पुश्तैनी काम को आगे बढ़ा रहे अनिल, हाथ से तैयार करते 50 हजार की साड़ी

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Chhatarpur News: अनिल कुमार कोली ने लोकल 18 से कहा कि चंदेरी साड़ियों को बनाने में लागत ज्यादा आती है. वह बहुत कम मार्जन में साड़ियां बेचते हैं क्योंकि यह उनका पुश्तैनी काम है.

छतरपुर. आज हम आपको एक ऐसे युवक की कहानी बताने जा रहे हैं, जो अपने पीढ़ियों के बिजनेस को आगे बढ़ा रहे हैं. मध्य प्रदेश के अशोकनगर के रहने वाले अनिल कुमार कोली बचपन से ही अपने पीढ़ियों के बिजनेस में हाथ बंटाने लगे थे. आज अनिल खुद अपने हाथों से साड़ियां भी बनाते हैं और इन्हें बेचते भी हैं. इनके यहां 50 हजार रुपये तक की साड़ियां भी मिल जाती हैं. अशोकनगर के चंदेरी के रहने वाले अनिल कुमार कोली लोकल 18 को बताते हैं कि उनका परिवार पीढ़ियों से साड़ी बनाने का काम कर रहा है. हमारे दादा, बाबा ये बिजनेस करते आए हैं. ये हमारा फैमिली बिजनेस है. अब इस फैमिली बिजनेस को वह आगे बढ़ा रहे हैं. उन्होंने कहा कि वह बचपन से ही साड़ियां बनाना सीखने लगे थे. हमारे यहां हाथ से ही चंदेरी साड़ियां बनाई जाती हैं. हम अपने हाथों से ही कारीगरी करते हैं. खुद ही बेचते हैं. हमारा यह बिजनेस पूरे भारत में होता है. हम बड़े-बड़े ब्रांड के लिए साड़ी बनाने का काम करते हैं.

अनिल कोली ने आगे कहा कि चंदेरी साड़ियां माहेश्वरी की साड़ियों से अलग होती हैं. माहेश्वरी की साड़ियों में बॉर्डर पर काम करते हैं, वहीं चंदेरी साड़ियों की कारीगरी में पल्ले पर बॉर्डर बना लेते हैं. चंदेरी साड़ी पारदर्शी होती है. यह साड़ी बूटियों के लिए जानी जाती है. छोटी और बड़ी बूटी की जाती है. साथ ही चंदेरी साड़ियों का वजन बहुत कम होता है. हम सूरत और कोयम्बटूर से कपड़ा लाते हैं. धागे को लूम पर चढ़ाते हैं. इसके बाद हाथ से कारीगरी करते हैं.

2500 रुपये से शुरू साड़ी
अनिल बताते हैं कि अभी छतरपुर में स्टॉल लगाया है, तो यहां 2500 रुपये से लेकर 50 हजार रुपये तक की साड़ी बेच रहे हैं. वह इससे महंगी भी साड़ियां बनाते हैं. हमारी साड़ियां ऑल इंडिया बिकने जाती हैं. ऑनलाइन ऑर्डर भी लेते हैं. साथ ही मध्य प्रदेश सरकार जहां मेले आयोजित कराती है, वहां हमें बुलाया जाता है.

चंदेरी साड़ियों की लागत ज्यादा
अनिल आगे बताते हैं कि चंदेरी साड़ियों को बनाने में लागत ज्यादा आती है क्योंकि आज भी ये साड़ियां हम हाथों से ही बनाते हैं. वहीं मशीनों से जो साड़ियां बनती हैं, उसमें मेहनत कम और लागत भी कम आती है लेकिन हमारी साड़ियों जैसी क्वालिटी नहीं मिलती है. हमारी साड़ियों में लागत ज्यादा आती है, इसलिए उतना मुनाफा तो नहीं होता लेकिन फैमिली बिजनेस है, तो इसे आगे बढ़ा रहे हैं. हम 10 से 20 परसेंट पर साड़ी बनाते हैं. बड़े-बड़े ब्रांड के लिए हम 10 से 20 परसेंट मुनाफे पर काम करते हैं.

About the Author

Rahul Singh

राहुल सिंह पिछले 10 साल से खबरों की दुनिया में सक्रिय हैं. टीवी से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई संस्थानों के साथ काम किया है. पिछले चार साल से नेटवर्क 18 समूह में जुड़े हुए हैं.

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