Polythene Startup Business Success Story: छतरपुर के रहने वाले सत्यांशु खरे की कहानी सुनकर आप भी सोच में पड़ जाएंगे. जहां लोग बड़ी नौकरी पाने का सपना देखते हैं, वहीं सत्यांशु ने मुंबई में कंपनी सेक्रेटरी की लाखों की नौकरी छोड़ दी. वजह थी कुछ ऐसा देखना, जिसने उनकी सोच ही बदल दी.
वो बताते हैं कि टाटा मेमोरियल अस्पताल में उन्होंने छोटे-छोटे बच्चों को कैंसर से जूझते देखा. जब वजह पता चली तो पता लगा कि प्लास्टिक बोतल से दूध पिलाने के कारण बच्चों के शरीर में माइक्रोप्लास्टिक जा रहा था. बस यहीं से उन्होंने ठान लिया कि कुछ बड़ा करना है.
लॉकडाउन में शुरू किया मिशन
लॉकडाउन के समय सत्यांशु अपने शहर छतरपुर लौट आए. शुरुआत में उन्होंने लोगों को प्लास्टिक के नुकसान के बारे में जागरूक करना शुरू किया, लेकिन लोग बात को गंभीरता से नहीं ले रहे थे. तब उन्होंने सोचा कि सिर्फ समझाने से काम नहीं चलेगा, लोगों को विकल्प देना पड़ेगा. इसी सोच से उन्होंने ईको-फ्रेंडली पॉलिथीन बनाने का स्टार्टअप शुरू कर दिया.
‘Ecomiracle’ नाम से बना ब्रांड
सत्यांशु पिछले 2 साल से “Ecomiracle” नाम से बायोडिग्रेडेबल पॉलिथीन बना रहे हैं. उनका मकसद साफ है “प्लास्टिक हटाओ, पर्यावरण बचाओ”. यह पन्नी देखने में बिल्कुल प्लास्टिक जैसी होती है, मजबूत भी उतनी ही होती है, लेकिन असल में यह पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाती.
8-9 महीने में बन जाती है खाद
सत्यांशु बताते हैं कि उनकी बनाई पॉलिथीन 8 से 9 महीने में खुद ही खत्म होकर खाद बन जाती है. अगर इसे जमीन में दबा दिया जाए तो कुछ महीनों बाद इसका कोई निशान तक नहीं रहता. सबसे बड़ी बात अगर गलती से कोई जानवर इसे खा भी ले, तो उसे नुकसान नहीं होता. जबकि सामान्य प्लास्टिक को खत्म होने में 500 से 1000 साल लग जाते हैं और यह जमीन को भी खराब कर देता है.
गायों की मौत ने भी बदली सोच
सत्यांशु कहते हैं कि छतरपुर में हर साल कई गायें पॉलिथीन खाने की वजह से मर जाती हैं. यह देखकर भी उन्हें बहुत दुख हुआ और उन्होंने ठान लिया कि ऐसा विकल्प बनाना है जिससे जानवरों और इंसानों दोनों को बचाया जा सके.
ऐसे पहचानें असली और नकली पन्नी
वो लोगों को समझाने के लिए लाइव डेमो भी देते हैं. अगर पन्नी जलाने पर उसमें दाने बच जाते हैं तो वह प्लास्टिक है. लेकिन अगर पूरी तरह राख बन जाए तो समझिए वह बायोडिग्रेडेबल पॉलिथीन है.
कीमत भी रखी आम लोगों जैसी
सत्यांशु अपनी पन्नी करीब 140 रुपए किलो बेचते हैं. उनका कहना है कि जैसे-जैसे लोगों में जागरूकता बढ़ेगी और प्रोडक्शन बढ़ेगा, कीमत भी और कम की जाएगी ताकि हर कोई इसका इस्तेमाल कर सके.
आज भी कर रहे हैं जॉब
दिलचस्प बात यह है कि अपने इस स्टार्टअप को संभालने के साथ-साथ सत्यांशु अभी भी वर्क फ्रॉम होम जॉब करते हैं. उन्होंने इंदौर और मुंबई में पढ़ाई और नौकरी की, लेकिन आखिरकार अपने शहर लौटकर कुछ अलग करने का फैसला लिया.
.