झाबुआ जिले में मंगलवार को शीतला सप्तमी का पर्व श्रद्धा और लोक परंपराओं के साथ मनाया गया। झाबुआ, थांदला और पेटलावद सहित पूरे जिले में श्रद्धालुओं ने माता शीतला की पूजा-अर्चना की। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के लोग सुबह से ही शीतला माता मंदिरों में कतारबद्ध होकर पहुंचे और परिवार की सुख-समृद्धि की मंगल कामना की। इस विशेष पर्व पर सदियों पुरानी परंपरा का निर्वहन करते हुए घरों में चूल्हे नहीं जलाए गए। महिलाओं ने एक दिन पहले ही विभिन्न प्रकार के स्वादिष्ट पकवान तैयार कर लिए थे। इन्हीं ठंडे पकवानों का मां शीतला को विधि-विधान से भोग लगाया गया, जिसे बाद में पूरे परिवार ने प्रसाद के रूप में ग्रहण किया। होली के बाद आने वाली शीतला सप्तमी को ऋतु परिवर्तन का संकेत माना जाता है, जहाँ से गर्मी के मौसम की शुरुआत के साथ ठंडा भोजन करने की विशिष्ट परंपरा आरंभ होती है। पर्व की महत्ता को देखते हुए जिले में स्थानीय अवकाश भी रहा, जिससे उत्सव का उत्साह बढ़ गया। झाबुआ शहर के सज्जन रोड, गोपाल कॉलोनी और पुलिस लाइन स्थित मंदिरों में विशेष साज-सज्जा की गई। वहीं, रायपुरिया, पेटलावद और बामनिया जैसे अंचलों में भी मंदिर समितियों ने रंग-रोगन कर आकर्षक विद्युत सज्जा की। रायपुरिया क्षेत्र में प्रजापत समाज की आराध्य देवी के रूप में पूजित मां शीतला के प्रति ग्रामीणों में गहरी आस्था देखी गई। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, होलिका दहन के बाद से ही महिलाएं प्रतिदिन माता को जल अर्पित करती आ रही हैं, ताकि माता शीतल रहें और समाज पर किसी भी प्रकार की बीमारी या प्राकृतिक संकट का साया न पड़े। ग्रामीण अंचलों में आज भी बुजुर्गों द्वारा कठोरता से परंपराओं का पालन किया जाता है, जिसके तहत कई परिवारों में इन दिनों न तो गर्म पानी से स्नान किया गया और न ही पुरुषों ने दाढ़ी-बाल बनवाए। झाबुआ के चारभुजानाथ मंदिर के पंडित हिमांशु शुक्ल के अनुसार, इस दिन पूजा के लिए किसी विशेष मुहूर्त का बंधन नहीं होता, यही कारण है कि अलसुबह से ही श्रद्धा का सैलाब मंदिरों में उमड़ पड़ा और यह पर्व हर्षोल्लासपूर्वक संपन्न हुआ। .