इजरायल की ये जगह ‘मिनी इंडिया’ क्यों, जिसके किस ‘सीक्रेट’ पर ईरान ने गिराई मिसाइल

इजरायल के दक्षिणी इलाके में एक रेगिस्तानी शहर है, नाम है उसका डिमोना. इसे इजरायल का ‘लिटिल इंडिया’ या ‘मिनी इंडिया’ भी कहा जाता है. ईरान ने इस इलाके में मिसाइल दागी, जिससे ये जगह और नाम चर्चा में आ गया है. हालांकि इस इलाके को ‘मिनी इंडिया’ कहे जाने की कहानी बहुत दिलचस्प है. लेकिन ईरान के यहां मिसाइल गिराए जाने की कहानी और वजह कुछ और है.

डिमोना में भारतीय मूल के यहूदियों की बहुत बड़ी आबादी रहती है. यहां करीब 7–8 हजार भारतीय मूल के यहूदी रहते हैं, जो दशकों पहले यहां से इजरायल गये थे. इनमें मुख्य रूप से बेने-इज़राइल, कोचीन और बगदादी यहूदी समुदाय शामिल हैं. ये लोग महाराष्ट्र, केरल और गुजरात से 1950–60 के दशक में इज़रायल जाकर बसे गए थे. इस समुदाय ने अपने भारतीय खान-पान, त्योहार, भाषा और परंपराओं को काफी हद तक बचाकर रखा है.

इसी वजह से यहां भारतीय मसाले, खाना, बॉलीवुड संगीत तक देखने को मिलता है. कई घरों में आज भी मराठी बोली जाती है. इसलिए स्थानीय लोग और मीडिया इस छोटे से शहर को ‘लिटिल इंडिया इन इजरायल’ कहते हैं.

ईरान की मिसाइल से यहां के एक हिस्से में नुकसान पहुंचा है.

क्या करते हैं इंडियन ज्यूज़

डिमोना में रहने वाले यहुदियों को इंडियन ज्यूज कहा जाता है. यहां बसे भारतीय मूल के लोग कई तरह के काम करते हैं. हालांकि यहां पर उनका शुरुआती दौर का जीवन आसान नहीं था. 1950–60 के दशक में जब वे भारत से इज़रायल पहुंचे तो उन्हें ज्यादातर छोटे मोटे काम ही दिए जाते थे. जैसे फैक्ट्रियों में छोड़ी पोजिशन. कपड़ा और निर्माण के कामों में छोटे मोटे काम. सेना की सहायक सेवाओं में काम. हालांकि समय के साथ उनकी स्थिति बदली.

महाराष्ट्र और केरल से ज्यादा आए

आज इस समुदाय के लोग काफी तरक्की कर गए हैं. वो शिक्षक, इंजीनियर, आईटी पेशेवर हैं, सेना और पुलिस में हैं. छोटे व्यापारी हैं और सरकारी नौकरियों में भी हैं.भारतीय मूल के युवाओं ने भी बड़ी संख्या में इज़रायली सेना में सेवा की है. यहां सबसे बड़ी संख्या बेने इजरायल समुदाय की है, जो महाराष्ट्र से आया था. कोचीन ज्यूज केरल से आए लोग थे. अब तो यहां आए परिवारों की तीसरी पीढ़ियां कामकाज में लग चुकी हैं लेकिन कई परिवारों में आज भी भारतीय शादी की रस्में, खानपान जिंदा हैं.वो भारतीय मसालों से खाना बनाते हैं. बॉलीवुड संगीत सुनते हैं.

photo – wiki commons

शुरुआत में भेदभाव भी

शुरुआती दौर में जब भारतीय यहूदी पहली बार इजरायल पहुंचे तो उन्हें कुछ चुनौतियों का सामना करना पड़ा. उन्हें मध्य-पूर्व और यूरोप से आए यहूदियों से कम हैसियत वाला माना जाता था. एशियाई समझकर भी दूरी रखी जाती थी. नौकरी और सामाजिक स्थिति में असमानता भी थी. अब स्थिति काफी बदली है. कई इज़रायली लोग भारतीय यहूदियों को सबसे कम विवाद वाला और सबसे आसानी से घुलने-मिलने वाला समुदाय मानते हैं.

ये जलेबी भी मिलती है और समोसा भी. छोला भटूरा भी और पूरी सब्जी भी. यहां भारतीय दुकानें हैं और भारतीय खानपान वाले होटल भी.

photo – wiki commons

क्या है वो सीक्रेट जो यहां है

आपको बता देते हैं कि ये डिमोना शहर भारतीय समुदाय से कहीं ज्यादा एक और वजह से दुनियाभर में फेमस है. वो है शहर के पास बना हुआ इजरायल का सीक्रेट एटामिक सेंटर. इसे आम तौर पर “डिमोना न्यूक्लियर रिएक्टर” कहा जाता है. माना जाता है कि इज़रायल के परमाणु कार्यक्रम का केंद्र यही है. यही वजह है कि यह इलाका मध्य-पूर्व की रणनीतिक राजनीति में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है.

हाल की रिपोर्टों के मुताबिक ईरान ने मिसाइल हमले को इज़रायल की कार्रवाई का जवाब बताया. इज़रायल ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े नतांज न्यूक्लियर फेसिलिटी पर हमला किया था. इसके जवाब में ईरान ने इज़रायल के कई इलाकों पर मिसाइल दागीं. कुछ मिसाइलें डिमोना क्षेत्र में गिरीं. एक रिहायशी इलाके को नुकसान पहुंचा.

दुनिया के सबसे रहस्यमय ठिकानों में एक

डिमोना के पास बना इज़रायल का परमाणु केंद्र दुनिया के सबसे रहस्यमय सैन्य ठिकानों में गिना जाता है. आधिकारिक नाम है शिमोन पेरेज नेगेव न्यूक्लियर रिसर्च सेंटर. इसे डिमोना न्यूक्लियर सेंटर कहा जाता है. इज़रायल कभी खुलकर यह नहीं मानता कि उसके पास परमाणु हथियार हैं, लेकिन दुनिया के ज्यादातर विशेषज्ञ मानते हैं कि यही वह जगह है जहां उसका परमाणु कार्यक्रम विकसित हुआ.

क्या यहां परमाणु हथियार विकसित होते हैं

यह केंद्र 1950 के दशक के आखिर में बनाया गया था. इसे फ्रांस के सहयोग से बनाया गया था. उस समय इज़रायल के प्रधानमंत्री डेविड बेन गुरियन को लगता था कि छोटे देश होने के कारण इज़रायल को अपनी सुरक्षा के लिए परमाणु क्षमता चाहिए. इसी वजह से फ्रांस की मदद से यहां एक परमाणु रिएक्टर और कई भूमिगत प्रयोगशालाएं बनाई गईं.

इज़रायल आधिकारिक तौर पर कहता है कि यह न्यूक्लियर रिसर्च सेंटर है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार यहां तीन मुख्य काम होते हैं.
– प्लूटोनियम बनाना यानि ये रिएक्टर प्लूटोनियम पैदा कर सकता है. प्लूटोनियम वही पदार्थ है जिससे परमाणु बम बनाए जाते हैं.
– परमाणु हथियार डिजाइन और परीक्षण. यहां वैज्ञानिक परमाणु हथियारों की डिजाइन, तकनीक और छोटे आकार के वारहेड पर काम करते हैं, उन्हें तैयार करते हैं
– परमाणु सामग्री की प्रोसेसिंग. रिपोर्टों के अनुसार इस परिसर में भूमिगत केमिकल प्लांट हैं, जहां इस्तेमाल हो चुके परमाणु ईंधन से प्लूटोनियम अलग किया जाता है.

वैसे इज़रायल ने कभी अपनी परमाणु हथियारों की संख्या को सार्वजनिक नहीं किया है. लेकिन अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों के अनुमान के अनुसार उसके पास 80 से 90 परमाणु हथियार हैं. कुछ आकलन इसे 100–200 तक भी बताते हैं.

कैसे दुनिया को पता लगा इसका

लंबे समय तक यह केंद्र पूरी तरह गुप्त था. 1986 में एक इज़रायली तकनीशियन ने इसका राज दुनिया को बताया. वह डिमोना में काम करता था. उसने इसकी फोटो और जानकारी ब्रिटिश अखबार द संडे टाइम्स को दी. इन सीक्रेट तस्वीरों से दुनिया को पता चला कि डिमोना में परमाणु हथियारों का कार्यक्रम चल रहा है. इसके बाद उसे इज़रायल की खुफिया एजेंसी मोसाद ने पकड़ लिया. उस पर मुकदमा चला. उसने करीब 18 साल जेल में बिताए.

ये परिसर इज़रायल के सबसे सुरक्षित ठिकानों में है. यहां सुरक्षा के कुछ खास स्तर हैं. यहां कई किलोमीटर तक नो फ्लाई जोन है. भूमिगत बंकर हैं और कैंपस के आसपास भारी सैन्य सुरक्षा.

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