Risk Factors for Lung Disease: जब हम सांस लेते हैं, तब हमारे फेफड़े एक फिल्टर की तरह काम करते हैं. ये ऑक्सीजन को सोखते हैं और हानिकारक कार्बन डाइऑक्साइड को बाहर निकालते हैं. आज के समय में बढ़ता एयर पॉल्यूशन, बदलती लाइफस्टाइल और अनहेल्दी आदतों के कारण फेफड़ों से जुड़ी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं. अक्सर लोग फेफड़ों की जांच को तब तक टालते रहते हैं, जब तक उन्हें सांस लेने में गंभीर तकलीफ न होने लगे. डॉक्टर्स का मानना है कि फेफड़ों की सेहत को नजरअंदाज करना जानलेवा साबित हो सकता है. समय पर की गई जांच न केवल बीमारियों को शुरुआती चरण में पकड़ सकती है, बल्कि फेफड़ों की कार्यक्षमता को भी लंबे समय तक अच्छा बनाए रखने में मदद करती है.
नई दिल्ली के मूलचंद हॉस्पिटल के पूर्व पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ. भगवान मंत्री ने News18 को बताया कि अगर आप पूरी तरह स्वस्थ हैं और आपको सांस से जुड़ी बीमारियों के कोई लक्षण नहीं हैं, तो 35 से 40 की उम्र के बाद आपको अपने फेफड़ों की जांच हर साल करानी चाहिए. फेफड़ों की जांच के लिए कोई एक निश्चित उम्र तय नहीं है, क्योंकि यह लोगों के रिस्क फैक्टर्स पर भी डिपेंड करता है. अगर आप प्रदूषित शहर में रहते हैं, स्मोकिंग करते हैं या आपकी फैमिली हिस्ट्री में फेफड़ों की बीमारी रही है, तो आपको 30 की उम्र के बाद ही एक बेसिक पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट (PFT) करा लेना चाहिए. यह टेस्ट यह बताने में मदद करता है कि आपके फेफड़े कितनी हवा अंदर ले पा रहे हैं और कितनी तेजी से उसे बाहर छोड़ रहे हैं.
डॉक्टर मंत्री ने बताया कि जो लोग स्मोकिंग करते हैं या पहले कभी हैवी स्मोकर रहे हैं, उनके लिए जांच का मापदंड अलग है. 50 से 80 वर्ष की उम्र के बीच के जो लोग हैवी स्मोकर रहे हैं, उन्हें हर साल लो-डोज सीटी स्कैन (LDCT) कराना चाहिए. स्मोकिंग फेफड़ों की कोशिकाओं को स्थायी रूप से डैमेज करती है, जिससे सीओपीडी और फेफड़ों के कैंसर का खतरा कई गुना बढ़ जाता है. स्मोकर्स को उम्र का इंतजार किए बिना, सांस फूलने या पुरानी खांसी जैसे लक्षण दिखते ही डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए.
एक्सपर्ट की मानें तो फेफड़ों की समस्याओं का खतरा केवल उम्र या धूम्रपान तक सीमित नहीं है. वे लोग जो ऐसी फैक्ट्रियों या उद्योगों में काम करते हैं, जहां धूल, धुआं, रसायन या एस्बेस्टस का एक्सपोजर ज्यादा है, उन्हें लंग डिजीज का रिस्क ज्यादा होता है. इसके अलावा जिन लोगों को बचपन में बार-बार अस्थमा या निमोनिया हुआ हो, उनके फेफड़े वयस्क होने पर भी सेंसिटिव रह सकते हैं. घर के भीतर इस्तेमाल होने वाले चूल्हे का धुआं और शहरों का खतरनाक AQI स्तर भी स्वस्थ दिखने वाले लोगों के फेफड़ों को समय से पहले बूढ़ा बना रहा है.
डॉक्टर के मुताबिक फेफड़ों की बीमारी अक्सर चुपचाप बढ़ती रहती है. अगर आपको दो सप्ताह से ज्यादा समय से खांसी है, तो इसे सामान्य सर्दी न समझें. सांस लेने में घरघराहट, छाती में जकड़न, खांसी में खून आना या सीढ़ियां चढ़ते समय असामान्य रूप से सांस फूलना फेफड़ों की कमजोरी के संकेत हैं. कई बार लोग कंधों या पीठ के ऊपरी हिस्से में दर्द को मांसपेशियों का खिंचाव समझ लेते हैं, लेकिन कभी-कभी यह फेफड़ों से जुड़ी गंभीर समस्या का रिफर्ड पेन भी हो सकता है. ऐसे लक्षण दिखने पर तुरंत स्पाइरोमेट्री या चेस्ट एक्स-रे करवाना चाहिए.
आजकल पैसिव स्मोकिंग यानी दूसरों के धुएं के संपर्क में आना और बाहरी वायु प्रदूषण फेफड़ों के दुश्मन बन चुके हैं. लंबे समय तक प्रदूषित हवा में रहने से क्रोनिक ब्रोंकाइटिस का खतरा बढ़ जाता है. इसके अलावा घरों के भीतर की हवा भी कई बार बाहर से ज्यादा घातक हो सकती है, जिसका कारण खराब वेंटिलेशन, अगरबत्ती का धुआं या पालतू जानवरों के बाल हो सकते हैं. जो लोग प्रदूषण वाले क्षेत्रों में रहते हैं, उन्हें साल में कम से कम एक बार अपने ऑक्सीजन लेवल और फेफड़ों की कार्यक्षमता की जांच करानी चाहिए, ताकि भविष्य में होने वाली ऑक्सीजन की कमी से बचा जा सके.