करीब आकर भी दूर क्यों हो जाते हैं लोग? क्या है डेटिंग में ‘इमोशनल डिस्टेंसिंग’ का बढ़ता ट्रेंड

आजकल रिश्ते पहले जैसे सीधे और साफ नहीं रहे, पहले चीजें आसान थीं… या तो आप दोस्त थे या प्यार में थे, या फिर अलग हो चुके थे. हालांकि, अब एक नया बीच का जोन बन गया है, जहां लोग जुड़े भी होते हैं और नहीं भी, आप रोज किसी से बात करते हैं. उनकी दिनभर की बातें जानते हैं, उन्होंने क्या खाया, काम कैसा रहा, क्या चीज उन्हें परेशान कर रही है, और किस बात पर वो हंसे. ना यह पूरी तरह प्यार होता है, ना ही सिर्फ दोस्ती. इसमें न कोई वादा होता है, न कोई साफ फ्यूचर सब कुछ अच्छा लगता है, लेकिन कुछ भी तय नहीं होता है. इसी स्थिति को आजकल लोग इमोशनल डिस्टेंसिंग कहने लगे हैं जहां लोग दिल से जुड़ते तो हैं, लेकिन पूरी तरह नहीं तो आइए जानते हैं कि करीब आकर भी लोग दूर क्यों हो जाते हैं और डेटिंग में इमोशनल डिस्टेंसिंग का बढ़ता ट्रेंड क्या है. 

क्या है ‘इमोशनल डिस्टेंसिंग’?

इमोशनल डिस्टेंसिंग का मतलब किसी के करीब होना, लेकिन पूरी तरह खुलकर नहीं, लोग बातचीत करते हैं, समय बिताते हैं, एक-दूसरे की परवाह भी करते हैं, लेकिन अंदर ही अंदर एक दूरी बनाए रखते हैं. वे ईमानदार होते हैं, लेकिन सब कुछ नहीं बताते, वे मौजूद रहते हैं, लेकिन हमेशा उपलब्ध नहीं होते है. वे अपनापन दिखाते हैं, लेकिन पूरी तरह दिल नहीं खोलते हैं यानी रिश्ता दिखने में गहरा लगता है, लेकिन अंदर से अधूरा होता है. 

करीब आकर भी दूर क्यों हो जाते हैं लोग?

1. दिल टूटने का डर – आजकल लोगों ने बहुत रिश्ते टूटते देखे हैं. इसलिए वे सोचते हैं कि ज्यादा जुड़ेंगे तो ज्यादा दुख होगा. इस डर की वजह से वे खुद को थोड़ा रोककर रखते हैं. 

2. कंट्रोल अपने हाथ में रखना – लोग अब रिश्तों में पूरी तरह बहना नहीं चाहते. वे चाहते हैं कि चीजें उनके कंट्रोल में रहें. उन्हें डर लगता है कि अगर वे किसी पर ज्यादा निर्भर हो गए, तो कमजोर पड़ जाएंगे.

3. बहुत सारे ऑप्शन्स का होना – डेटिंग ऐप्स और सोशल मीडिया की वजह से हमेशा लगता है कि कोई और बेहतर मिल सकता है. इस सोच के कारण लोग किसी एक इंसान को पूरी तरह नहीं चुन पाते हैं. 

4. कमिटमेंट से बचना – कई लोग जिम्मेदारी और बंधन से डरते हैं. वे रिश्ता चाहते हैं, लेकिन उसके साथ आने वाली गंभीरता नहीं. 

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इस तरह के रिश्ते कैसे दिखते हैं?

महीनों तक बात होती है, लेकिन कोई नाम नहीं होता है. साथ समय बिताते हैं, लेकिन फ्यूचर की बात नहीं होती है. सब कुछ ठीक लगता है, लेकिन अंदर से खालीपन महसूस होता है. सब कुछ लगभग सही होता है, लेकिन पूरी तरह नहीं होता है. इस तरह के रिश्तों में सबसे मुश्किल चीज खामोशी है. कोई यह नहीं कहता कि वो क्या चाहता है. कोई यह नहीं पूछता कि रिश्ता कहां जा रहा है और क्यों. क्योंकि लोग डरते हैं कि सवाल पूछने से सब खत्म हो सकता है. 

इसका असर क्या होता है?

इस तरह के रिश्तों में दिल टूटता नहीं, लेकिन दिल भरता भी नहीं है. जब यह खत्म होता है, तो दर्द अजीब होता है. इतना छोटा नहीं कि भूल जाएं और इतना बड़ा नहीं कि रो सकें. बस एक अधूरापन रह जाता है. आजकल बहुत लोग कहते हैं कि डेटिंग बहुत exhausting हो गई है. ऐसे इसलिए है क्योंकि वे लगातार ऐसे रिश्तों में होते हैं जहां मेहनत तो है लेकिन स्पष्टता नहीं है और जहां जुड़ाव है लेकिन स्थिरता नहीं है. 

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