Last Updated:
एम्स दिल्ली के आरपी सेंटर ने एक एआई सॉफ्टवेयर बनाया है जो आंख का फोटो देखकर काला मोतिया का पता लगा लेगा. आरपी सेंटर के प्रोफेसर तनुज दादा कहते हैं कि यह सॉफ्टवेयर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, जिला अस्पतालों, जहां ग्लूकोमा की जांच की सुविधाएं नहीं हैं, वहां उपयोगी साबित होगा.
आरपी सेंटर एम्स ने ग्लूकोमा का पता लगाने के लिए एआई सॉफ्टवेयर डेवलप किया है.
AI Software for Glaucoma: आंखों की सबसे खतरनाक बीमारियों में से एक काला मोतिया या काला पानी को लेकर ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज नई दिल्ली के आरपी सेंटर फॉर ऑप्थेल्मिक साइंसेज ने एक ऐसा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सॉफ्टवेयर तैयार किया है, जो फोटो देखकर ही आंखों की इस गंभीर बीमारी का पता लगा लेगा. स्क्रीनिंग के इस टूल से मिली रिपोर्ट के बाद मरीज को इलाज के लिए हायर सेंटर पर रैफर किया जा सकेगा.
सबसे खास बात है कि इस एआई सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल उन प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, सीएचसी, आरोग्य मंदिरों, उन जिला अस्पतालों और छोटे सरकारी अस्पतालों में किया जा सकेगा जहां ग्लूकोमा या काला मोतिया जैसी बीमारियों का पता लगाने के लिए महंगी मशीनें नहीं हैं. जहां पर्याप्त रूप से आंखों के इंट्राऑक्यूलर प्रेशर की जांच करने की भी सुविधाएं नहीं हैं. ऐसे में यह सॉफ्टवेयर उनकी मदद करेगा.
इस बारे में आरपी सेंटर में प्रोफेसर ऑफ ऑप्थेल्मोलॉजी और हेड ऑफ ग्लूकोमा सर्विसेज डॉ. तनुज दादा ने बताया कि काला मोतिया या ग्लूकोमा को आंखों का चोर कहते हैं, सबसे महत्वपूर्ण बात है कि इसका कोई लक्षण नहीं होता, ऐसे में आंखों की नियमित स्क्रीनिंग से ही इस बीमारी को पकड़ा जा सकता है. इसीलिए 40 साल से ऊपर की उम्र के लोगों को दो साल में एक बार और 60 साल से ऊपर उम्र है तो साल में एक बार आंखों की स्क्रीनिंग कराने की सलाह दी जाती है, ताकि छुपी हुई बीमारियों का समय रहते पता लगाया जा सके.
आंखों की स्क्रीनिंग और जांच के लिए आरपी सेंटर और भारत सरकार ने मिलकर एक एआई सॉफ्टवेयर तैयार किया है, जो सिर्फ आंखों के फोटो से ग्लूकोमा के होने या न होने की पुष्टि कर देगा. किसी भी स्मार्टफोन से ली गई फोटो को अगर इस सॉफ्टवेयर में अपलोड किया जाएगा तो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सॉफ्टवेयर यह बता सकता है कि आपकी ऑप्टिक नर्व में काला मोतिया पनप रहा है या एकदम नॉर्मल है.
इससे पता करने के बाद अगर काला मोतिया है तो आपको आंखों के अस्पताल में रैफर कर देंगे और अगर सब नॉर्मल है तो साल दो साल में आपको दोबारा जांच के लिए बुलाएंगे. इस तकनीकी को प्राइमरी हेल्थ केयर सेंटर, आरोग्य मंदिरों, डिस्पेंसरीज या गांवों और शहरों के अस्पतालों में दिया जाएगा, ताकि जहां ग्लूकोमा की पकड़ के लिए मशीनें उपलब्ध नहीं हैं, वे इस सॉफ्टवेयर की मदद से इस बीमारी का पता लगा सकें. इससे पूरी जनसंख्या फिर चाहे वह गांव में रह रही हो, छोटे कस्बों में हो या शहरों में हो, तो सभी की स्क्रीनिंग हो सकेगी.
About the Author
प्रिया गौतम Hindi.News18.com में बतौर सीनियर हेल्थ रिपोर्टर काम कर रही हैं. इन्हें पिछले 14 साल से फील्ड में रिर्पोर्टिंग का अनुभव प्राप्त है. इससे पहले ये हिंदुस्तान दिल्ली, अमर उजाला की कई लोकेशन…और पढ़ें