Global Energy Market Volatility: मिडिल ईस्ट में चल रहे युद्ध का असर अब वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर साफ दिखाई दे रहा है. तेल और गैस से जुड़े बाजारों में लगातार उतार-चढ़ाव बना हुआ है. साथ ही मौसम से जुड़ी घटना अल नीनो भी चिंता बढ़ा रही है. इन दोनों वजहों के चलते आने वाले समय में महंगाई पर दबाव बढ़ने की आशंका जताई गई है.
स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि मध्य-पूर्व का सैन्य टकराव अब सीमित दायरे तक नहीं रह गया है. इसका असर व्यापक रूप से महसूस किया जा सकता है. आइए जानते हैं, इस विषय में….
क्या कहती है रिपोर्ट?
एसबीआई की रिपोर्ट के मुताबिक वैश्विक ऊर्जा कीमतों पर भू-राजनीतिक तनाव सीधे तौर पर असर डाल रहे हैं. इसके साथ ही 2026 में मौसम का बदलता रुख भी महंगाई को प्रभावित कर सकता है, जिससे मुद्रास्फीति पर निगेटिव दबाव पड़ने की संभावना है.
रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि मौजूदा हालात का असर कमोडिटी बाजारों पर भी दिखाई दे रहा है. जहां अनिश्चितता बढ़ने से अटकलें तेज हो गई हैं. इसके साथ पैदा हुए स्थिति से कई क्षेत्रों की वास्तविक मांग भी प्रभावित हो रही है.
रिपोर्ट में सलाह दी गई है कि भविष्य में जोखिम कम करने के लिए ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों पर ध्यान देना चाहिए और ऊर्जा खपत को सीमित करने के उपायों को भी अपनाना जरूरी हो सकता है.
क्या होता है अल नीनो?
अल नीनो और ला नीना मौसम से जुड़ी ऐसी स्थितियां हैं, जो प्रशांत महासागर के तापमान में बदलाव के कारण बनती हैं. दरअसल समुद्र और वातावरण के तापमान में समय-समय पर उतार-चढ़ाव होता रहता है, जिसे वैज्ञानिक एक चक्र मानते हैं. इसी चक्र की दो अलग-अलग अवस्थाओं को अल नीनो और ला नीना कहा जाता है, जिनका असर दुनिया के कई हिस्सों के मौसम पर पड़ता है.
आमतौर पर ये स्थितियां लगभग 9 से 12 महीने तक बनी रहती हैं, लेकिन कई बार इनका असर इससे ज्यादा समय तक भी देखा जा सकता है. अल नीनो के समय प्रशांत महासागर के पूर्वी हिस्से का पानी सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है. इसकी वजह से कई देशों में बारिश, तापमान और मौसम के पैटर्न में बदलाव देखने को मिल सकता है.
.