सीवर के पानी से भी फैलती हैं खतरनाक बीमारियां, ICMR 50 शहरों में करेगा वेस्टवॉटर सर्विलांस, आखिर क्या है यह?

Wastewater Surveillance in India: देश और दुनिया में नए-नए वायरस सामने आते रहते हैं, जिससे बीमारियां फैलने लगती हैं. इन वायरस पर तमाम हेल्थ एजेंसियां नजर भी रखती हैं. भारत में बीमारियां फैलाने वाले वायरस पर नजर रखने के लिए भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) वेस्टवॉटर सर्विलांस करता है. यह एक ऐसी तकनीक है, जिसमें सीवर के पानी में खतरनाक वायरस खोजे जाते हैं, ताकि वक्त रहते उनसे फैलने वाली बीमारियों को रोका जा सके. फिलहाल यह तकनीक भारत के 5 शहरों में इस्तेमाल हो रही है, लेकिन ICMR ने अगले 6 महीनों में इसे 50 शहरों तक पहुंचाने की योजना बनाई है.

अभी तक भारत में वेस्टवॉटर सर्विलांस के जरिए कोविड-19 और पोलियो वायरस पर निगरानी की जा रही है, लेकिन अब इसे बढ़ाकर कुल 10 वायरस पर नजर रखने की योजना है. इनमें बर्ड फ्लू (Avian Influenza Virus) और ऐसे वायरस भी शामिल होंगे जो बुखार, डायरिया, दिमागी बुखार यानी एंसेफेलाइटिस और सांस की बीमारियों से जुड़े हैं. इससे भारत को भविष्य की महामारियों से लड़ने में बड़ी मदद मिलेगी. आज आपको बताएंगे कि वेस्टवॉटर सर्विलांस क्या है और इससे किस तरह लोगों का फायदा होता है.

वेस्टवॉटर सर्विलांस क्या है?

वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (WHO) की रिपोर्ट के मुताबिक वेस्टवॉटर सर्विलांस को वेस्टवॉटर-बेस्ड एपिडेमियोलॉजी (WBE) भी कहा जाता है. यह एक वैज्ञानिक तरीका है, जिसके जरिए इंसानों के शरीर से निकले वायरस और कीटाणुओं को सीवेज में खोजा जाता है. जब कोई व्यक्ति बीमार होता है, तो उसके शरीर से वायरस या बैक्टीरिया पेशाब, मल या नहाने-धोने के पानी के जरिए निकलते हैं और ये सीवेज सिस्टम में चले जाते हैं. इन्हें टेस्ट करके यह पता लगाया जा सकता है कि किसी इलाके में कौन-से वायरस फैल रहे हैं.

क्यों जरूरी है यह तकनीक?

वेस्टवॉटर सर्विलांस की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह बीमारी के फैलने से पहले ही उसकी चेतावनी दे सकती है. जब किसी इलाके में वायरस फैलना शुरू होता है, तो उसके लक्षण लोगों में कुछ दिनों बाद दिखाई देते हैं. लेकिन इस तकनीक से वायरस पहले ही गंदे पानी में पकड़ लिया जाता है. इससे सरकार और स्वास्थ्य विभाग को समय रहते जरूरी कदम उठाने का मौका मिलता है.

इसका मुख्य उद्देश्य क्या है?

इस तकनीक का उद्देश्य एक ऐसा अर्ली वॉर्निंग सिस्टम बनाना है, जो वायरस फैलने से पहले ही खतरे का संकेत दे. यह तरीका सस्ता, आसान और बिना किसी व्यक्ति को सीधे टेस्ट किए काम करता है. इसकी मदद से सरकारें यह तय कर सकती हैं कि कब और कहां वैक्सीनेशन कैंप लगाना है, कंटेनमेंट जोन बनाना है या हॉस्पिटल्स में बेड्स की व्यवस्था करनी है.

यह तकनीक कैसे काम करती है?

इस प्रक्रिया में सबसे पहले बीमार व्यक्ति के शरीर से वायरस निकलकर गंदे पानी में आता है. फिर वैज्ञानिक उस सीवेज से सैंपल लेते हैं. यह सैंपल ट्रीटमेंट से पहले ही लिया जाता है. इसके बाद लैब में इसकी जांच होती है और वायरस के आरएनए या डीएनए के अंश खोजे जाते हैं. अंत में आंकड़ों का विश्लेषण कर यह पता लगाया जाता है कि किस इलाके में संक्रमण फैल रहा है.

कितनी जल्दी मिलती है जानकारी?

इस तकनीक की एक और खासियत यह है कि यह बहुत तेज़ी से काम करती है. आमतौर पर किसी वायरस के बारे में रिपोर्ट आने में हफ्तों लग जाते हैं. लेकिन वेस्टवॉटर सर्विलांस के ज़रिए 5 से 7 दिनों के भीतर यह पता लगाया जा सकता है कि संक्रमण किस इलाके में बढ़ रहा है. इससे समय रहते सावधानी बरती जा सकती है.

लोगों को इससे कैसे फायदा होगा?

वेस्टवॉटर सर्विलांस का सीधा फायदा जनता को मिलता है. अगर सरकार को पहले से पता चल जाए कि कोई वायरस फैल रहा है, तो वह वैक्सीनेशन शुरू कर सकती है, अस्पतालों को तैयार कर सकती है और संक्रमित इलाकों में टेस्टिंग बढ़ा सकती है. इससे बीमारी को फैलने से रोका जा सकता है और लोगों की जान बचाई जा सकती है, वो भी बिना किसी को तकलीफ दिए.

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