दिन में नारियल बेचते हैं, रात में न्यूटन के नियम सुनाते हैं! पढ़ें ‘ओपन कोचिंग’ की कहानी

MP News: जबलपुर का गौरीघाट सिर्फ धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि कई गरीब बच्चों के सपनों का स्कूल भी बन गया है. यहां हर शाम एक अनोखा नजारा देखने को मिलता है. जैसे ही मां नर्मदा की आरती खत्म होती है, घाट पर दर्जनों बच्चे किताबें और टैब लेकर पढ़ने बैठ जाते हैं.

ये बच्चे किसी बड़े स्कूल या कोचिंग से नहीं, बल्कि घाट पर लगने वाली एक छोटी सी क्लास से पढ़ते हैं. खास बात यह है कि इनमें से ज्यादातर बच्चे दिनभर अपने माता-पिता के साथ घाट पर नारियल बेचने, प्रसाद बेचने या नाव चलाने का काम करते हैं.

दिन में काम, शाम को पढ़ाई
हम जब इन बच्चों की कहानी जानने नर्मदा घाट पहुंचे, तब शाम के करीब 7 बज रहे थे. आरती शुरू होने ही वाली थी. इसी दौरान हमारी नजर घाट किनारे नारियल और प्रसाद बेच रही एक छोटी बच्ची पर पड़ी. उसके हाथ में मोबाइल टैब देखकर हम भी चौंक गए. पूछने पर उसने बताया कि यह टैब उन्हें पराग सर की कोचिंग से मिला है. बच्ची का नाम परी यादव है और वह पांचवीं कक्षा में पढ़ती है.

परी बताती है कि वह दिनभर घाट पर नारियल और प्रसाद बेचने में मम्मी-पापा की मदद करती है. लेकिन जैसे ही शाम होती है, वह दुकान छोड़कर घाट पर पढ़ने चली आती है.

न्यूटन के नियम भी याद
परी बताती है कि पहले जब घाट पर पढ़ाई शुरू हुई थी, तब वह नर्सरी में पढ़ती थी और सिर्फ चार-पांच बच्चे ही आते थे. धीरे-धीरे बच्चों की संख्या बढ़ती गई और अब यहां रोज कई बच्चे पढ़ने आते हैं. वह मुस्कुराते हुए बताती है कि शुरुआत में पराग सर ने 20 रुपये देकर रोज पढ़ने आने के लिए प्रेरित किया था. अब पढ़ाई की आदत लग गई है. जब हमने परी से मजाक-मजाक में न्यूटन के नियम पूछे, तो उसने बिना झिझक के फटाफट तीनों नियम सुना दिए.

घाट पर ही बच्चों को पढ़ाती हैं लवी
घाट पर हमें एक और बच्ची मिली, जो कोचिंग शुरू होने से पहले छोटे बच्चों को पढ़ा रही थी. उसका नाम लवी यादव है. लवी बताती हैं कि वह नर्मदा नदी के उस पार से आती है. उसके परिवार की भी घाट पर नारियल और प्रसाद की दुकान है. वह दिनभर अपने माता-पिता के साथ दुकान संभालती है और शाम होने का इंतजार करती है. जैसे ही शाम के साढ़े सात बजते हैं, वह घाट पर आकर पढ़ाई करने लगती है.

गरीब बच्चों के लिए किसी वरदान से कम नहीं
लवी कहती है कि उनके जैसे बच्चों के लिए यह कोचिंग किसी वरदान से कम नहीं है. मां नर्मदा के आंचल में बैठकर पढ़ना उन्हें एक नई उम्मीद देता है. घाट पर चलने वाली यह छोटी सी पहल कई बच्चों के जीवन में बड़ा बदलाव ला रही है. यहां पढ़ने वाले बच्चे न सिर्फ पढ़ाई में अच्छे हो रहे हैं, बल्कि बड़े सपने देखना भी सीख रहे हैं.

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