K.K. का वो राज, जिसे दुनिया समझती रही किंग कोठी, जानिए क्या है असली कहानी

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Hyderabad Kissa : हैदराबाद का किंग कोठी पैलेस असल में कमाल खान की हवेली थी, गेट पर लिखे K.K. को लोगों ने किंग कोठी पढ़ा, निज़ाम मीर उस्मान अली खान ने यही नाम अपना लिया प्रो. अदपा सत्यनारायण के अनुसार, इस भव्य महल का निर्माण 19वीं सदी के अंत में हैदराबाद के एक प्रसिद्ध रईस और वास्तुकार कमाल खान ने अपने निजी निवास के रूप में करवाया था.

हैदराबाद. रियासती शहर हैदराबाद अपनी आलीशान इमारतों और उनके पीछे छिपी दिलचस्प कहानियों के लिए दुनिया भर में मशहूर है. चारमीनार और गोलकोंडा किले की तरह ही शहर के बीचों-बीच स्थित किंग कोठी पैलेस भी इतिहास का एक ऐसा पन्ना है, जो आज भी अपनी अनोखी पहचान के कारण चर्चा में बना रहता है. अक्सर लोग मानते हैं कि इस महल का नाम इसके शाही रुतबे की वजह से किंग कोठी पड़ा, लेकिन इसके पीछे की सच्चाई किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है.

प्रो. अदपा सत्यनारायण के अनुसार, इस भव्य महल का निर्माण 19वीं सदी के अंत में हैदराबाद के एक प्रसिद्ध रईस और वास्तुकार कमाल खान ने अपने निजी निवास के रूप में करवाया था. महल का काम पूरा होने के बाद कमाल खान ने अपनी पहचान दर्ज करने के लिए महल के मुख्य प्रवेश द्वार पर अपने नाम के शुरुआती अक्षर K.K. नक्काशी के रूप में बड़े-बड़े अक्षरों में लिखवाए थे. उस समय तक इसे केवल कमाल खान की हवेली के नाम से ही जाना जाता था.

निज़ाम की पसंद बनी यह हवेली
हैदराबाद के सातवें और अंतिम निज़ाम मीर उस्मान अली खान, जो उस दौर में दुनिया के सबसे अमीर व्यक्तियों में गिने जाते थे, एक बार इस इलाके से गुजर रहे थे. उन्हें कमाल खान की यह हवेली इतनी पसंद आई कि उन्होंने इसे खरीदने की इच्छा जताई. 1911 में जब मीर उस्मान अली खान निज़ाम बने, तो उन्होंने अपने पुश्तैनी चौमहल्ला पैलेस को छोड़कर इसी हवेली को अपना आधिकारिक निवास बनाने का फैसला किया.

कैसे बना K.K. से किंग कोठी
दिलचस्प मोड़ तब आया, जब लोगों ने गेट पर लिखे K.K. को किंग कोठी कहना शुरू कर दिया, क्योंकि वहां अब किंग यानी निज़ाम रहने लगे थे. खास बात यह रही कि निज़ाम ने भी कमाल खान के उन अक्षरों को कभी नहीं हटवाया. उन्होंने कमाल खान के सम्मान और महल की मूल पहचान को बरकरार रखते हुए K.K. को ही किंग कोठी के संक्षिप्त रूप के रूप में स्वीकार कर लिया. आज भी रिकॉर्ड्स में यह जगह इसी नाम से जानी जाती है.

किंग कोठी की सादगी भरी कहानी
किंग कोठी पैलेस केवल एक इमारत नहीं, बल्कि निज़ाम की सादगी का भी प्रतीक रहा है. दुनिया की बेशुमार दौलत के मालिक होने के बावजूद निज़ाम मीर उस्मान अली खान ने अपनी ज़िंदगी के आखिरी दिन इसी महल के एक साधारण से हिस्से नजर बाग में बिताए. आज यह महल हैदराबाद की गंगा-जमुनी तहजीब की गवाही देता है, जहां एक राजा ने एक आम इंसान की निशानी को अपनी पहचान का हिस्सा बना लिया.

About the Author

Anand Pandey

नाम है आनंद पाण्डेय. सिद्धार्थनगर की मिट्टी में पले-बढ़े. पढ़ाई-लिखाई की नींव जवाहर नवोदय विद्यालय में रखी, फिर लखनऊ में आकर हिंदी और पॉलीटिकल साइंस में ग्रेजुएशन किया. लेकिन ज्ञान की भूख यहीं शांत नहीं हुई. कल…और पढ़ें

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