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27 मिनट पहलेलेखक: शिवाकान्त शुक्ल
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सवाल- मैं दिल्ली से हूं। मेरा 6 साल का बेटा बहुत तेज और समझदार है। उसे कविताएं, कहानियां और स्कूल का काम बहुत अच्छे से याद रहता है। घर में वह पूरे आत्मविश्वास के साथ हमें सुनाता भी है, एक्टिंग भी करता है। लेकिन जैसे ही घर में मेहमान आते हैं या हम किसी रिश्तेदार के यहां जाते हैं और कोई उससे कुछ सुनाने या बोलने के लिए कहता है, तो उसका व्यवहार अचानक बदल जाता है। वह चुप हो जाता है, मेरे पीछे छिप जाता है या वहां से हटने की कोशिश करता है। कई बार लोग उसे ‘शर्मीला’ कहते हैं।
मैं समझ नहीं पा रही हूं कि यह सिर्फ सामान्य शर्मीलापन है या कुछ और। एक मां के रूप में मुझे इस स्थिति को कैसे समझना और संभालना चाहिए?
एक्सपर्ट: डॉ. अमिता श्रृंगी, साइकोलॉजिस्ट, फैमिली एंड चाइल्ड काउंसलर, जयपुर
जवाब- सबसे पहले तो मैं आपसे यह कहना चाहूंगी कि इसमें घबराने की बात नहीं है। 6 साल की उम्र में बच्चों का ऐसा व्यवहार सामान्य है। बेटा घर में आपके सामने खुलकर बोलता है। इसका मतलब है कि उसके अंदर क्षमता और कॉन्फिडेंस दोनों हैं।
मेहमानों के सामने जो बदलाव आप उसमें देख रही हैं, वह अक्सर ‘सोशल शाइनेस‘ या ‘परफॉर्मेंस एंग्जाइटी‘ से जुड़ा होता है। बच्चों को जब लगता है कि लोग उन्हें देख रहे हैं, जज कर रहे हैं या उनसे उम्मीद कर रहे हैं तो वे असहज महसूस करते हैं। यह कोई कमजोरी नहीं, बल्कि बच्चों में विकास की स्वाभाविक प्रक्रिया है।
हम इस बारे में विस्तार से बात करेंगे, लेकिन इसके पहले कुछ जरूरी बातें समझिए-
- अक्सर हम अनजाने में अपने बच्चे को एक ‘परफॉर्मिंग आर्टिस्ट’ की तरह देखने लगते हैं, जिससे हमें हर महफिल में उससे अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करने की उम्मीद होने लगती है।
- कई बार बच्चा हमारी ‘सोशल इमेज’ को बेहतर बनाने का एक जरिया मात्र बनकर रह जाता है, जहां हम चाहते हैं कि वह मेहमानों के सामने अच्छा परफॉर्म करे ताकि हमारी पेरेंटिंग की तारीफ हो।
- हमें यह समझना होगा कि बच्चा कोई ‘रोबोट’ नहीं है, जो रिमोट का बटन दबते ही हंसने लगे या कविता सुनाने लगे।
- हर बच्चे का अपना एक स्वभाव और इच्छा होती है। उसे यह हक है कि जब उसका मन न हो, तो वह चुप रहे या अपने लिए थोड़ा एकांत चुन सके।
- एक 6 साल के मासूम के लिए अजनबियों की भीड़ और उनकी उम्मीद भरी नजरें काफी डरावनी हो सकती हैं।
- कभी-कभी बच्चे के मन में यह डर भी आ सकता है कि अगर उसने कोई गलती की या लाइन भूल गया, तो बाद में उसे डांट या नाराजगी का सामना करना पड़ेगा।
कुल मिलाकर, हमें बच्चे के मानसिक दायरे और उसकी सहजता का सम्मान करना चाहिए, ताकि वह दबाव में नहीं बल्कि खुशी से अपनी बात रख सके।

दबाव बनाना, पेरेंटिंग का हेल्दी तरीका नहीं
अक्सर पेरेंट्स मेहमानों के सामने बच्चे की प्रतिभा का प्रदर्शन करके ‘गुड पेरेंटिंग’ का सर्टिफिकेट चाहते हैं। वे चाहते हैं कि लोग कहें, “वाह! आपका बच्चा कितना टैलेंटेड है।” लेकिन इस दिखावे की दौड़ में हम यह भूल जाते हैं कि बच्चा कोई ‘परफॉर्मिंग आर्टिस्ट’ नहीं है।
जब हम बच्चे को सबके सामने परफॉर्म करने के लिए मजबूर करते हैं, तो अनजाने में उसे यह मैसेज दे रहे होते हैं कि उसकी वैल्यू तभी है, जब वह दूसरों को खुश करे या ‘परफॉर्म’ करे। इसलिए सबसे पहले तो आप मेहमानों के सामने जबरदस्ती कुछ सुनाने का प्रेशर देना बंद करें। ये पेरेंटिंग का हेल्दी तरीका नहीं है।
आइए, अब बच्चे की चुप्पी का कारण समझते हैं।
बच्चे की चुप्पी का कारण समझें
बच्चा जब मेहमानों के सामने छिपता है तो वह खुद को ‘इनसिक्योर’ महसूस करता है। 6 साल की उम्र में बच्चे अपनी पहचान को लेकर जागरूक होने लगते हैं। उन्हें डर होता है कि अगर उन्होंने कुछ गलत सुनाया, तो लोग क्या सोचेंगे या उस पर हंसेंगे? बच्चे अपने घर में पेरेंट्स के सामने तो सहज होते हैं, लेकिन बाहरी माहौल में उन्हें थोड़ी इनसिक्योरिटी महसूस हो सकती है। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं।

क्या यह चिंता की बात है?
अगर आपका बच्चा स्कूल में सामान्य रूप से बात करता है, दोस्तों के साथ खेलता है और घर में खुलकर बात करता है तो यह केवल ‘सिचुएशनल शाइनेस’ हो सकती है। यह स्थिति तब चिंताजनक हो सकती है, जब बच्चा हर वक्त, हर जगह चुप रहे, दोस्तों से भी न मिले या लगातार डरा हुआ दिखे। आपके बताए अनुसार, अभी यह एक सामान्य सामाजिक झिझक लगती है।

आइए, अब समझते हैं कि इस स्थिति को कैसे हैंडल करना चाहिए।
बच्चे में साेशल कॉन्फिडेंस कैसे बढ़ाएं?
बच्चे को किसी ‘परफॉर्मिंग आर्टिस्ट’ की तरह पेश करने की बजाय उसे मेहमानों के सामने सहज महसूस कराना जरूरी है। जब वह मेहमानों के सामने चुप हो तो ये काम न करें-
- उसे डांटें नहीं।
- ‘शर्मीला’ न कहें।
इसके बजाय उसका सपोर्ट करें। साथ ही कुछ बातों का खास ख्याल रखें।

आइए, अब कुछ जरूरी पॉइंट्स को विस्तार से समझते हैं।
उसे ‘शर्मीला’ न कहें
जब आप मेहमानों के सामने कहती हैं, “पता नहीं इसे क्या हो गया, ये बहुत शर्मीला है,” तो बच्चा मान लेता है कि वह वाकई ऐसा ही है। वह इस ‘शर्मीलेपन’ को अपनी पहचान बना लेता है। इसके बजाय कहें, “इसे अभी थोड़ा समय चाहिए, यह थोड़ी देर में बात करेगा।”
मेहमानों को ‘ऑडियंस’ न बनाएं
अक्सर हम बच्चे से कहते हैं, “चलो अंकल को पोएम सुनाओ।” इससे बच्चे को लगता है कि उसे जज किया जा रहा है। इसके बजाय बातचीत को सामान्य रखें। उसे सीधे कुछ सुनाने को कहने के बजाय मेहमानों के साथ बैठने को कहें। इससे उसकी झिझक कम होगी।
प्रैक्टिस को मजेदार बनाएं
घर पर ‘फेक पार्टी’ का खेल खेलें। आप मेहमान बनें और उसे होस्ट बनाएं। बच्चे को सिखाएं कि नमस्ते कैसे करते हैं या नाम कैसे बताते हैं। जब वह खेल-खेल में यह सीखेगा, तो मेहमानों के सामने उसे डर नहीं लगेगा।
जबरदस्ती न करें
अगर बच्चा रो रहा है या आपके पीछे छिप रहा है, तो उसे घसीटकर बाहर न लाएं। उसे महसूस होने दें कि आप उसकी टीम में हैं। जब उसे लगेगा कि आप उस पर दबाव नहीं डाल रही हैं, तो उसका तनाव कम होगा और वह खुद बाहर आने की कोशिश करेगा।
पेरेंट्स इन गलतियों से बचें
कई बार माता-पिता अपनी ‘सोशल इमेज’ बचाने के चक्कर में बच्चे पर दबाव डाल देते हैं। इससे बच्चा और ज्यादा इंट्रोवर्ट हो जाता है। इसलिए पेरेंट्स को कुछ गलतियां बिल्कुल भी नहीं करनी चाहिए।

अंत में यही कहूंगी कि बेटे को यह भरोसा दिलाएं कि अगर वह कुछ नहीं सुनाता, तो भी वह आपके लिए उतना ही प्यारा और होनहार है। जैसे ही उसके मन से ‘अच्छा दिखने’ का बोझ हटेगा, वह स्वाभाविक रूप से बात करना शुरू कर देगा। आपका काम उसे स्टेज पर धकेलना नहीं, बल्कि उसके पीछे खड़े रहना है, ताकि जब वह आगे बढ़े, तो उसे पता हो कि मम्मी हमेशा साथ हैं।
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