गणेश चतुर्थी 27 अगस्त को: गणपति स्थापना के लिए रहेंगे दो मुहूर्त, जानिए स्थापना और पूजा की विधि

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4 घंटे पहले

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27 अगस्त, यानी कल गणेश चतुर्थी है। इस दिन, चित्रा नक्षत्र, बुधवार और भाद्रपद महीने की चतुर्थी तिथि से शुभ संयोग बन रहा है। गणेश पुराण में बताया गया है कि ऐसे ही संयोग में देवी पार्वती ने दोपहर के समय गणपति की मूर्ति बनाई थी, जिसमें भगवान शिव ने प्राण डाले थे। इस खास दिन पर गणपति की स्थापना के लिए दो शुभ मुहूर्त रहेंगे।

भादौ महीने की इस गणेश चतुर्थी पर गणपति को सिद्धि विनायक रूप में पूजने का विधान है। इस रूप की पूजा भगवान विष्णु ने की थी और ये नाम भी दिया।

गणेश जी के सिद्धि विनायक रूप की पूजा हर मांगलिक काम से पहले होती है। माना जाता है गणेश जी का ये रूप सुख और समृद्धि देने वाला होता है। इनकी पूजा से हर काम में सफलता मिलती है। इसलिए इन्हें सिद्धि विनायक कहते हैं।

सिद्धि विनायक रूप: लाल रंग, बैठे गणेश और हाथ में रुद्राक्ष की माला

सिद्धि विनायक रूप की मूर्ति लाल रंग की होती है। ये बैठे हुए गणेश होते हैं। मूर्ति के सिर पर मुकुट और गले में हार होता है। दायां दांत टूटा और बायां पूरा होता है। नाग की जनेऊ पहनी होती है। एक हाथ आशीर्वाद देते हुए, दूसरे हाथ में मोदक और रुद्राक्ष की माला रहती है। तीसरे हाथ में अंकुश (हथियार) रहता है। चौथे में पाश होता है। दायां पैर मुड़ा हुआ और बायां नीचे की तरफ निकला हुआ होता है।

गणेश जन्म से जुड़ी पुराणों की 4 कहानियां

शिव पुराण: देवी पार्वती ने शरीर के मैल से बनाए गणेश

देवी पार्वती ने नहाने से पहले अपने शरीर के मेल से एक बच्चे का पुतला बनाया और उसमें प्राण डाले। देवी ने उसे द्वारपाल बनाकर आज्ञा दी कि कोई भीतर न आए। जब शिव आते हैं तो बालक उन्हें रोकता है। शिव और उस बालक के बीच युद्ध होता है। शिव अपने त्रिशूल से उस बच्चे का सिर काट देते हैं। बच्चे को देख पार्वती दुखी होती हैं। उनके गुस्से से सृष्टि को बचाने के लिए बच्चे के शरीर पर हाथी का सिर लगाया जाता है और उसे फिर से जीवन दिया जाता है। शिव बच्चे को गजानन नाम और प्रथम पूज्य होने का वरदान देते हैं।

लिंग पुराण: शिवजी ने प्रकट किया गणेश को, विघ्नेश्वर कहलाए

देवगण बृहस्पति के साथ शिव से प्रार्थना करते हैं कि अधर्मियों के कामों में विघ्न डालने वाला एक देव रूप दें। जिससे धर्मात्मा सुखी हों। तब शिव ने गणेश्वर को प्रकट किया। पार्वती उन्हें गजानन रूप देती हैं। शिव पुत्र-जन्म के संस्कार कराते हैं और वरदान देते हैं कि तीनों लोक में सबसे पहले तुम्हारी पूजा होगी। साथ ही तुम विघ्नेश्वर और विनायक कहलाओगे। तुम्हारे गण अधर्मियों के कामों में रुकावटें पैदा करेंगे। इसके बाद गणेश अपने विघ्न-गणों की स्थापना करते हैं।

वराह पुराण : रूद्र से प्रकट हुए गणेश, विनायक नाम पड़ा

ऋषि मुनियों की पूजा में आसुरी शक्तियां रुकावट डाल रही थीं। ऐसे में देवता और पितर कैलाश जाकर शिव से उपाय मांगते हैं। शिव देवी पार्वती को देखते हुए विचार करते हैं कि मेरी देह पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु में तो है, लेकिन आकाश में क्यों नहीं और हंस पड़ते हैं। रूद्र के इस भाव से तेजस्वी बालक प्रकट होता है। उसे देखकर पार्वती मुग्ध हो जाती हैं। इस पर रूद्र को गुस्सा आता है और वो बालक को श्राप देते हैं कि तुम्हारा मुंह हाथी जैसा हो जाए, पेट बड़ा हो जाए और तुम्हारी जनेऊ नाग बन जाए। तब ब्रह्मा आकर कहते हैं जो रुद्र के भाव से उत्पन्न हुआ वो गणपति बने। तब शिव का गुस्सा शांत होता है और उस बालक को विनायक, विघ्नकर और गणेश नाम दिया जाता है। वरदान भी दिया जाता है कि हर पूजा आराधना से पहले गणपति की पूजा अनिवार्य है।

स्कंद पुराण: पार्वती ने बनाया गजमुखी बालक, शिवजी ने वरदान दिया

राक्षसों के कामों में रुकावट डालने के लिए देवताओं ने देवी की स्तुति की। देवी पार्वती ने अपने शरीर के मेल से गजमुख बच्चे की मूर्ति बनाई। शिव ने उसमें प्राण डाले और कहा ये मेरी तरह पराक्रमी होगा। पापी और धर्म का अनादर करने वालों को विघ्न देगा। बिना इसकी पूजा के कोई शुभ काम पूरा नहीं होगा। शिव उस बालक को तारकासुर से लड़ने के लिए भेजा। उस युद्ध में गणेश ने तारकासुर को परेशान किया और कार्तिकेय ने वध किया। तब से गणेश विघ्नेश्वर कहलाए।

ग्राफिक: कुणाल शर्मा

सोर्स: डॉ. गणेश मिश्र, असम। प्रो. रामनारायण द्विवेदी, बनारस। गणेश पुराण, मुद्गल पुराण, शिव पुराण, लिंग पुराण, वराह पुराण, स्कंद पुराण

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