आयुर्वेदाचार्य प्रीति ने लोकल 18 को बताया कि पंचकर्म का अर्थ है पांच प्रकार की मुख्य क्रियाएं जिनके माध्यम से शरीर से अनावश्यक पदार्थ बाहर निकाले जाते हैं. यह थेरेपी शरीर को पूरी तरह से डिटॉक्स करती है और अंगों की कार्यक्षमता को बढ़ाती है. मेटाबॉलिज्म बेहतर होता है, पाचन तंत्र मजबूत बनता है और एनाबॉलिज्म व कैटाबॉलिज्म का संतुलन सही तरीके से कार्य करने लगता है. पंचकर्म सिर्फ उपचार ही नहीं बल्कि रोगों की रोकथाम का भी एक सशक्त साधन है.
वमन (उल्टी द्वारा शुद्धि): वमन चिकित्सा में औषधियों के प्रयोग से उल्टी करवाई जाती है ताकि शरीर से अतिरिक्त कफ और विषैले तत्व बाहर निकल सकें. यह प्रक्रिया खासतौर पर दमा, खांसी, थायराइड, बुखार और मानसिक विकारों में लाभकारी मानी जाती है. इसके अलावा यह शरीर को हल्का और ताजगी से भर देती है.
विरेचन (दस्त द्वारा शुद्धि): विरेचन में औषधियों के जरिए शरीर से मलद्वार द्वारा हानिकारक पदार्थ बाहर निकाले जाते हैं. यह क्रिया विशेषकर पित्त दोष को संतुलित करने में कारगर होती है. इससे डायजेशन सही होता है, शुगर कंट्रोल में मदद मिलती है और लिवर तथा किडनी की कार्यक्षमता बेहतर होती है. साथ ही त्वचा से जुड़ी कई बीमारियों जैसे एलर्जी, एक्जिमा और पिंपल्स में भी विरेचन बेहद असरदार है.
रक्तमोक्षण (रक्त शुद्धि): रक्तमोक्षण प्रक्रिया में शरीर से दूषित रक्त को निकालकर रक्त की शुद्धि की जाती है. यह विधि नकसीर, गाउट, वैरिकोज वेन्स और त्वचा रोगों के लिए बेहद लाभकारी है. दूषित रक्त बाहर निकलने से शरीर में ताजगी आती है और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है.
बस्ती (एनीमा द्वारा शुद्धि): बस्ती चिकित्सा में औषधीय काढ़ा या तेल गुदा मार्ग से दिया जाता है. इसे वात रोगों के लिए सर्वोत्तम माना गया है. बस्ती से जोड़ों का दर्द, कब्ज, आर्थराइटिस और रीढ़ की हड्डी से जुड़ी समस्याओं में आराम मिलता है. यह प्रक्रिया शरीर को गहराई से शुद्ध करती है और लंबे समय तक स्वास्थ्य बनाए रखती है.