षित नहीं माना गया है.

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