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ये कहते हुए प्रीति उन्हाले की आवाज में दर्द आ जाता है। वह मध्य प्रदेश के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री रुस्तम सिंह की बेटी हैं। आज से 25 साल पहले, 26 साल की उम्र में डॉक्टरों ने उन्हें बताया था कि वह एक दुर्लभ वायरल संक्रमण (डाइलेटेड कार्डियोमियोपैथी) की चपेट में है। इस वजह से उनका दिल बेकार हो चुका है और उनके पास जीने के लिए सिर्फ पांच महीने बचे हैं।
बचने का एकमात्र रास्ता हॉर्ट ट्रांसप्लांट था, एक ऐसी सर्जरी जिसका उस वक्त भारत में सफलता दर लगभग शून्य थी। आज प्रीति की उम्र 51 साल है। वह न केवल एक स्वस्थ जीवन जी रही हैं, बल्कि उस खेल की नेशनल चैंपियन भी हैं जिसे उन्हें अपनी बीमारी के कारण छोड़ना पड़ा था।
ऐसी एक और कहानी है 51 साल के मंडी व्यापारी दिनेश मालवीय की। इटारसी के रहने वाले मालवीय के सीने में 7 महीने पहले भोपाल एम्स में एक नया दिल धड़का है। वे धीरे-धीरे अपनी पुरानी जिंदगी में लौट रहे हैं। ये दो अलग-अलग कहानियां हैं, लेकिन इनमें कॉमन बात है कि दोनों के शरीर में दूसरों का दिल धड़क रहा है।
वर्ल्ड हार्ट डे के मौके पर भास्कर ने असल जिंदगी की कहानियों के इन दोनों किरदारों से बात की। उनसे समझा कि ट्रांसप्लांट के बाद इनकी जिंदगी में क्या बदलाव आया और किस तरह की चुनौतियों का सामना उन्हें करना पड़ा। पढ़िए रिपोर्ट

डॉक्टर बोले- केवल 5 महीने की जिंदगी बची है प्रीति बताती हैं, ‘जब डॉक्टरों ने कहा कि मेरे पास सिर्फ पांच महीने हैं, तो मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई। मेरी शादी को सिर्फ एक साल हुआ था। मैं अपनी किस्मत को कोसती थी कि करोड़ों में से किसी एक को होने वाली यह बीमारी मुझे ही क्यों हुई? यह बीमारी एक सामान्य खांसी-जुकाम के बाद शरीर में रह गए वायरस के कारण हुई थी।
वायरस ने हृदय की मांसपेशियों (मायोकॉर्डियम) पर हमला किया, जिससे हृदय का आकार बढ़ने लगा और उसकी खून पंप करने की क्षमता खत्म होती गई। तीन साल के इलाज के बाद, जब वे दिल्ली एम्स में भर्ती थीं, डॉक्टरों ने स्पष्ट कर दिया – हार्ट ट्रांसप्लांट के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

मुझे नहीं पता था ट्रांसप्लांट के बाद जिंदा रहूंगी या नहीं: प्रीति साल 2001 में हॉर्ट ट्रांसप्लांट का नाम लेना भी भयावह था। प्रीति कहती हैं, ‘सफलता की संभावना नगण्य थी। भारत में जो कुछ मामले हुए भी थे, उनमें मरीज 0 से 1 साल तक ही जीवित रह पाते थे। 10 साल से ज्यादा जीने वाला कोई उदाहरण मेरे सामने नहीं था।’ परिवार के सामने एक बड़ा सवाल था, क्या इतनी जोखिम भरी सर्जरी की जाए?
प्रीति के पिता रूस्तम सिंह जो उस समय एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी थे, और उनके युवा आईएएस पति, दोनों ने हिम्मत दिखाई। प्रीति याद करती हैं, “मैं बहुत डरी हुई थी। क्या मैं जिंदा रहूंगी? अगर बच गई तो कितने दिन? मेरे पिता और पति ने मुझे हौसला दिया और मैंने भी इसे लेकर बहुत सोचा।

ट्रांसप्लांट के बाद एक साल क्वारंटीन रहीं प्रीती बताती है कि सर्जरी सफल रही, लेकिन असली लड़ाई अब शुरू हुई थी। नए दिल को शरीर ने एक बाहरी अंग के रूप में देखा और इम्यून सिस्टम ने उसे रिजेक्ट करने की कोशिश शुरू कर दी। इसे रोकने के लिए प्रीति को इम्यूनोसप्रेसेंट दवाइयां दी गईं, जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को दबा देती हैं। यह दवाइयां उन्हें जीवन भर लेनी हैं।
वह बताती हैं, ‘मैंने ट्रांसप्लांट के बाद के शुरुआती 10-12 महीने बिल्कुल कोविड की तरह क्वारंटीन में बिताए। कोई मिलने नहीं आता था, ताकि कोई इन्फेक्शन न हो।’ कम इम्यूनिटी के कारण उन्हें हमेशा संक्रमण का खतरा बना रहता है। घर में किसी को सर्दी-जुकाम भी हो जाए, तो उन्हें दूर रहना पड़ता है। उस समय दिल्ली का प्रदूषण भी एक बड़ी चुनौती थी।
डॉक्टरों ने चेतावनी दी थी कि प्रदूषण से दूर रहें, लेकिन बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए दिल्ली में रहना मजबूरी थी। दवाइयों के साइड-इफेक्ट्स, बार-बार होने वाले टेस्ट और हड्डियों-किडनी पर पड़ते असर के बावजूद, प्रीति ने कभी हार नहीं मानी।
चैंपियन ने वापसी की, गोल्ड मैडल जीता प्रीति का मानना है कि बैडमिंटन उनका पहला प्यार था। उन्होंने इसे कभी नहीं छोड़ा। 2023 में, उन्होंने कोच्चि में हुए नेशनल ट्रांसप्लांट गेम्स में हिस्सा लिया और बैडमिंटन में गोल्ड मेडल जीता। इसके बाद उनका चयन जर्मनी में हुए वर्ल्ड ट्रांसप्लांट गेम्स के लिए हुआ। वे कहती हैं, ‘दुनिया भर से आए 2000 प्रतिभागियों में मुश्किल से 15 ही हार्ट ट्रांसप्लांट वाले थे। भले ही मुझे वहां मेडल नहीं मिला, लेकिन मैं लिवर-किडनी ट्रांसप्लांट वालों से मुकाबला कर रही थी। दौड़ने-भागने का सीधा असर दिल पर पड़ता है। मैं बहुत संतुष्ट हूं कि मैंने वहां तक पहुंचकर प्रदर्शन किया।’

प्रीति ने नेशनल ट्रांसप्लांट गेम्स में गोल्ड मैडल जीता।
12 हजार फीट ऊपर केदारनाथ के दर्शन किए प्रीति बताती हैं कि मेरा एक सपना केदारनाथ जाने का भी था। ट्रांसप्लांट से पहले दो बार मैंने वहां जाने के लिए ट्राय किया था, लेकिन परमिशन नहीं मिली, लेकिन 2024 में मेरा ये सपना पूरा हुआ। पिछले साल ही मैने समुद्र तय से 12 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित केदारनाथ धाम के दर्शन किए हैं। जब मैंने अपने डॉक्टर से इस बारे में पूछा तो उन्होंने कहा- क्यों नहीं जा सकती।
हम लोग वहां हेलिकॉप्टर से पहुंचे, फिर भी मैं एक किमी से ज्यादा पैदल चली और इतनी ऊंचाई पर ऑक्सीजन की कमी थी। मैं अपने साथ सबकुछ ले गई थी, लेकिन मुझे जरूरत नहीं पड़ी और हमने सकुशल दर्शन किए। वह कहती हैं कि मेडिकल साइंस की मान्यता है कि ट्रांसप्लांट पेशेंट 12 से 15 साल जी सकते हैं। मैं 25 साल से जी रही हूं, इसे भगवान की कृपा मानती हूं।

डॉक्टरों ने कहा- ट्रांसप्लांट की विकल्प दिनेश मालवीय मंडी व्यापारी है। वे बताते हैं कोविड के दौरान मुझे सीने में तेज दर्द हुआ। जब डॉक्टरों को बताया तो पता चला कि हार्ट में 50% से ज्यादा ब्लॉकेज है। एंजियोप्लास्टी हुई, लेकिन कुछ समय बाद फिर हार्ट अटैक आया। कुल 4 स्टेंट डाले गए, लेकिन दिल की हालत बिगड़ती गई। आखिर में डॉक्टरों ने बताया कि दिल सिर्फ 25% काम कर रहा है और कभी भी साथ छोड़ सकता है।
मैंने भोपाल एम्स के डॉक्टरों से संपर्क किया। उन्होंने हार्ट ट्रांसप्लांट को ही एकमात्र विकल्प बताया। मैंने जून 2024 में रजिस्ट्रेशन करवा लिया। इंतजार का हर एक दिन भारी पड़ रहा था। फिर एक शाम 5 बजे फोन आया – ‘डोनर मिल गया है, जल्दी एम्स आ जाओ।’ ऑपरेशन कामयाब हुआ और अब इसे सात महीने हो चुके हैं।

दिनेश 7 महीने के बाद अब रोजमर्रा के काम करने लगे हैं।
मन में डर था नॉर्मल लाइन जी सकूंगा या नहीं इटारसी की अनाज मंडी में जब हम पहुंचे, तो दिनेश मालवीय अपनी दुकान का ताला खोल रहे थे। ऑफिस में भगवान की तस्वीर को हाथ जोड़कर वे अपनी कुर्सी पर बैठे और पुराने हिसाब-किताब देखने लगे। यह वही दिनचर्या है जो पिछले 20 सालों से उनके जीवन का हिस्सा रही है। दिनेश भावुक होकर कहते हैं, ‘हार्ट ट्रांसप्लांट के वक्त मन में सवाल उठ रहे थे कि क्या दोबारा यह सब कर पाऊंगा?
जब 10 दिन पहले जब यहां वापस आया, तो लगा कि पुरानी जिंदगी फिर मिल गई है। इससे सुखद मेरे लिए कुछ नहीं है।’ उनकी बातचीत में डॉक्टरों का जिक्र बार-बार आता है। वे उन्हें ‘भगवान’ कहते हैं। “मैं तो बस वहां जाकर लेट गया था, लेकिन डॉक्टर्स और स्टाफ ने 3 महीने तक मेरी जिंदगी के लिए लड़ाई लड़ी। आज 7 महीने बाद भी हर दूसरे दिन डॉक्टर फोन करके मेरा हालचाल लेते हैं।’
दोस्त बना हिम्मत, डॉक्टरों ने दिया जीवनदान दिनेश इस नए जीवन का श्रेय डॉक्टरों के साथ-साथ अपने दोस्त इरफान को भी देते हैं। वे कहते हैं, ‘ट्रांसप्लांट की बात सुनकर मैं ब्लैंक हो गया था। तब मेरी हिम्मत इरफान भाई बने। 2 साल तक इलाज के दौरान वे मेरे साथ रहे। ऑपरेशन के बाद जब वे वेंटिलेटर पर थे और लोगों को पहचान नहीं पा रहे थे, तब भी उन्होंने अपने दोस्त इरफान को तुरंत पहचान लिया था। यह दोस्ती उनके लिए किसी दवा से कम नहीं थी।

सावधानी भरी नई दिनचर्या दिनेश की जिंदगी अब बहुत सावधानी से आगे बढ़ रही है। हमारी बातचीत के दौरान जब उनकी कंप्यूटर ऑपरेटर छींकते हुए ऑफिस आईं, तो उन्होंने तुरंत उसे घर जाकर आराम करने और पूरी तरह ठीक होकर आने को कहा। वे बताते हैं, ‘डॉक्टरों ने ऐसी दवाइयां दी हैं जिनसे रोग प्रतिरोधक क्षमता कम रहती है, ताकि शरीर नए हार्ट को रिजेक्ट न करे। इस वजह से छोटे से छोटा संक्रमण भी खतरनाक हो सकता है।’
वे अभी मंडी में बस कुछ घंटे ही बिताते हैं, ज्यादा लोगों से नहीं मिलते, ताकि मन भी लगा रहे और स्वास्थ्य भी सुरक्षित रहे।

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