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Machhar Bhgane Ka Desi Tarika: आज बाजार में मच्छरों को भगाने के लिए भले ही बहुत सी चीजें आती हों लेकिन छतरपुर जिले के ग्रामीण इलाकों में आज भी एक पुराने तरीके से ही मच्छरों को भगाया जाता है. जानिए मच्छर भगाने का वो पुराना तरीका.
Machhar Bhgane Ka Desi Tarika. छतरपुर जिले के किसान शुकरु अहिरवार बताते हैं कि भले ही आज बाजार में मच्छरों को भगाने के लिए ढेर सारी चीजें आती हों लेकिन आज से 40 साल पहले मच्छरों को भगाने के लिए बाजार में भी कुछ नहीं आता था. ऐसे समय में गांव में कुछ पुराने तरीके अपनाए जाते थे. हालांकि, आज भी गांव में ये पुराना तरीका प्रचलन में है.
शुकरु बताते हैं कि हमारे क्षेत्र में मसूर की फसल होती है. ये फसल रवि सीजन यानी अक्टूबर-नवंबर माह में बोई जाती है और मार्च में काट ली जाती है. जब इसे कतराते हैं तो इस फसल का अवशेष निकलता है. फसल के भूसे की बात नहीं कर रहे हैं, कतराने के दौरान जो डठरी निकलती है उसकी बात कर रहे हैं. माचिस की तीली की तरह मोटी और लंबी होती है. इसी को सुलगाया जाता है. हालांकि , थ्रेसर से कतराने पर डठरी कम ही निकलती है किसान बताते हैं कि मसूर की डठरी को सुलगाने के तुरंत बाद इसमें धुआं होने लगता है. इस धुआं की स्मेल मच्छरों और मक्खियों क परेशान करती है और वह इससे दूर भागते हैं.
पशुओं से मच्छर ऐसे भगाते हैं
किसान बताते हैं कि ये धुआं सिर्फ इंसानों को ही मच्छरों से नहीं बचाता बल्कि पशुओं को भी मच्छर और मक्खियों के काटने से बचाता है.
जहरीला नहीं होता धुआं
शुकरु बताते हैं कि मसुर की डठरी को कंडे या उपले के साथ सुलगाते हैं तो ये धुआं नुकसान नहीं करता है. आंखों में भी जलन नहीं होती है. आप बाजार से मच्छर अगरबत्ती या क्वाइल भी लाएंगे तो उसमें भी धुआं होता है.
7 वर्षों से पत्रकारिता में अग्रसर. इलाहबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स इन जर्नालिस्म की पढ़ाई. अमर उजाला, दैनिक जागरण और सहारा समय संस्थान में बतौर रिपोर्टर, उपसंपादक औऱ ब्यूरो चीफ दायित्व का अनुभव. खेल, कला-साह…और पढ़ें
7 वर्षों से पत्रकारिता में अग्रसर. इलाहबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स इन जर्नालिस्म की पढ़ाई. अमर उजाला, दैनिक जागरण और सहारा समय संस्थान में बतौर रिपोर्टर, उपसंपादक औऱ ब्यूरो चीफ दायित्व का अनुभव. खेल, कला-साह… और पढ़ें
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