मौजूदा युद्ध में ईरान जिस तरह से अमेरिका और इजरायल के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं और युद्ध की जद को बढ़ा रहा है. जिस तरह से उसकी मिसाइलों से लेकर ड्रोन के हमलों ने हर किसी को चकित कर दिया है. उससे लगता है कि ईरान को मालूम है कि एक दिन उसका युद्ध अमेरिका और इजरायल से जरूर होगा, इसी वजह से वो इसकी तैयारी में कम से कम 40 सालों से जुटा हुआ था.
पिछले पिछले कुछ दशकों में ईरान ने अपनी सैन्य रणनीति को जिस तरह बनाया है, उसे समझे बिना आज के संघर्ष को समझना मुश्किल है. वास्तव में ईरान ने किसी एक युद्ध के लिए नहीं बल्कि “संभावित बड़े युद्ध” के लिए धीरे-धीरे लेकिन पुख्ता तरीके से तैयारी की. इसलिए उसने अपनी सैन्य शक्ति को अलग तरीके से विकसित किया. ज्यादातर ढांचे को जमीन के नीचे ले जाकर, मिसाइलों पर जोर देकर और असमान युद्ध की रणनीति बनाकर.
इस विषय पर कई सामरिक विशेषज्ञों, सैन्य विश्लेषकों और किताबों में विस्तार से लिखा है, इन्हें अक्सर ईरान की सैन्य रणनीति को समझने के लिए उद्धृत किया जाता है. एंथनी कोर्डसमन को ईरान की सैन्य रणनीति पर सबसे बड़ा एक्सपर्ट माना जाता है. उनकी किताब “ईरान मिलिट्री फोर्सेज एंड वारफाइटिंग कैपेबिलिटीज” (Iran’s Military Forces and Warfighting Capabilities) ईरान की सैन्य रणनीति पर सबसे महत्वपूर्ण रिसर्च मानी जाती है.
ईरान जानता था कि वह अमेरिका जैसी तकनीकी ताकत से पारंपरिक युद्ध नहीं जीत सकता. इसलिए उसने असमान युद्ध तकनीक की रणनीति अपनाई. (AI News18 Image)
इस किताब में बताया गया है, ” ईरान जानता था कि वह अमेरिका जैसी तकनीकी ताकत से पारंपरिक युद्ध नहीं जीत सकता. इसलिए उसने असमान युद्ध तकनीक की रणनीति अपनाई. मिसाइल, प्रॉक्सी समूह और समुद्री युद्ध को अपनी ताकत बनाया. ईरान की रणनीति का उद्देश्य है, तकनीकी रूप से बेहतर दुश्मन के खिलाफ ऐसे साधन विकसित करना जो उसे महंगा और लंबा युद्ध लड़ने पर मजबूर कर दे.”
ईरान की रणनीति पॉवरफुल दुश्मन से कैसे निपटें
अमेरिकी शोध संस्था यूनाइटेड स्टेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ पीस के विशेषज्ञ माइकल कोनेल ने ईरान की सैन्य रणनीति पर महत्वपूर्ण अध्ययन किया है. उनके अध्ययन “ईरान मिलिट्री डॉक्टराइन” में कहा गया है, “ईरान की सैन्य सोच पर ईरान – इराक युद्ध का गहरा असर है. उसी युद्ध के बाद ईरान ने बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम शुरू किया. ईरान ने ये समझ लिया कि दुश्मन की तकनीकी बढ़त का मुकाबला असमान तकनीक रणनीति (asymmetric tactics) से ही किया जा सकता है.”
कोनेल लिखते हैं, “ईरान ने इस तरह युद्ध की रणनीति तैयार की कि जिससे अपने से ज्यादा तकनीक संपन्न और पॉवरफुल अमेरिका से भी निपटा जा सके.”
कैसे युद्ध को सीमाओं से बाहर फैलाया जाए
अल्मा केशवर्ज ने ईरान की सेना आईआरजीसी पर एक महत्वपूर्ण किताब लिखी है, उसका नाम “द ईरानियन रेवोल्यूशनरी गार्ड्स कोर – डिफाइन ईरान मिलिट्री डॉक्टराइन”.
IRGC केवल सेना नहीं बल्कि एक सामरिक-राजनीतिक शक्ति भी है. इसने ईरान की सैन्य रणनीति को हाइब्रिड वारफेयर की ओर मोड़ा.
इसमें बताया गया है कि IRGC केवल सेना नहीं बल्कि एक सामरिक-राजनीतिक शक्ति भी है. इसने ईरान की सैन्य रणनीति को हाइब्रिड वारफेयर की ओर मोड़ा. इसमें प्रॉक्सी युद्ध, मिसाइल, साइबर और गुरिल्ला युद्ध शामिल हैं. किताब बताती है कि IRGC ने क्षेत्रीय नेटवर्क बनाकर युद्ध को सीमाओं से बाहर फैला दिया.
ईरान की सैन्य सोच को समझने के लिए एक और चर्चित किताब है “डिफेंडिंग ईरान – फ्राम रेवोल्यूशनरी गार्ड्स टू बैलेस्टिक मिसाइल्स” (Defending Iran: From Revolutionary Guards to Ballistic Missiles). अमेरिकी विश्लेषक कहते हैं कि यह किताब समझाती है कि ईरान खुद को घिरा हुआ देश मानता है, इसलिए पूरी रक्षा रणनीति डिटरेंस यानि बाधा पैदा करने पर आधारित है. मिसाइल और प्रॉक्सी नेटवर्क इसी का हिस्सा हैं. इस किताब को पश्चिमी नीति-निर्माताओं के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है.
ईरान की समुद्री रणनीति क्या है
समुद्री युद्ध पर रिसर्च करने वाले जहांगीर अरासली ने ईरान की समुद्री रणनीति पर प्रसिद्ध रिसर्च पेपर लिखा है. पेपर का नाम है, “हाऊ ईरान वुक अप्लाई इट्स असमैट्रिक नेवल वारफेयर डॉक्टराइन इन ए फ्यूचर कांफ्लिक्ट”. इसमें कहा गया है, ईरान की नौसेना का लक्ष्य पारंपरिक नौसैनिक लड़ाई नहीं है बल्कि दुश्मन को हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में फंसाना है. छोटे जहाज, समुद्री माइंस और मिसाइलों से हमला करना. छोटे लेकिन तेज और असामान्य तरीकों से दुश्मन को रणनीतिक संकट में डालना.
हसन तेहरानी मोगद्दाम को ‘ईरान के मिसाइल कार्यक्रम का जनक’ कहा जाता है, वह 12 नवंबर 2011 को बिद गनेह स्थित एक मिसाइल अड्डे पर हुए विस्फोट में मारे गए. X
फादर ऑफ ईरान मिसाइल प्रोग्राम
ईरान की मिसाइल रणनीति के पीछे एक महत्वपूर्ण व्यक्ति थे – हसन तेहरानी मोघादम, उन्हें अक्सर फादर ऑफ ईऱान मिसाइल प्रोग्राम कहा जाता है. उनके बारे में किताब है, द फ्रंटलाइन. इसमें बताया गया है कि 1980 के दशक में उन्होंने IRGC की मिसाइल यूनिट बनाई. उसी से आगे चलकर शहाब -1, शहाब -2 और शहाब-3 मिसाइलें बनीं. यह कार्यक्रम ईरान-इराक युद्ध के दौरान शुरू हुआ. उनकी रणनीति थी कि ईरान की सुरक्षा का आधार मिसाइल होना चाहिए. पश्चिम के तकरीबन सभी युद्ध एक्सपर्ट मानते हैं कि ईरान की सैन्य तैयारी “लंबे युद्ध” के लिए है न कि तेज जीत के लिए.
अंडरग्राउंड सैन्य ढांचे पर जोर
अब आइए जानते हैं कि ईरान ने 80 के दशक में इराक से युद्ध के बाद क्या रणनीति बनाई. उस युद्ध में ईरान को कई बड़ी कमजोरियां दिखीं. उसके पास आधुनिक वायुसेना नहीं थी. अमेरिका और पश्चिम ने हथियारों पर प्रतिबंध लगा दिया. इराक ने मिसाइलों और हवाई हमलों से शहरों को निशाना बनाया. युद्ध के दौरान ही ईरान ने समझ लिया कि भविष्य में यदि अमेरिका या इज़रायल से लड़ाई हुई तो पारंपरिक हथियारों में वह कमजोर रहेगा इसलिए उसने मिसाइल, सुरंगों और भूमिगत सैन्य ढांचे पर जोर देना शुरू किया. इसी दौर में 1984 में ईरान ने अपनी पहली अंडरग्राउंड मिसाइल बेस बनानी शुरू की.
मिसाइल पॉवर मुख्य हथियार
ईरान की सैन्य नीति का केंद्र उसकी मिसाइलें हैं. आज उसके पास मध्य-पूर्व के सबसे बड़े बैलिस्टिक मिसाइल भंडारों में एक है. ईरान के पास प्रमुख मिसाइलें शहाब -3, सेज्जिल, एमाद, खुर्रमशर हैं. इनमें से कई मिसाइलों की मारक क्षमता 2000–2500 किमी तक बताई जाती है, जिससे इज़रायल खाड़ी देशों और अमेरिकी ठिकानों तक पहुंच जा सकता है.
ईरान का लक्ष्य हवाई ताकत की कमी की भरपाई मिसाइलों से पूरी करने का था. दूर से हमला करने की क्षमता को बढ़ाना था. इसी रणनीति के तहत उसने “मिसाइल शॉवर सिस्टम” जैसे सिस्टम विकसित किए, जिनसे एक साथ कई मिसाइलें दागी जा सकती हैं ताकि दुश्मन की मिसाइल रोधी प्रणाली पर दबाव पड़े.
ईरान ने जमीन के नीचे मिसाइल सिटी बनाई हुई है. उनकी मिसाइल, सैन्य अड्डे. कमांड ज्यादातर चीजें अब जमीन के नीचे ट्रांसफर हो चुकी हैं. (AI News18 Image)
मिसाइल सिटी यानि जमीन के नीचे पूरी सैन्य दुनिया
ईरान की सबसे चर्चित रणनीति है उसकी अंडरग्राउंड मिसाइल सिटी. देश के कई हिस्सों में सुरंगों और बंकरों का विशाल नेटवर्क बनाया गया है, जिनमें मिसाइलें, ड्रोन और लॉन्चर छिपाए जाते हैं. कई जगह ये सैकड़ों मीटर गहराई में बने हैं. पहाड़ों के अंदर सुरंगों का जाल है. अंदर ही मिसाइल लांचर, गोदाम और कमांड सेंटर हैं. बाहर से छिपे हुए प्रवेश द्वार.
एक ईरानी कमांडर के अनुसार, देश के अलग-अलग प्रांतों में ऐसी मिसाइल बेस बनाई गई हैं ताकि आदेश मिलते ही जमीन के नीचे ही मिसाइलें दागी जा सकें. कुछ बेस तो इतने बड़े बताए जाते हैं कि वहां से एक साथ दर्जनों मिसाइलें लांच की जा सकती हैं.
मोज़ेक डिफेंस
ईरान ने केवल हथियार ही नहीं बनाए बल्कि एक अलग सैन्य सिद्धांत भी विकसित किया जिसे मोज़ेक डिफेंस कहा जाता है. इस रणनीति के तहत देश को कई सैन्य क्षेत्रों में बांटा गया. हर क्षेत्र को स्वतंत्र कमांड दिया गया. युद्ध में अगर केंद्रीय कमांड नष्ट हो जाए तो भी लड़ाई जारी रहे. इस मॉडल में 31 अलग-अलग कमांड बनाए गए यानि हर प्रांत के लिए एक.
समुद्री युद्ध के लिए भी खास तैयारी
ईरान जानता है कि उसका सबसे बड़ा सामरिक क्षेत्र है होर्मुज जलडमरूमध्य है, जहां से दुनिया के बड़े हिस्से का तेल गुजरता है. इसलिए उसकी नौसेना ने कई अनोखी रणनीतियां विकसित कीं.
– तट के पास छिपे हुए नौसैनिक बंकर
– तेज गति वाली छोटी हमलावर नौकाएं
– समुद्री माइंस
– ड्रोन और मिसाइल बोट
तटीय क्षेत्रों और द्वीपों में सुरंगों और छिपे ठिकानों का जाल बनाया गया है ताकि हमला होने पर जहाज तुरंत बाहर निकलकर जवाबी हमला कर सकें. अब हम देख भी रहे हैं कि इस बड़े युद्ध में ईरान ने सबसे पहले हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य को बाधित कर दिया है, जिससे आधी से ज्यादा दुनिया में ऊर्जा संकट गहरा गया है.
ईरान ने केवल पारंपरिक हथियारों पर भरोसा नहीं किया. उसने साइबर युद्ध और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध की क्षमता भी बढ़ाई. इनका इस्तेमाल दुश्मन की संचार प्रणाली बाधित करने में होता है. ड्रोन और मिसाइलों को भ्रमित करने के साथ साइबर हमलों के जरिए रणनीतिक ढांचे को नुकसान पहुंचाने में ये काम आता है.
विशेषज्ञों के अनुसार ईरान को स्पष्ट अंदाजा था कि उसके परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम एक दिन बड़े टकराव का कारण बन सकते हैं. इसलिए उसने सैन्य ढांचे को जमीन के नीचे छिपाया. हथियारों को देशभर में फैलाया. कमांड को डिसेंट्रलाइज़ किया. हालिया रिपोर्टों के अनुसार, ईरान ने इन सुरंगों में हजारों मिसाइलें और लॉन्चर छिपाकर रखे हैं जिन्हें युद्ध की स्थिति में इस्तेमाल किया जा सकता है.
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