भारत पर दबाव बनाने की कोशिश में लगे अमेरिका को यह झटका और भी बड़ा लग सकता है. क्योंकि वॉशिंगटन चाहता है कि भारत चीन से दूरी बनाए, रूस से नजदीकी घटाए और पूरी तरह अमेरिकी पाले में आ जाए. लेकिन भारत साफ कर चुका है… उसके लिए पहला और आखिरी पैमाना राष्ट्रीय हित है. और अब जब दक्षिण कोरिया जैसा अहम एशियाई देश भी बीजिंग की तरफ बढ़ रहा है, तो अमेरिकी रणनीति की जड़ें हिलनी तय हैं.
अमेरिका के लिए इसके क्या मायने
इंडो-पैसिफिक स्ट्रैटेजी पर असर: अमेरिका चाहता है कि साउथ कोरिया, जापान और ऑस्ट्रेलिया उसके साथ मिलकर चीन को घेरें. लेकिन अगर सियोल बीजिंग के साथ रिश्ते सुधारता है, तो यह “कोरिया को अपने पाले में रखने” की अमेरिकी रणनीति को कमजोर कर देगा.
तकनीकी व सप्लाई चेन डिप्लोमेसी: अमेरिका दुनिया की चिप्स और टेक्नोलॉजी सप्लाई चेन को चीन से हटाकर “फ्रेंड-शोरिंग” करना चाहता है. लेकिन अगर साउथ कोरिया बैलेंस बनाने लगे, तो यह अमेरिकी प्रयासों को कमजोर कर देगा.
रणनीतिक संतुलन: भारत अमेरिका का अहम पार्टनर है लेकिन चीन के साथ स्थिरता बनाए रखना भी उसकी मजबूरी है. अगर साउथ कोरिया और चीन नजदीक आते हैं, तो भारत को पूर्वी एशिया में नए पावर बैलेंस का सामना करना पड़ेगा.
आर्थिक अवसर: भारत और साउथ कोरिया पहले से ही टेक्नोलॉजी, डिफेंस और ट्रेड में सहयोगी हैं. अगर सियोल बीजिंग की तरफ झुकता है, तो यह भारत के लिए संकेत होगा कि उसे भी चीन के साथ प्रतिस्पर्धा और सहयोग दोनों का संतुलन साधना होगा.
डिफेंस इंडस्ट्री: हाल के वर्षों में भारत और साउथ कोरिया ने रक्षा सहयोग बढ़ाया है. चाहे नेवल शिपबिल्डिंग हो या आर्टिलरी सिस्टम. लेकिन अगर सियोल-बीजिंग रिश्ते गहराते हैं, तो भारत को अपनी डिफेंस डील्स और रणनीति को और सावधानी से चलाना होगा.
ट्रंप ने दुनिया को यह साफ संदेश दे दिया है कि अमेरिका केवल अपने हितों को ही प्राथमिकता देगा. लेकिन इस पॉलिसी का उल्टा असर हो रहा है. जापान से लेकर यूरोप और अब साउथ कोरिया तक, उसके पुराने साझेदार धीरे-धीरे हाथ खींच रहे हैं. भारत तो पहले ही साफ कर चुका है कि वह किसी “कैंप पॉलिटिक्स” का हिस्सा नहीं बनेगा.
दक्षिण कोरिया की यह चाल अमेरिकी कूटनीति के लिए दोहरा झटका है. एक तरफ चीन को बैलेंस करने की उसकी कोशिश कमजोर होगी और दूसरी तरफ भारत समेत एशियाई देशों को अपनी शर्तों पर चलाना और मुश्किल हो जाएगा.
अब तस्वीर साफ है. अमेरिका चाहे जितना दबाव बनाए, एशियाई देश अपनी स्वतंत्र विदेश नीति पर ही चलेंगे. भारत की तरह दक्षिण कोरिया भी अपने लिए फायदे का रास्ता चुन रहा है. सवाल अब यह है कि अमेरिका अपने छिटकते दोस्तों को फिर से जोड़ पाएगा या एशिया में चीन और रूस की जोड़ी उसके लिए और मजबूत चुनौती बनकर उभरेगी.
.