एक लोक कथा है। एक संत अपने शिष्यों के साथ गांव-गांव घूमकर लोगों को धर्म-कर्म करने के लिए प्रेरित करते थे। उनका जीवन सरल था और उनका उद्देश्य केवल इतना था कि लोग जीवन में सच्चाई, प्रेम और भक्ति को अपनाएं। एक दिन संत शिष्यों के साथ एक छोटे से गांव में पहुंचे और वहीं कुछ दिनों के लिए ठहर गए। संत के भक्तों ने उनके लिए एक छोटी-सी कुटिया बना दी, जो संयोग से गांव की एक ग्वालिन के घर के सामने ही थी। ग्वालिन अपनी ईमानदारी के लिए पूरे गांव में प्रसिद्ध थी। वह हर ग्राहक को दूध और घी पूरी ईमानदारी से तोलकर देती थी। कोई भी ग्राहक उसके व्यवहार से असंतुष्ट नहीं था, लेकिन संत ने एक अजीब बात देखी, जब भी गांव का एक विशेष युवक उसके पास आता, तो वह उसे बिना तोले ही दूध और घी दे देती थी। संत को यह देखकर आश्चर्य हुआ। उन्होंने सोचा कि जो स्त्री सभी के साथ इतना न्याय करती है, वह इस युवक के साथ ऐसा अलग व्यवहार क्यों कर रही है? उन्होंने गांववालों से इस बारे में पूछा। तब उन्हें पता चला कि ग्वालिन उस युवक से प्रेम करती है। इसी कारण वह उसके साथ किसी प्रकार का हिसाब-किताब नहीं रखती। उसके लिए वह लेन-देन नहीं, बल्कि भावनाओं का संबंध था। संत ने यह बात अपने शिष्यों को भी बताई और इस घटना से जीवन प्रबंधन का महत्वपूर्ण सूत्र भी समझाया। उन्होंने कहा, “देखो, यह साधारण ग्वालिन अपने प्रेम में कोई हिसाब नहीं रखती। वह नाप-तोल भूल जाती है, क्योंकि उसके लिए प्रेम अधिक महत्वपूर्ण है। उसी तरह हमें भी भगवान से प्रेम करते समय किसी प्रकार का हिसाब-किताब नहीं रखना चाहिए। यदि हम हर भक्ति के बदले कुछ पाने की अपेक्षा करेंगे, तो वह सच्ची भक्ति नहीं होगी।” संत के ये शब्द शिष्यों के मन में गहराई तक उतर गए। उन्हें समझ आ गया कि सच्चा प्रेम और सच्ची भक्ति दोनों ही निस्वार्थ होते हैं। जहां स्वार्थ और अपेक्षा आ जाती है, वहां प्रेम की पवित्रता कम हो जाती है। प्रसंग की सीख .