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170-year-old beer bottles: समंदर की गहराइयां अपने भीतर न जाने कितने राज दफन किए हुए हैं, लेकिन जब 170 साल पुरानी बीयर की बोतलें लहरों के बीच से बाहर आईं, तो पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों के होश उड़ गए. यह महज शराब की बोतलें नहीं थीं, बल्कि वक्त के उस दौर का एक टाइम कैप्सूल थीं जिसे आज की पीढ़ी ने कभी नहीं देखा था. बाल्टिक सागर के तल में एक जहाज के मलबे से मिली ये बोतलें इतनी बेशकीमती हैं कि पिछले 15 सालों से दुनिया भर के शोधकर्ता इन पर रिसर्च कर रहे हैं. आखिर इसमें क्या राज छिपे हैं.
जहाज के मलवे में समंदर के नीचे दबी पड़ी थी बीयर की बोतलें. एआई फोटो
170-year-old beer bottles: बाल्टिक सागर के ठंडे पानी में गोताखोर जब एलेंड आइलैंड के पास गहराई में थे तभी उन्होंने कुछ अजीब चीज देखा. जब पास गए तो उन्होंने एक ऐतिहासिक जहाज का खंडहर देखा. लेकिन काफी देर के बाद उन्हें इससे भी ज्यादा बेशकीमती चीज मिली. जहाज में 150 से ज्यादा शैंपेन की बोतलें और पांच बीयर की बोतलें थीं. इनमें से कुछ बोतलें पूरी तरह बंद थीं और करीब 170 साल तक समुद्र के पानी के नीचे सुरक्षित रहीं. वैज्ञानिकों ने इसके बाद इस बीयर पर शोध किया. इस जांच से बीयर की बनावट, उस समय की ब्रूइंग तकनीक और लगभग दो सदियों तक पानी के नीचे रहने से उसमें हुए रासायनिक बदलावों के बारे में ठोस जानकारी मिली है.
कब डूबा था जहाज
टीओआई की खबर के मुताबिक यह जहाज 1840 में डूब गया था. इस जहाज का मलबा 2010 एलैंड आइलैंड के दक्षिण में लगभग 50 मीटर गहराई पर मिला था. हालांकि, जहाज का नाम, वह कहां जा रहा था और उसका आखिरी बंदरगाह कौन सा था, यह जानकारी अब तक पता नहीं चल पाई है. लेकिन जहाज में शैंपेन जैसी महंगी चीजों के साथ पांच बीयर की बोतलें भी मिलीं, जिन्हें समुद्र की सतह तक से निकाला गया. इनमें से एक बोतल निकालते समय टूट गई और उसमें से झागदार तरल बाहर आया. गोताखोरों ने बताया कि समुद्री पानी में घुल जाने के बावजूद वह तरल बीयर जैसा दिखता और स्वाद में भी वैसा ही था. यह खोज इसलिए खास मानी जा रही है क्योंकि इससे इतिहास की असली पेय पदार्थों का सीधे अध्ययन करने का मौका मिला है, जो बहुत कम वैज्ञानिक शोधों में संभव हो पाया है.
जांच में क्या मिला
फिनलैंड के वीटीटी टेक्निकल रिसर्च सेंटर और जर्मनी की टेक्निकल यूनिवर्सिटी ऑफ म्यूनिख के वैज्ञानिकों ने इन बोतलों पर विस्तृत रिसर्च की है. इस रिसर्च को जर्नल ऑफ एग्रीकल्चर एंड फूड केमिस्ट्री में प्रकाशित किया गया है. जांच में पता चला कि दोनों बोतलों में अलग-अलग तरह की बीयर थी. दोनों में हॉप्स (कड़वाहट और स्वाद देने वाला तत्व) और फ्लेवर कंपाउंड अलग-अलग मात्रा में मौजूद थे. शोध में यह भी सामने आया कि 1840 के दशक में इस्तेमाल होने वाले हॉप्स में आज के मुकाबले कुछ कड़वे तत्व ज्यादा होते थे. नमूनों में पाए गए ऑर्गेनिक एसिड, ग्लूकोज और अन्य रसायन बताते हैं कि लंबे समय तक पानी के नीचे रहने के दौरान बैक्टीरिया और एंजाइम की गतिविधि होती रही. हालांकि करीब 170 साल में कई रासायनिक बदलाव हुए, फिर भी यीस्ट से बने कुछ स्वाद वाले तत्व आज की आधुनिक बीयर के समान स्तर पर पाए गए. यह खोज इतिहास की बीयर बनाने की तकनीक और उसके स्वाद को समझने में बेहद अहम मानी जा रही है.
रासायनिक बदलाव
शोध में पाया गया कि जहाज से मिली बीयर की बोतलों में सोडियम की मात्रा आज की सामान्य बीयर के मुकाबले काफी ज्यादा थी. वैज्ञानिकों का मानना है कि या तो कॉर्क (ढक्कन) के जरिए समुद्री पानी के सोडियम आयन अंदर चले गए या समय के साथ थोड़ा-बहुत समुद्री पानी बोतल में प्रवेश कर गया. इससे बीयर लगभग 30 प्रतिशत तक पतली (डायल्यूट) हो गई होगी. इसी कारण इसमें अल्कोहल (एथेनॉल) का स्तर भी आधुनिक बीयर की तुलना में कम पाया गया. शोधकर्ताओं ने यह भी देखा कि हॉप्स के टूटने से बनने वाले कुछ रसायन, जैसे हुलुपोन्स और ह्युमुलिनिक एसिड नमूनों में मौजूद थे. इससे पता चलता है कि कई दशकों तक ऑक्सीकरण (हवा के संपर्क) और उम्र बढ़ने की प्रक्रिया से बीयर में रासायनिक बदलाव होते रहे. हालांकि बीयर के स्वाद से जुड़े कुछ रासायनिक तत्व समय के साथ आज तक बने हुए हैं.
वैज्ञानिक और ऐतिहासिक महत्व
170 साल पुरानी इन बीयर की जांच से इतिहास का पन्ना भी खुलेगा. आगे की रिसर्च में यह पता लगाई जा रही है कि इस जहाज का नाम क्या है. यह जहाज कहां से आया था, कहां जाने वाला था और किस उद्येश्य के लिए कहां जा रहा था. कई लिंक मिले हैं जिससे इतिहास के पन्ने को खंगाजा जा रहा है. उम्मीद है कि आने वाले समय में इस समंदर में समाए इस जहाज के गर्दिश से कई दबे हुए राज का पर्दाफाश होगा.
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18 साल से ज्यादा के लंबे करियर में लक्ष्मी नारायण ने अपने डीडी न्यूज, आउटलुक, नई दुनिया, दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। समसामयिक विषयों के विभिन्न मुद्दों, राजनीति, स…और पढ़ें
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