हैदराबाद. जो कभी आंध्र प्रदेश का हिस्सा था, आज भी वहां के कई लोग रोज़गार की तलाश में यहां आते हैं. इन्हीं में से एक हैं श्रीनाथ, जो नेल्लौर जिले से हैदराबाद आकर बांस की खूबसूरत टोकरियां बेचते हैं. श्रीनाथ पिछले कई सालों से इस काम में हैं. उनके परिवार की यह परंपरागत कला पीढ़ियों से चली आ रही है, वे बताते हैं कि उनके दादा और पिता भी यही काम करते थे.
बड़ी और सुंदर डिज़ाइन वाली टोकरियां 5000 रुपये तक
श्रीनाथ बताते हैं वे अलग-अलग आकार और डिज़ाइन की टोकरियां बनाते हैं, कुछ कपड़े रखने के लिए, कुछ पूजा के लिए और कुछ घर की सजावट के लिए. हैदराबाद की सड़कों, खासकर चारमीनार और कोटी जैसे इलाकों में, उनकी टोकरियां लोगों का ध्यान खींच लेती हैं. इन टोकरियों की कीमत आकार और डिज़ाइन के अनुसार तय होती है. छोटी टोकरियां करीब 100 रुपये में मिल जाती हैं, जबकि बड़ी और सुंदर डिज़ाइन वाली टोकरियां 5000 रुपये तक की होती हैं. श्रीनाथ मुस्कराते हुए कहते हैं, “जितनी सुंदर टोकरी, उतनी उसकी कीमत.”
लेकिन कमाई अनिश्चित है, कभी दिनभर में एक टोकरी बिकती है, तो कभी चार भी नहीं. “लोग दाम पूछते हैं और आगे बढ़ जाते हैं. फिर भी उम्मीद नहीं छोड़ते,” वे कहते हैं, महीने में दस हज़ार रुपये कमा लेना भी उनके लिए बड़ी बात होती है. श्रीनाथ और उनकी पत्नी का जीवन संघर्षों से भरा है. वे शहर के फुटपाथ पर ही रहते हैं और कई बार सड़क किनारे ही खाना बनाना पड़ता है.
बरसात में बांस गीला हो जाने से उनका काम रुक जाता है. फिर भी वे अपने हुनर से जुड़ाव बनाए रखते हैं. वे कहते हैं, “कभी सोचते हैं कि दूसरा काम कर लें, लेकिन फिर दिल नहीं मानता. ये टोकरियां सिर्फ सामान नहीं हैं, हमारी पहचान हैं.” श्रीनाथ की कहानी सिर्फ उनकी नहीं, बल्कि उन हजारों छोटे कारीगरों की भी है, जो अपने हुनर और मेहनत के दम पर जीवन चला रहे हैं. वे भारत की पारंपरिक कला और संस्कृति को जीवित रखे हुए हैं. उनके जैसे लोग दिखाते हैं कि सच्ची सुंदरता हाथ की मेहनत और दिल की लगन में छिपी होती है.
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