2 साल की उम्र में 3 दिन की बहन के साथ छोड़ गए थे माता-पिता! गोद में लेकर की बाल मजदूरी, आज

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लाडली फाउंडेशन के मालिक देवेंद्र कुमार की कहानी किसी फिल्म से कम नहीं है. बचपन में उनके माता-पिता ने उन्हें और साथ में उनकी 3 दिन की बहन को मलिन बस्ती में छोड़ दिया था. जिसके बाद बचपन से ही देवेंद्र कुमार ने अपनी बहन के लिए मजदूरी और उसकी पूरी जिम्मेदारी संभाली. आज देवेंद्र कुमार देश का बड़ा नाम बन चुके हैं.

नई दिल्ली. जिस बचपन में बच्चे खेल कूद करते हुए बड़े होते हैं और मां-बाप के साए में दुनिया को देखते हैं उसी 2 साल की कच्ची उम्र में देवेंद्र कुमार को उनके माता-पिता ने दिल्ली के दक्षिणपुरी मलिन बस्ती में छोड़ दिया था. उस वक्त उनकी गोद में 3 महीने की उनकी छोटी बहन भी थी. यहां से देवेंद्र कुमार का संघर्ष शुरू हुआ. उन्होंने अपनी बहन की सुरक्षा के लिए 8 साल की उम्र में मजदूरी शुरू की. बहन का पेट पालने और उसको बचाने के लिए कई तरह की दिक्कतों का सामना करते हुए देवेंद्र कुमार आज देश का बड़ा नाम बन चुके हैं. उन्होंने लाडली फाउंडेशन 2012 में शुरू किया.

इस फेडरेशन को आज देश के ज्यादातर मंत्री जानते हैं और आईएएस पीसीएस तक इस फाउंडेशन के तहत होने वाली कन्याओं की शादी में अपना योगदान देते हैं. खास बातचीत में देवेंद्र कुमार ने बताया कि उनके माता-पिता ने उनको इसलिए छोड़ दिया था क्योंकि माता-पिता के बीच में बनती नहीं थी. उन्होंने अपनी मां को कभी नहीं देखा. पिता 2010 में तब आए जब बहन की उन्होंने शादी करवा दी थी. उसके बाद 2021 में उनके पिता का निधन हो गया.

2100 लड़कियों की करवा चुके हैं अब तक शादी
देवेंद्र कुमार ने बताया कि वह बाल विवाह के हमेशा खिलाफ थे. अपनी बहन को भी मलिन बस्ती में वह बाल विवाह से बचाने की कोशिश करते रहे. बहन की पढ़ाई छठी क्लास में छूट गई थी जबकि उनकी दसवीं क्लास में छूट गई थी. उन्होंने लगातार काम करते हुए पैसा कमाया. अपनी बहन की शादी करवाई. उसके बाद डिस्टेंस लर्निंग से अपनी पढ़ाई पूरी की. साल 2012 में इन्होंने लाडली फाउंडेशन की नींव रखी. 51 लड़कियों की शादी करवाई.

उन्होंने बताया कि जिन लड़कियों का सामूहिक विवाह लाडली फाउंडेशन करवाता है, ये वो लड़कियां होती हैं जिनके माता-पिता के पास बेटी की शादी के लिए पैसे नहीं होते हैं. इसके तहत एक शगुन कार्यक्रम आयोजित किया जाता है. शगुन कार्यक्रम में लोग दान देते हैं और दान लोग उनकी संस्था को नहीं देते हैं बल्कि उस समारोह के दिन ही देते हैं, ताकि समारोह अच्छे से हो सके. जैसे जहां पर शादी होती है तो वहां के मैरिज हॉल के मालिक मैरिज हॉल को फ्री कर देते हैं. आईएएस पीसीएस या कई बड़े अधिकारी भी बेटियों के कन्यादान के तहत जो दहेज का सामान होता है वो देने में मदद करते हैं. इस तरह से पूरा शगुन का कार्यक्रम होता है.

दूल्हे का पूरा चेक करते हैं बैकग्राउंड
देवेंद्र कुमार ने बताया की शादी तय करने का काम लड़की के माता-पिता ही करते हैं. उनका काम है शादी समारोह को आयोजित करना और दूल्हे का बैकग्राउंड चेक करना. कहीं दूल्हा क्रिमिनल तो नहीं या पहले से ही शादीशुदा हो. इन सभी चीजों की जांच करके ही शादी समारोह आयोजित किए जाते हैं. आज 30 मार्च को दिल्ली के बड़े हॉल में 51 लड़कियों की शादी होने जा रही है, जिसे सामूहिक विवाह कहते हैं. इसमें दिल्ली की सीएम रेखा गुप्ता आएंगी. इसके अलावा अवधेशानंद गिरि जी महाराज भी इस कार्यक्रम में शिरकत करेंगे. इस कार्यक्रम में लड़कियों का गोत्र दान यानी कन्यादान कई अधिकारी करेंगे. उन्होंने बताया कि हर लड़की की एफडी भी करवाई जाती है. उनको शादी के बाद पढ़ाई पूरी करने और कौशल विकास पर भी फोकस किया जाता है.

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Mohd Majid

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