शराब नहीं पीते, फिर भी क्यों हो जाती है लिवर की बीमारी, 7 कारणों में छुपा है इसका राज

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Liver Disease Without Drinking Alcohol: लिवर की बीमारी के लिए मुख्य रूप से शराब को दोषी माना जाता है लेकिन क्या कारण है कि अधिकांश लोग शराब पीते भी नहीं है लेकिन फिर भी उन्हें लिवर की बीमारी हो जाती है. आइए जान…और पढ़ें

शराब नहीं पीते, फिर भी क्यों हो जाती है लिवर की बीमारी, 7 कारणों में छुपा राज
Liver Disease Without Drinking Alcohol: दुनिया भर में लिवर की बीमारी यानी फैटी लिवर डिजीज या हेपेटिक स्टियाटोसिस के मामले बढ़ते जा रहे हैं. आंकड़ों के मुताबिक भारत में हर चार में से एक वयस्क को फैटी लिवर डिजीज है. फैटी लिवर डिजीज में लिवर में अतिरिक्त चर्बी जमा होने लगती है जो लिवर के कई काम में बाधा डालने लगती है. यह बीमारी बहुत धीरे-धीरे असर करती है लेकिन शरीर को खोखला करने लगती है. आमतौर पर यह माना जाता है कि लिवर की ज्यादातर बीमारियों के लिए शराब ही जिम्मेदार है लेकिन आजकल जो लिवर की बीमारी होती है उनमें अधिकांश में शराब का कोई संबंध नहीं होता है. जो लोग शराब कभी जीवन में नहीं पिया है उसे भी यह बीमारी होने लगी है. आखिर इसका क्या कारण है. अगर शराब नहीं, तो आखिर यह नुकसान किस वजह से हो रहा है?

बिना शराब के लिवर बीमारी होने के 7 कारण

1. मेटाबॉलिक सिंड्रोम के घटक-टीओआई की खबर के मुताबिक मेटाबॉलिक सिंड्रोम कई स्वास्थ्य समस्याओं का समूह है. जैसे पेट पर चर्बी, ब्लड शुगर का बढ़ना या टाइप 2 डायबिटीज़, कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स का बढ़ना और हाई ब्लड प्रेशर, ये सब मेटाबोलिक सिंड्रोम है. जब ये समस्याएं एक साथ होती हैं तो आपके फैटी लिवर डिज़ीज़ विकसित होने का खतरा बहुत बढ़ जाता है.इसके लिए शराब का कारण न भी हो तो भी इसकी समस्या होती है. खून में अतिरिक्त चर्बी, शुगर बैड कोलेस्ट्रॉल का संतुलन बिगड़ जाता है. इससे हाई ब्लड प्रेशर हो जाता है और ये सब लिवर पर लगातार दबाव डालते हैं, जिससे लिवर की कोशिकाओं के अंदर चर्बी जमा होने लगती है और सूजन शुरू हो जाती है. समय के साथ ये चीजें स्केरिंग और गंभीर नुकसान में बदल सकती है.
2. इंसुलिन रेज़िस्टेंस-इंसुलिन रेज़िस्टेंस का मतलब है कि इंसुलिन शरीर में बनता तो है लेकिन काम नहीं करता है. इससे ब्लड शुगर बढ़ जाती है. तब होता है जब शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन पर सही तरह से प्रतिक्रिया नहीं करतीं, जिससे ब्लड शुगर को नियंत्रित करना मुश्किल हो जाता है. यह स्थिति लिवर को अधिक चर्बी जमा करने के लिए मजबूर करती है. यही NAFLD यानी नॉन-अल्कोहॉलिक फैटी लिवर डिज़ीज़ का कारण बन सकती है. एक बार जब लिवर में चर्बी जमा होना शुरू हो जाती है तो यह इंसुलिन रेज़िस्टेंस को और बढ़ा सकती है, जिससे एक ऐसा चक्र बन जाता है जिसमें हर समस्या दूसरी को और बढ़ावा देती है.

3. चीनी और अनहेल्दी डाइट- अनहेल्दी डाइट नॉन अल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज का सबसे बड़ा कारण है. फ्रुक्टोज़ जैसे मीठे पेयों, संतृप्त और ट्रांस फैट और अधिक मात्रा में पशु प्रोटीन वाले आहार लिवर में चर्बी जमा कर सकते हैं और इंसुलिन रेज़िस्टेंस को और खराब कर सकते हैं. अध्ययनों से पता चला है कि इनमें से कुछ चीजों की जगह साबुत अनाज, मेवे और दालों जैसे पौधों पर आधारित खाद्य पदार्थ शामिल करने से लिवर की सुरक्षा में मदद मिल सकती है.

4. हॉर्मोनल और एंडोक्राइन स्थितियां- हालांकि इस पर अध्ययन कम हैं लेकिन व्यापक क्लीनिकल विश्लेषण से यह साबित होता है कि हाइपोथायरॉयडिज़्म, पीसीओएस और अन्य एंडोक्राइन विकार जैसे हालात हार्मोनल और मेटाबॉलिक असंतुलन के ज़रिए NAFLD में योगदान करते हैं.

5. नींद और जीवनशैली से जुड़े कारक-कम समय की नींद, नींद की खराब गुणवत्ता और स्लीप एपनिया का सीधा संबंध NAFLD से है. यह संभवतः सर्केडियन रिद्म में गड़बड़ी और इंसुलिन रेज़िस्टेंस के बिगड़ने के कारण होता है. हमेशा बैठे रहना, शरीर में हरकतें नहीं लाना, लंबे समय तक टीवी देखना और लंबे समय तक काम करने से भी लिवर में चर्बी बढ़ जाती है.

6. तेज़ी से वजन घटाना -जब वजन बहुत तेजी से घटता है (जैसे क्रैश डाइट, अत्यधिक कैलोरी प्रतिबंध या कुछ सर्जरी के कारण) तो शरीर बड़ी मात्रा में संग्रहित वसा को रक्त में छोड़ देता है. इस अचानक आई वसा को प्रोसेस करने में लिवर पर अधिक दबाव पड़ता है, जिससे उसमें वसा जमा होने और सूजन की समस्या हो सकती है. इसी वजह से फैटी लिवर रोग के जोखिम वाले या पहले से पीड़ित लोगों के लिए धीरे-धीरे और स्थिर रूप से वजन घटाने की सलाह दी जाती है.

7. पर्यावरणीय कारक- वायु प्रदूषण, भारी धातुओं से निकली गैसें या कण के संपर्क में आना, स्मोकिं करना और पोषक तत्वों की कमी वाले व्यक्ति को नॉन अल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज का खतरा ज्यादा है. खासकर यदि वह आनुवंशिक रूप से संवेदनशील हो तो उसे ज्यादा खतरा है. ये कारक सीधे भी असर डालते हैं और मेटाबॉलिक कार्यप्रणाली में गड़बड़ी को बढ़ाकर भी अपना प्रभाव दिखाते हैं.

LAKSHMI NARAYAN

Excelled with colors in media industry, enriched more than 18 years of professional experience. L. Narayan contributed to all genres viz print, television and digital media. He professed his contribution in the…और पढ़ें

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