अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शनिवार को कहा कि कई देश अमेरिका के साथ मिलकर होर्मुज जलडमरूमध्य में नौसैनिक तैनाती कर सकते हैं, ताकि तेल जहाजों की आवाजाही सुरक्षित रखी जा सके. ट्रंप ने चीन, फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया और ब्रिटेन जैसे देशों का नाम लेते हुए संकेत दिया कि ये देश इस समुद्री अभियान का हिस्सा बन सकते हैं. होर्मुज दुनिया की सबसे अहम ऊर्जा सप्लाई का मार्ग है. यहां से रोजाना दुनिया के करीब पांचवें हिस्से का तेल गुजरता है. इसलिए वहां थोड़ी सी रुकावट भी पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को झटका दे सकती है.
ईरान ने अमेरिका पर कसा तंज
ट्रंप के इस बयान के बाद ईरान ने मौके पर चौका मारने की कोशिश की. ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने एक्स पर बेहद तीखा तंज कसते हुए लिखा कि अमेरिका का कथित सुरक्षा छाता जगह-जगह से छेद वाला साबित हुआ है, जो सुरक्षा देने के बजाय मुसीबत बुला रहा है. उन्होंने कहा कि अब अमेरिका दूसरों से, यहां तक कि चीन से भी, होर्मुज को सुरक्षित बनाने में मदद मांग रहा है. अरागची ने पड़ोसी देशों से अमेरिकी सैन्य अड्डों को भी बंद करने की अपील की. आसान भाषा में कहें तो तेहरान यह दिखाना चाहता है कि कुछ ही दिनों की लड़ाई में उसने अमेरिका को उस हालात पर ला दिया, जहां उसे अपने विरोधियों तरफ देखना पड़ रहा है.
रूस से भी मदद लेने में लगा अमेरिका
इस पूरे घटनाक्रम का दूसरा बड़ा पहलू रूस है. यूक्रेन और उसके यूरोपीय सहयोगी अमेरिका के उस फैसले से नाराज हैं, जिसमें ट्रंप प्रशासन ने रूसी तेल पर लगे कुछ प्रतिबंधों में अस्थायी ढील दी है. अगर ट्रंप ऐसा न करें तो तेल के दाम और भी ज्यादा हो जाएंगा, जिसका परिणाम अमेरिका समेत पूरी दुनिया पर होगा. ट्रंप दबाव में आ जाएंगे और युद्ध खत्म करने को मजबूर हो जाएंगे. अमेरिका ने 30 दिन की छूट देकर उन देशों को राहत दी है, जो समुद्र में फंसे रूसी तेल और पेट्रोलियम उत्पाद खरीदना चाहते हैं. ट्रंप प्रशासन का तर्क है कि ऊर्जा बाजार में उथल-पुथल के बीच यह कदम वैश्विक तेल कीमतों को काबू में रखने के लिए उठाया गया है. लेकिन यूक्रेन का कहना है कि यही पैसा आखिरकार रूस की युद्ध मशीन को ताकत देगा.
यूक्रेन के राष्ट्रपति व्लादिमीर जेलेंस्की ने साफ कहा कि अमेरिका की इस ढील से रूस की स्थिति मजबूत होगी और उसे अरबों डॉलर की अतिरिक्त कमाई मिल सकती है, जिसका इस्तेमाल वह यूक्रेन के खिलाफ युद्ध में करेगा. फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों, यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंतोनियो कोस्टा और जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने भी इस फैसले पर चिंता जताई है. यूरोप का डर यह है कि ईरान युद्ध के बहाने रूस को आर्थिक राहत मिल रही है, जिससे यूक्रेन पर दबाव और बढ़ सकता है.
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