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Tribal Women Success Story: छिंदवाड़ा की दो महिलाएं जो कुछ सालों पहले तक घरों में रहती थी और किसी भी जरूरत के लिए पति पर आश्रित रहती थी. अब इनकी जिंदगी बिल्कुल बदल गई है. इतना ही नहीं अब ये अपने रोजगार से ही घर खर्च भी चला रही हैं, देखिए कैसे स्वयं सहायता समूह ने बदल दी इन आदिवासी बहनों की जिंदगी.
भोपाल/छिंदवाड़ा: एक प्रसिद्ध कहावत है की अगर महिलाएं चाहें तो वो कुछ भी कर सकती है. इसी कहावत को मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा की रहने वाली दो आदिवासी महिलाओं ने असल जीवन में चरितार्थ कर दिखाया है. ये महिलाएं कुछ सालों पहले तक अपनी छोटी जरूरतों के लिए भी पति के खर्च पर आश्रित थी लेकिन अब ये खुद अपने कमाए पैसों से घर चला रही हैं. इतना ही नहीं बल्कि अपने पति का भी सहयोग कर रही हैं, देखिए कैसे बदल गया इन महिलाओं का जीवन.
छिंदवाड़ा की ये दो महिलाएं हैं हिम्मत और जज्बे की मिशाल
छिंदवाड़ा जिले के जुन्नारदेव की पिंडरई कलान गांव से भोपाल आई मीरा पहाड़े और सुनीता बेठे की जिंदगी कभी अपने घर और गांव की सीमाओं तक ही रहती थी. अपनी किसी छोटी जरूरत के लिए भी उनको पति से पैसे मांगने पड़ते थे लेकिन अब यही दो महिलाएं अपना घर तो चला ही रही हैं. इसके साथ ही ये महिलाएं अब प्रदेशभर में घूमकर अपना व्यापार भी बढ़ा रही हैं.
महुआ के लड्डू और फूलों से गुलाल बनाकर बदल दी अपनी जिंदगी
एमपी के छिंदवाड़ा की रहने वाली सुनीता बेठे बताती हैं कि, वो पिछले तीन साल से भोपाल में महुआ के बने लड्डू और पलाश के फूलों से बने हर्बल गुलाल बेचने आती हैं. स्वयं सहायता समूह से जुड़ने के बाद जिंदगी कैसे बदली इसको लेकर बताते हुए मीरा पहाड़े कहती हैं कि, अब हम अपने ऊपर आश्रित हैं किसी दूसरे के ऊपर आश्रित नहीं रहना पड़ता है.
घुटने और कमर में दर्द के लिए रामबाण है महुआ का लड्डू
महुआ के लड्डू की खासियत को लेकर छिंदवाड़ा की महालक्ष्मी स्वयं सहायता समूह की दो महिलाओं बताती हैं कि, किसी को अगर घुटनों या फिर कमर में दर्द होता है तो अगर वो रेगुलर 15 दिन महुआ के लड्डू खाता है तो दर्द खत्म हो जाता है. ये महिलाएं एक महुआ के लड्डू का बॉक्स ₹150 में बेचती हैं.
हाउसवाइफ से बिजनेस वुमेन तक का शानदार सफर, पति भी करते हैं वाहवाही!
छिंदवाड़ा के स्वयं सहायता समूह से जुड़ी सुनीता बेठे बताती हैं कि, 2014 से पहले मैं एक हाउसवाइफ थी लेकिन फिर समूह से जुड़ने के बाद पिछले तीन सालों में मैंने खूब बिक्री की है. पिछले साल भोपाल में मेरे फूलों से बने 65 किलो गुलाल बिके थे. वो आगे बताती हैं कि, मेरे जीवन के बदलाव में मेरे पति का भी सहयोग रहा है और अब उनका भी मुझे लेकर स्वभाव बदला है. वो कहती हैं कि, पति का साथ रहा तभी आज यहाँ तक आ पायी हूँ नहीं तो हम तो गांव में ही रहते हैं. ये आजीविका मार्ट क्या होता है, भोपाल क्या होता है ये भी नहीं देख पाते.
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Shweta Singh, currently working with News18MPCG (Digital), has been crafting impactful stories in digital journalism for more than two years. From hyperlocal issues to politics, crime, astrology, and lifestyle,…और पढ़ें
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