बिना LPG गैस के भी चमक रही रसोई, खंडवा के इस गांव ने दिखाया रास्ता, बायोगैस ने बदल दी तस्व

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Biogas Plant: रामेश्वर पाटिल की यह पहल अब आसपास के गांवों के लिए भी प्रेरणा बन रही है. कई किसान उनसे बायोगैस प्लांट लगाने की जानकारी लेने आ रहे हैं. रामेश्वर का कहना है कि शुरुआत में थोड़ी लागत जरूर लगती है, लेकिन एक बार प्लांट बन जाए तो सालों तक गैस मिलती रहती है और खर्च लगभग खत्म हो जाता है.

Biogas Plant: देश में जहां रसोई गैस के दाम लगातार बढ़ रहे हैं और कई जगहों पर एलपीजी सिलेंडर की कमी से लोग परेशान हैं, वहीं खंडवा जिले के एक गांव ने इसका अलग ही समाधान निकाल लिया है. खंडवा से करीब 8 किलोमीटर दूर अहमदपुर खैगांव गांव में कई घरों में सालों से चूल्हे बायोगैस से जल रहे हैं. गांव के कई परिवारों ने अपने घर या बाड़े में बायोगैस प्लांट लगा रखा है. इस प्लांट से पाइपलाइन के जरिए सीधे रसोई तक गैस पहुंचती है और उसी से खाना बनाया जाता है. इससे परिवारों को गैस सिलेंडर की टेंशन से राहत मिल गई है.

किसान ने शुरू की पहल
गांव के किसान रामेश्वर पाटिल ने अपने घर में देसी तकनीक से बायोगैस प्लांट तैयार किया है. इस प्लांट में गाय-भैंस के गोबर, रसोई का जैविक कचरा और सड़ी सब्जियों का उपयोग किया जाता है. इससे बनने वाली गैस से घर का चूल्हा जलता है. रामेश्वर पाटिल बताते हैं कि महंगाई के इस दौर में जब लोग सिलेंडर भरवाने के लिए परेशान रहते हैं. वहीं, उनके घर में बिना खर्च के गैस तैयार हो जाती है. इससे हर महीने होने वाला खर्च भी बच जाता है.

ऐसे बनती है बायोगैस
किसान बताते हैं कि इस सिस्टम में रोज करीब 12 से 13 किलो गोबर में थोड़ा पानी मिलाकर घोल बनाया जाता है। इसे प्लांट के टैंक में डाला जाता है.टैंक के अंदर यह मिश्रण सड़ता है और जैविक प्रक्रिया से मीथेन गैस बनती है. यही गैस पाइपलाइन के जरिए रसोई तक पहुंचती है और उससे गैस चूल्हा जलाया जाता है. इस पूरी प्रक्रिया में किसी बिजली या मशीन की जरूरत नहीं पड़ती.

महिलाओं को मिली बड़ी राहत
गांव की महिलाओं का कहना है कि पहले उन्हें खाना बनाने के लिए लकड़ी जलानी पड़ती थी या फिर एलपीजी सिलेंडर पर निर्भर रहना पड़ता था. लकड़ी से धुआं भी होता था और सिलेंडर महंगा पड़ता था. लेकिन अब बायोगैस से रसोई धुएं से मुक्त हो गई है और गैस भी आसानी से मिल जाती है. महिलाओं का कहना है कि अब खाना जल्दी बन जाता है और परेशानी भी कम हो गई है.

खेतों के लिए भी फायदेमंद
बायोगैस प्लांट का एक और फायदा यह है कि इसमें बचा हुआ अवशेष खेतों में जैविक खाद के रूप में उपयोग किया जाता है. इससे मिट्टी की उर्वरक क्षमता बढ़ती है और रासायनिक खाद पर खर्च भी कम होता है.

दूसरे गांवों के लिए बन रही मिसाल
रामेश्वर पाटिल की यह पहल अब आसपास के गांवों के लिए भी प्रेरणा बन रही है. कई किसान उनसे बायोगैस प्लांट लगाने की जानकारी लेने आ रहे हैं. रामेश्वर का कहना है कि शुरुआत में थोड़ी लागत जरूर लगती है, लेकिन एक बार प्लांट बन जाए तो सालों तक गैस मिलती रहती है और खर्च लगभग खत्म हो जाता है. अगर हर गांव में ऐसे प्लांट लग जाएं तो एलपीजी सिलेंडर पर निर्भरता काफी कम हो सकती है.

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Deepti Sharma

Deepti Sharma, currently working with News18MPCG (Digital), has been creating, curating and publishing impactful stories in Digital Journalism for more than 6 years. Before Joining News18 she has worked with Re…और पढ़ें

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