दरभंगा में यहां के मटन स्टाइल छोले के दीवाने हैं लोग, चुड़ा के साथ चाव से खाते

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दरभंगा के गनौली स्थित त्रिकोण चौक पर रमेश राय पिछले 10 वर्षों से मटन-स्टाइल में पके खास छोले-चूड़ा परोस रहे हैं. शुद्ध मसालों और किफायती दाम के कारण यहां रोजाना 500 प्लेट की खपत होती है. छात्रों से लेकर बुजुर्गों तक, हर कोई इस चटपटे और देशी नाश्ते का दीवाना है.

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दरभंगाः बिहार के दरभंगा जिले का नाम आते ही जेहन में मिथिलांचल के खान-पान और संस्कृति की तस्वीर उभर आती है. खाने-पीने के शौकीनों के लिए यह शहर कभी निराशा नहीं पैदा करता, क्योंकि यहां के हर चौक-चौराहे पर फास्ट फूड से लेकर पारंपरिक देहाती व्यंजनों का अनूठा संगम देखने को मिलता है.

इसी कड़ी में दरभंगा की गनौली बस्ती के पास स्थित त्रिकोण चौक पर पिछले एक दशक से रमेश राय की छोटी सी दुकान स्थानीय स्वाद की एक नई पहचान बन चुकी है. रमेश राय ने अपने हाथों के जादू और सादगी भरे ‘छोले-चूड़ा’ के जरिए शहर के जायके का नक्शा ही बदल दिया है. आज यह स्थान केवल एक मोड़ मात्र नहीं, बल्कि चटपटे स्वाद के चाहने वालों के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव बन गया है.

‘मटन-स्टाइल’ में बनाते हैं छोले
रमेश राय की इस सफलता के पीछे दस वर्षों का लंबा संघर्ष और ईमानदारी छिपी है .उन्होंने बताया कि दशक भर पहले जब उन्होंने यहां अपना ठेला लगाया था, तब परिस्थितियां काफी चुनौतीपूर्ण थीं. शुरुआती दिनों में ग्राहकों को जोड़ना मुश्किल था, लेकिन उन्होंने अपने स्वाद की गुणवत्ता से समझौता नहीं किया. उनके छोले बनाने का तरीका बिल्कुल ‘मटन-स्टाइल’ जैसा है. जिसे धीमी आंच पर मसालों के साथ घंटों पकाया जाता है.

प्रेशर कुकर में तैयार किए गए इन गाढ़े छोलों को जब आसपास के खेतों से आए ताजे और कुरकुरे चूड़े के साथ परोसा जाता है. तो लोग इसके दीवाने हो जाते हैं. मात्र 20 रुपये की एक प्लेट में छोले-चूड़ा के साथ कटा हुआ प्याज, हरी मिर्च, विशेष चटनी और ऊपर से छिड़का गया सीक्रेट मसाला इस व्यंजन को खास बनाता है.

रोजाना 500 प्लेट बिक्री
आज आलम यह है कि यहां रोजाना 400 से 500 प्लेटों की बिक्री होती है. शाम ढलते ही त्रिकोण चौक पर भारी भीड़ जुटने लगती है, जिसमें विश्वविद्यालय के छात्र, राहगीर और स्थानीय बुजुर्ग शामिल होते हैं. जहां छात्र अपनी पढ़ाई की थकान मिटाने आते हैं. वहीं बुजुर्ग यहां बैठकर पुराने दरभंगा के स्वाद की यादें ताजा करते हैं.

रमेश राय के लिए यह केवल एक धंधा नहीं, बल्कि लोगों के अटूट भरोसे का केंद्र है. उनके अनुसार, चूड़े की शुद्धता और छोलों का घरेलू स्वाद ही वह मुख्य कारण है जिसकी वजह से लोग दूर-दराज के इलाकों से यहां खिंचे चले आते हैं. ग्रामीण परिवेश की बातों और ठहाकों के बीच खाली होती प्लेटें इस बात का प्रमाण हैं कि आज के दौर में भी कम कीमत में घर जैसा स्वाद लोगों के दिलों को जीत सकता है.

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Prashun Singh

मीडिया में 6 साल का अनुभव है. करियर की शुरुआत ETV Bharat (बिहार) से बतौर कंटेंट एडिटर की थी, जहां 3 साल तक काम किया. पिछले 3 सालों से Network 18 के साथ हूं. यहां बिहार और झारखंड से जुड़ी खबरें पब्लिश करता हूं.

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