नवरात्रि 22 सितंबर से 1 अक्टूबर तक: आज कलश स्थापना के लिए दिनभर में 6 मुहूर्त, जानिए व्रत और पूजा की विधि

13 घंटे पहले

  • कॉपी लिंक

आज से नवरात्रि शुरू हो रही है। इस बार नवरात्रि 10 दिनों की (22 सितंबर से 1 अक्टूबर तक) रहेगी, क्योंकि चतुर्थी तिथि दो दिन तक रहेगी। दुर्गाष्टमी 31 सितंबर और महानवमी 1 अक्टूबर को रहेगी। 2 तारीख को दशहरा मनेगा।

नवरात्रि के पहले दिन घट (कलश) स्थापना की जाती है। इसे माता की चौकी बैठाना भी कहा जाता है। इसके लिए दिनभर में 6 मुहूर्त रहेंगे।

देवी भागवत के अध्याय 26 और 30 के अनुसार वनवास के दौरान सीता हरण के बाद राम परेशान थे। उन्हें रावण पर जीत के लिए नारद जी ने नवरात्रि में देवी पूजा करने की सलाह दी।

  • राम ने सुबह स्नान कर व्रत-पूजा का संकल्प लिया। किष्किंधा पर्वत पर वेदी बनाकर कलश और देवी यंत्र में देवी प्रतिष्ठा की।
  • दूं दुर्गायै नम: मंत्र का जाप किया। नौ दिनों तक उपवास किए। हर दिन तीन समय पूजा की। मंत्र जाप और हवन किया।
  • पूजा में देवी के पसंदीदा फूल चढ़ाए। धूप-दीप और नैवेद्य अर्पित किया। रात को भूमि पर शयन किया।
  • महाष्टमी की रात में पूजन, जप और होम के बाद देवी प्रकट हुईं और रावण विजय का आशीर्वाद दिया।
  • श्रीराम ने नवमी तिथि पर नियमित उपासना जारी रखी। विजया दशमी पर शस्त्र पूजाकर व्रत-समापन किया।्र

कामकाजी लोगों को दिनचर्या और सेहत का ध्यान रखते हुए व्रत करना चाहिए। स्थानीय परंपराओं का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। दवाइयां लेनी हो तो समय पर लें। पानी भी पर्याप्त लें। बुजुर्ग, डायबिटीज, ब्लड प्रेशर के मरीज, गर्भवती महिलाएं और बच्चों को दूध पिलाने वाली माताएं डॉक्टर की सलाह से ही व्रत करें।

अब जानते हैं नवरात्रि का विज्ञान…

9 दिन में मन और शरीर को मजबूत बना देती है ब्रह्मांड की ऊर्जा

नवरात्रि दो मौसम के बीच का समय यानी संधिकाल में आती है। इस दौरान ऊर्जा के उतार-चढ़ाव का सीधा असर शरीर और मन पर पड़ता है। मन नकारात्मक ऊर्जा से संघर्ष करता है तो शरीर में वात, कफ और पित्त का संतुलन डगमगाने से रोग प्रतिरोधक क्षमता घटती है।

आश्विन मास शुक्ल पक्ष में आने वाले शारदीय नवरात्रि सात्विक चेतना, आहार और व्यवहार का उत्सव है। जैसे व्रत-उपवास से शरीर को डिटॉक्स कर उसकी क्षमता बढ़ाई जाती है, वैसे ही भजन, पूजा, योग और साधना से आध्यात्मिक- मानसिक शक्तियों को बढ़ाने का प्रयास किया जाता है।

इन नौ दिनों में मां दुर्गा के रूप में हम ब्रह्मांड की इस ऊर्जा को अपने भीतर और बाहर महसूस कर सकते हैं। ध्यान और साधना के जरिए हम अपने भीतर इस सकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव कई गुना बढ़ा सकते हैं। वो इसलिए क्योंकि यह ऊर्जा हमारे शरीर के सभी चक्रों के जरिए प्रवेश करती है।

देवी दुर्गा का पहला स्वरूप शैलपुत्री है, जो मूलाधार चक्र का प्रतीक है। नवरात्रि के नौ दिनों में साधना के जरिए हम ऊर्जा के ऊपरी चक्रों की ओर बढ़ पाते हैं। नौवें दिन ब्रह्मांड की यह ऊर्जा अपने शिखर पर पहुंच जाती है, जब हम आठ सिद्धियों को धारण करने वाली मां सिद्धिदात्री की आराधना करते हैं। इन नौ दिनों में मन व शरीर में नई ऊर्जा का संचार होता है।

कलश स्थापना: ब्रह्मांड में मौजूद शक्ति तत्व का आह्वान

कलश स्थापना का अर्थ है नवरात्रि के वक्त ब्रह्मांड में मौजूद शक्ति तत्व का घट यानी कलश में आह्वान करना। शक्ति तत्व के कारण घर की नकारात्मक ऊर्जा खत्म हो जाती है। नवरात्रि के पहले दिन पूजा की शुरुआत दुर्गा पूजा के लिए संकल्प लेकर ईशान कोण (पूर्व-उत्तर) में कलश स्थापना करके की जाती है।

1. नवरात्रि में स्थापित कलश नकारात्मक ऊर्जा खत्म कर देता है। इससे घर में शांति रहती है।

2. कलश को सुख और समृद्धि देने वाला माना गया है।

3. घर में रखा कलश माहौल भक्तिमय बनाता है। इससे पूजा में एकाग्रता बढ़ती है।

4. घर में बीमारियां हों तो नारियल का कलश उसको दूर करने में मदद करता है।

5. कलश को भगवान गणेश का रूप भी माना जाता है, इससे कामकाज में आ रही रुकावटें भी दूर होती हैं।

——————————–

ये खबर भी पढ़ें:

शारदीय नवरात्रि 22 सितंबर से:एक साल में चार बार ऋतुओं के संधिकाल में आती है नवरात्रि, इस बार 9 नहीं, 10 दिनों तक चलेगा ये उत्सव

नवरात्रि ऋतुओं के संधिकाल में आती है। संधिकाल यानी वह समय, जब एक ऋतु समाप्त होकर दूसरी ऋतु शुरू होती है। ऋतुओं का ये संधिकाल न केवल पर्यावरण में बदलाव लाता है, बल्कि हमारे शरीर और मन पर भी प्रभाव डालता है। ऐसे समय में उपवास, ध्यान और योग के माध्यम से शरीर और मन को संतुलित करना हमारे स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी होता है। पूरी खबर पढ़ें…

खबरें और भी हैं…

.

Share me..

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *