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वैज्ञानिकों ने खुलासा किया है कि बुध ग्रह धीरे-धीरे सिकुड़ रहा है. इसका रेडियस अब तक 2.7 से 5.6 किलोमीटर घट चुका है. इसकी वजह है कोर का ठंडा होना और सतह पर दरारें बनी.
वैज्ञानिकों के अनुसार पिछले कई सालों में बुध ग्रह 11 किलोमीटर छोटा हुआ. नई स्टडी के मुताबिक बुध का रेडियस अब तक 2.7 से 5.6 किलोमीटर तक घट चुका है. पहले अनुमान था कि यह 1 से 7 किलोमीटर के बीच सिकुड़ा होगा, लेकिन उस समय आंकड़े इतने पक्के नहीं थे. इस बार वैज्ञानिकों ने जो तकनीक अपनाई है, उससे कहीं ज्यादा सटीक जानकारी मिली है.
बुध का भीतरी हिस्सा यानी उसका कोर ज्यादातर लोहे से बना है. अरबों सालों से यह हिस्सा धीरे-धीरे ठंडा हो रहा है. जब कोर ठंडा होकर सिकुड़ता है तो ऊपर की सतह यानी क्रस्ट पर दबाव पड़ता है. इस वजह से सतह खिसकती है और बड़ी-बड़ी दरारें पड़ जाती हैं. कई जगह खड़ी-खड़ी चट्टानें बन जाती हैं जिन्हें ‘Scarps’ कहा जाता है. बुध की सतह पर ये निशान साफ बताते हैं कि ग्रह अंदर से बदल रहा है.
रिसर्च कैसे की गई?
पहले वैज्ञानिक बुध पर बनी दरारों की ऊँचाई और लंबाई देखकर ही अंदाज़ा लगाते थे, लेकिन इसमें ग़लती की गुंजाइश बहुत थी. इस बार वैज्ञानिकों ने तीन बड़े डेटासेट का इस्तेमाल किया जिनमें हजारों Faults की जानकारी थी. इनमें से सबसे बड़े और असरदार Faults को चुनकर गहराई से जांच की गई. नतीजा ये निकला कि सिर्फ Faults से ही बुध करीब 2 से 3.5 किलोमीटर सिकुड़ चुका है. और अगर कोर व मंटल के ठंडे होने का असर भी जोड़ लें तो कुल सिकुड़न 5.6 किलोमीटर तक पहुंचती है.
अब सवाल ये है कि धरती भी तो ठंडी हो रही है, तो उसमें ऐसा क्यों नहीं दिखता? वजह ये है कि धरती का आकार बड़ा है और उसके अंदर अब भी बहुत गर्मी बची है. ऊपर से धरती पर प्लेट टेक्टॉनिक्स यानी प्लेटों की हलचल लगातार होती रहती है. इसलिए धरती का सिकुड़ना बेहद धीमा है.
वहीं बुध छोटा है और उसमें लोहे की मात्रा ज़्यादा है. लोहा जल्दी गर्मी खो देता है, इसलिए बुध का कोर तेजी से ठंडा होकर सिकुड़ रहा है. वैज्ञानिकों का कहना है कि अपनी शुरुआत से अब तक बुध का कुल व्यास करीब 11 किलोमीटर घट चुका है.
बुध की सतह पर बनी दरारें और चट्टानें हमें उसकी जमीन की डायरी पढ़ने जैसा अनुभव कराती हैं. इनमें अरबों सालों के बदलाव दर्ज हैं. इस रिसर्च से सिर्फ बुध की कहानी नहीं बल्कि मंगल और दूसरे ग्रहों को समझने में भी मदद मिलती है.
वैज्ञानिक मानते हैं कि छोटे पथरीले ग्रह कैसे बनते हैं, ठंडे होते हैं और अरबों सालों में अपनी शक्ल बदलते हैं, इसे समझने के लिए बुध सबसे अहम उदाहरण है.