कुछ लोगों की मृत्यु बहुत शांतिदायक होती है तो कुछ की बहुत कष्टदायक, ऐसा क्यों होता है

मृत्यु मानव जीवन की सबसे रहस्यमय घटनाओं में एक है. हर व्यक्ति जानता है कि मृत्यु तय है, लेकिन जिस तरह से लोग मरते हैं वो अलग-अलग होता है। कुछ लोगों की मौत इतनी शांत होती है कि आसपास के लोग समझ भी नहीं पाते कि उनका जीवन एक दो मिनट या सेकेंडों में किस तरह खत्म हो गया. वहीं कुछ लोगों की मृत्यु लंबी पीड़ा, सांसों की जद्दोजहद और शारीरिक संघर्ष के साथ होती है.

– मशहूर वैज्ञानिक माइकल फैराडे को संत व्यक्ति के तौर पर माना जाता है. उनकी मृत्यु बहुत शांत थी. 25 अगस्त 1867 को जब वह लंदन में अपने घर में आरामकुर्सी पर बैठे थे तो बैठे-बैठे उनका निधन हो गया. न कोई लंबी बीमारी ना कोई दिक्कत।

– रामकृष्ण परमहंस के बारे में भक्तों की मान्यता है कि उन्होंने ईश्वर का स्मरण करते हुए शांति से शरीर छोड़ा. ऐसा ही रमन्ना महर्षि के बारे में कहा जाता है, जिनकी मृत्यु भक्तों के अनुसार शांत आध्यात्मिक अवस्था में हुई.

– अमेरिका के तीसरे राष्ट्रपति थॉमस जेफरसन का निधन 4 जुलाई 1826 को अपने घर मॉन्टिसेलो में हुआ. अंतिम समय में शांत अवस्था में लेटे हुए ही बिस्तर पर उनकी मृत्यु हो गई.

– भारत के पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का निधन भी अचानक हुआ. वे शिलांग में छात्रों को लेक्चर दे रहे थे तभी मंच पर गिर पड़े. अस्पताल ले जाते समय उनका निधन हो गया. ये अचानक कार्डियक अरेस्ट का मामला था.

– सिकंदर महान की मृत्यु अचानक नहीं हुई. वह करीब 10-12 दिन तक तेज बुखार और कमजोरी से जूझते रहे. धीरे-धीरे उसका शरीर कमजोर होता गया. आखिरकार बेबिलोन में उसकी मृत्यु हुई.

– अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति यूलिसिस ग्रांट की मृत्यु गले के कैंसर से हुई. अंतिम महीनों में उन्हें बोलने और खाने में बेहद कठिनाई होती थी. यह बीमारी उस दौर में बहुत कष्टदायक मानी जाती थी.

– मनोविश्लेषण के जनक सिगमंड फ्रायड लंबे समय तक मुंह के कैंसर से पीड़ित रहे. दर्द इतना बढ़ गया कि आखिरकार डॉक्टर ने उन्हें मॉर्फीन देकर शांतिपूर्ण मृत्यु दी।.इसे आज के संदर्भ में पालीएटिव सेडेशन का उदाहरण माना जाता है.

– सोवियत नेता स्टालिन को ब्रेन स्ट्रोक आया था. वे कई घंटे तक कमरे में पड़े रहे क्योंकि कोई उनके कमरे में जाने की हिम्मत नहीं कर रहा था. बाद में जब इलाज हुआ तब तक काफी देर हो चुकी थी. उनकी मृत्यु कई दिनों की शारीरिक पीड़ा के बाद हुई.

इतिहास के अलावा चिकित्सा साहित्य में हजारों ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहां
– लोग सोते-सोते मर जाते हैं
– खाना खाते समय अचानक गिर पड़ते हैं
– टहलते या काम करते हुए अचानक दिल बंद हो जाता है

ऐसा क्यों होता है

ऐसी मौतें बाहर से बहुत शांत लगती हैं क्योंकि व्यक्ति कुछ सेकंड या मिनट में बेहोश हो जाता है. फिर उसके प्राण पखेरू निकल चुके होते हैं. लेकिन कुछ लोग महीनों या कई दिनों तक कष्ट से रगड़ते रहते हैं, फिर किसी तरह उनकी मृत्यु हो पाती है. ऐसा क्यों होता है कि कुछ मौत बहुत शांत दिखती हैं और कुछ बहुत कष्टदायक.

क्या ऐसी मृत्यु भाग्य का मामला या परिस्थितियों का मामला है, या विज्ञान इसकी कोई साफ वजह बताता है.आधुनिक चिकित्सा और पालीएटिव केयर पर हुए शोध बताते हैं कि मृत्यु का अनुभव मुख्य तौर पर तीन बातों पर निर्भर करता है—बीमारी या कारण, शरीर की जैविक प्रतिक्रिया और इलाज या देखभाल की स्थिति.

साइंस जो वजह बताता है

कई बार दिल अचानक बंद हो जाता है. व्यक्ति कुछ सेकंड या मिनट में बेहोश हो जाता है. इस तरह की मौत अक्सर बहुत जल्दी होती है. कई मामलों में व्यक्ति को ज्यादा दर्द महसूस करने का समय ही नहीं मिलता. इन स्थितियों में दिमाग को ऑक्सीजन मिलना बंद हो जाता है. व्यक्ति जल्दी बेहोश हो सकता है

लेकिन कैंसर, फेफड़े की बीमारी और न्यूरोलॉजिकल बीमारी के पीड़ित लोगों की मृत्यु का अनुभव ज्यादा लंबा और कष्टदायक होता है. चिकित्सा साहित्य के अनुसार, मृत्यु के समय शरीर का रक्तसंचार धीमा पड़ता है, अंगों को कम ऑक्सीजन मिलती है. धीरे-धीरे चेतना खत्म हो जाती है. कई लोगों में इस प्रक्रिया के दौरान वो सोते-सोते या बेहोशी में चले जाते हैं, इसलिए अंतिम क्षण शांत दिखते हैं.

कई मेडिकल केस-स्टडी में ऐसे उदाहरण दर्ज हैं जहां व्यक्ति कुछ मिनट पहले तक पूरी तरह सक्रिय था और अचानक गिर पड़ा. उसकी मृत्यु हो गई. बेशक साइंस इसकी कई वजह बताता है लेकिन वो ये बात कभी नहीं बता पाया ये वजह बनी क्यों.

इसका कोई जवाब नहीं

मौत से जुड़ी एक दिलचस्प घटना भी वैज्ञानिकों ने नोट की है, जिसे टर्मिनल न्यूसिडिटी कहा जाता है. कुछ मरीज, खासकर अल्जाइमर या डिमेंशिया से पीड़ित लोग मृत्यु से कुछ दिन या घंटे पहले अचानक सामान्य और स्पष्ट सोचने लगते हैं, परिवार से बात करते हैं, यादें साझा करते हैं और फिर कुछ समय बाद उनकी मृत्यु हो जाती है. साइंस अब तक इस वजह को साफ नहीं कर पाया.

शोध ये भी बताता है कि अंतिम समय का अनुभव केवल शरीर पर निर्भर नहीं करता बल्कि इन बातों पर भी निर्भर करता है.
– व्यक्ति अकेला है या परिवार के बीच
– अस्पताल में है या घर में
– दर्द नियंत्रण की व्यवस्था
– धार्मिक या आध्यात्मिक विश्वास
कई अध्ययन बताते हैं कि जिन लोगों को भावनात्मक और चिकित्सीय सहयोग मिलता है, उनकी मृत्यु अपेक्षाकृत शांत होती है. वैसे ये भी कहा जाता है कि मृत्यु से पहले दिमाग से कुछ खास रसायन निकलते हैं.

क्या शांत मृत्यु पाप-पुण्य से जुड़ी है

वैसे भारतीय समाज में अक्सर शांत मृत्यु को पुण्य का फल माना जाता है. इनको अक्सर “सुखमृत्यु” या “सद्गति” कहा जाता है. कई धार्मिक कथाओं में ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहां साधु-संत ध्यान करते हुए या शांत अवस्था में देह त्यागते हैं. वैसे हर धर्म में ही गुड डेथ और बैड डेथ की अवधारणा हमेशा से चली आ रही है. सच कहें तो ये भी एक ऐसा रहस्य है, जिसके बारे में कोई कुछ नहीं जान पाया.

साइंस के सामने भी कुछ सवालों के जवाब नहीं

विज्ञान बेशक ये समझता है कि शरीर कैसे बंद होता है, लेकिन कुछ सवाल अब भी उसके सामने स्पष्ट नहीं हैं. जैसे
– कुछ लोग बिल्कुल शांत क्यों मरते हैं?
– कुछ लोगों में अंतिम सांसों का संघर्ष क्यों होता है?
– मृत्यु से पहले कुछ लोगों को असामान्य शांति या चेतना क्यों महसूस होती है?
– कुछ मरीज मरने से पहले अचानक बिल्कुल स्पष्ट क्यों हो जाते हैं

तब दिमाग में क्या होता है – ये भी शोध का विषय

हाल के वर्षों में न्यूरोसाइंस ने ये भी पाया है कि मृत्यु के ठीक पहले दिमाग में असामान्य गतिविधि हो सकती है. वर्ष 2022 में एक न्यूरोलॉजिकल अध्ययन में पाया गया कि मृत्यु से ठीक पहले दिमाग में गामा वेव्स की गतिविधियां बढ़ सकती हैं, जो आमतौर पर जागरूकता और स्मृति से जुड़ी होती हैं.

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