मध्य प्रदेश में घटते जंगल, बने मुसीबत, पहचान पर संकट, मुश्किल में टाइगर की जान

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मध्य प्रदेश में पर्यावरण को एक रिपोर्ट सामने आई है, जिसमें वन्यजीवों के लिए खतरे की घंटी बजा दी है. इसकी सबसे बड़ी वजह जंगल कटाई है. जंगलों की कमी का सीधा असर जलवायु पर भी पड़ रहा है. बारिश के पैटर्न में बदलाव, तापमान में वृद्धि और जैव विविधता का नुकसान इसके प्रमुख परिणाम हैं.

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मध्य प्रदेश में घटते जंगल, बने मुसीबत, मुश्किल में टाइगर की जान

मध्य प्रदेश को देश का ऑक्सीजन सेंटर माना जाता है, लेकिन दुखद बात यह है कि एमपी अब खुद सांस लेने के लिए जूझ रहा है. हाल ही में सामने आई रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में 371 वर्ग किलोमीटर जंगल कम हो गया है. यह गिरावट न केवल पर्यावरण के लिए खतरे की घंटी है, बल्कि वन्यजीवों, खासकर बाघों के लिए भी गंभीर संकट पैदा कर रही है.

2025 में टाइगर रिजर्व में 31 और उसके बाहर 24 बाघों की मौत दर्ज की गई. विशेषज्ञों का मानना है कि जंगलों के घटने से बाघों का प्राकृतिक आवास सिकुड़ रहा है, जिससे उनका इंसानों से टकराव बढ़ रहा है. यही कारण है कि कई बाघ अपने सुरक्षित क्षेत्रों से बाहर निकलकर गांवों और शहरों की ओर रुख कर रहे हैं. सबसे ज्यादा वन क्षेत्र की कटाई दमोह-मंडला क्षेत्र में दर्ज की गई है.

जंगलों की कटाई छीन रही पहचान
घने जंगल, वाइल्ड लाइफ और वन्यजीव ही हमेशा से मध्यप्रदेश की पहचान रहे हैं. लेकिन अवैध कटाई और अतिक्रमण ने जंगलों की स्थिति को बेहद खराब कर दिया है. चिंताजनक बात यह है कि वन विभाग इन गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण करने में नाकाम साबित हो रहा है. राजनैतिक संरक्षण में अतिक्रमण और वन भूमि पर कब्जे के मामले सामने आए हैं. इससे प्रशासनिक व्यवस्था पर भी सवाल उठ रहे हैं.

वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट ने कही ये बात
वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट अजय दुबे का कहना है कि एमपी के जंगलों में टाइगर के साथ विलुप्त होने की कगार पर पहुंच चुके दुर्लभ जीव जंतु भी रहते हैं. टाइगर्स के संरक्षण के लिए शाकाहारी जीव जंतुओं का जंगल में होना भी जरूरी है, जिनका वो शिकार करते हैं. इसके लिए बड़े घास के मैदानों को बचाना होगा, जहां धड़ल्ले से अतिक्रमण हो रहा है.

जंगलों की कटाई से बिगड़ रहा इकोलॉजिकल बैलेंस
जंगलों की कमी का सीधा असर जलवायु पर भी पड़ रहा है. बारिश के पैटर्न में बदलाव, तापमान में वृद्धि और जैव विविधता का नुकसान इसके प्रमुख परिणाम हैं. यदि यही स्थिति जारी रही, तो आने वाले समय में यह संकट और गहरा सकता है. वही मध्य प्रदेश में जंगल हमेशा से टूरिज्म का बड़ा केंद्र रहे हैं. अगर जंगलों की इसी तरह कटाई होती रही, तो आने वाले समय में टूरिज्म इंडस्ट्री पर भी इसका गहरा असर पड़ेगा. हालांकि, सरकार ने कई योजनाएं शुरू की हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर उनका असर सीमित ही दिखाई देता है.

ठोस नीतियों और सख्त कार्रवाई की जरूरत
अवैध कटाई पर कड़ा नियंत्रण, स्थानीय समुदाय की भागीदारी और आधुनिक तकनीक का उपयोग ही इस संकट से बाहर निकलने का रास्ता हो सकता है. मध्य प्रदेश के जंगल सिर्फ पेड़-पौधों का समूह नहीं, बल्कि लाखों जीवों और इंसानों के जीवन का आधार हैं. इन्हें बचाना अब विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता बन चुका है.

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